Monday, July 8, 2019

विवेक की व्याख्या

विवेक की व्याख्या


सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"

 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
वैज्ञानिक अधिकारी, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
 फोन : (नि.) 022 2754 9553  (का) 022 25591154   
मो.  09969680093
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विवेक का शाब्दिक अर्थ होता है।

1.  भले बुरे का ज्ञान

2.  समझ (जैसे—विवेक से काम करना)।  

3. सत्यज्ञान

विवेक संस्कृत का एक आम शब्द है जिसका प्रयोग असंस्कृतभाषी भी प्रतिदिन करते हैं।  कई भाषाओं में इसका अर्थ बुद्धि होता है किन्तु व्यापक रूप मैं इसका अर्थ भेद करने की शक्ति मन जाता है,  परन्तु इस शब्द की व्युत्पत्ति और अन्य अर्थ भी जानने चाहिए।  संस्कृत में, अन्य शास्त्रीय भाषाओं, जैसे फ़ारसी, ग्रीक, लैटिन, की तरह हैं धातु से शब्द बनते हैं|


विवेक विच धातु में 'वि. उपसर्ग को जोड़कर बनाया गया है। विच का अर्थ है परे, पृथक, वंचित, भेद, विचार या न्याय। अतः विवेका का अर्थ है भेद करना, निर्णय करना, प्रभेद करना, बुद्धि, विचार, चर्चा, जांच, भेद, अंतर, सच्चा ज्ञान, जलपात्र, घाटी, जलाशय, सही निर्णय और एक जल कुंड। विवेक का एक अर्थ वास्तविक गुणों के आधार पर वस्तुओं का वर्गीकरण करने की क्षमता भी है।


वेदांत में, विवेक का अर्थ अदृश्य ब्राह्मण को दृश्य जगत से, पदार्थ से आत्मा, असत्य से सत्य, मात्र भोग या भ्रम से वास्तविकता को पृथक करने की क्षमता है।

वास्तविकता और भ्र्म एक दूसरे की ऊपर उसी तरह अद्यारोपित हैं जैसे पुरुष और प्रकृति, इनके बीच भेद करना विवेक है।

यह अनुभवजन्य दुनिया से स्वयं या आत्मान का भेद करने की क्षमता है। विवेक, वास्तविक और असत्य के बीच की समझ है जो इस बात को समझती है कि ब्राह्मण वास्तविक है और ब्राह्मण के अलावा सब कुछ असत्य है। इसका अर्थ धर्म अनुरूप और धर्म प्रतिकूल कार्यों के बीच अंतर करने की क्षमता भी है। यह वास्तविकता की समझ है।


यहां ब्राह्मण का अर्थ जाति से नहीं है। यद्यपि ब्रह्म को वरण करने का कार्य। पातांजलि के शब्दों में योग का अनुभव कर योगी बनना। वेद महावाक्यों का अनुभव ही सत्य ज्ञान देता है। अर्थात योग के मार्ग पर चलने हेतु। ब्रह्म का वरण करने हेतु बुद्दी को मोडने का कार्य करना ही विवेक है।

मेरे विचार से मैं विवेक को तीन प्रकार में विभाजित कर सकता हूं।  ब्रह्म का वरण यानि ब्रह्ममण कार्य करना तो अंतिम और सत्य विवेक हुआ। जो मनुष्य का प्रथम कर्तव्य होना चाहिये और जिसके लिये मानव देह मिली है। किंतु जगत के कार्यों हेतु बुद्धि को प्रेरित करना वह भी समाज विरोधी और दुष्कर्म की ओर प्रेरित करना असत्य विवेक या अविवेक  कहलायेगा। वहीं जगत की ओर अग्रसरित होकर जन सेवा और समाज सेवा हेतु प्रेरित होना। सत्यासत्य विवेक कह सकते हैं।  जो असत्य है किंतु सत्य भी है।

आध्यात्म की मार्ग के लिए आवश्यक चार गुणों में से एक विवेक है।  इन गुणों को साधना-चतुष्टय या साधना की चौपाई कहा जाता है| अन्य तीन गुण है वैराग्य, शमा-अदि-षट्का-संपत्तिः।

छह गुणों की संपत्ति - जिसका आरम्भ सम यानि मन को शांत करना, और मुक्षत्व यानि मोक्ष की कामना|


विवेक की महत्ता आध्यात्मिक या धार्मिक जीवन की प्रस्थान बिंदु मानने के कारण भी है। विवेक उस गहन चिंतन को धारण करता है जो किसी भी व्यक्ति को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की क्षणभंगुरता की समझ देता है| एक बार जब किसी व्यक्ति को दुःख की पुनरावृतिए एवं चक्रीय प्रकृति का भान हो जाता है जिससे जीवन पर्यन्त भोगना होता है, तो व्यक्ति बुरी तरह से दुख के इस चक्र से निकलने का रास्ता ढूंढ़ता है।


विवेका एक बार की प्रक्रिया नहीं है। व्यक्ति को जीवनपर्यन्त विभेद में लगा रहने पड़ता है | विवेक के इस निरंतर अभ्यास की आवश्यकता अविद्या है, मौलिक अज्ञान है, जो हमारे दिमाग पर छा जाता है और यह विश्वास करवाता है कि असत्य सत्य है और वास्तव में सत्य है, अर्थात आत्मान है वो असत्य है|


परम-हंस, पौराणिक हंस, की दूध और पानी में भेद करने की क्षमता (नीर-क्षीर विवेक) के कारण उसके विवेक को उच्चतम माना जाता है। विवेक का अभ्यास निरंतर प्रश्न एवं समालोचनात्मक विचार-विमर्श से किया जाता है।

विवेक का अर्थ होता है ये देखना कि कौन सी चीज़ है जो मन के आयाम की है, और कौन सी चीज़ है जो मनातीत है।  इनमें अंतर कर पाए तो विवेक है। 

विवेक संस्कृत का एक आम शब्द है जिसका प्रयोग असंस्कृतभाषी भी प्रतिदिन करते हैं।  कई भाषाओं में इसका अर्थ बुद्धि होता है किन्तु व्यापक रूप मैं इसका अर्थ भेद करने की शक्ति मन जाता है,  परन्तु इस शब्द की व्युत्पत्ति और अन्य अर्थ भी जानने चाहिए।  संस्कृत में, अन्य शास्त्रीय भाषाओं, जैसे फ़ारसी, ग्रीक, लैटिन, की तरह हैं धातु से शब्द बनते हैं|

आदिशंकर, जो अद्वैत के आचार्य हुए हैं, उन्होंने विवेक की परिभाषा दी है – नित्य और अनित्य में भेद करना विवेक है।  नित्य और अनित्य में भेद।  नित्य माने वो जो है भी, होगा भी, जिसका समय से कोई लेना ही देना नहीं है, जो समय के पार है| ठीक है? और दूसरी चीज़ें, वस्तुएं, व्यक्ति, विचार होते हैं, जो समय में आते हैं और चले जाते हैं, उनको अनित्य कहते हैं।  नित्य वो जिसका समय से कोई लेना देना नहीं है, जो कालातीत सत्य है, वो नित्य है।  और वो सब कुछ जो समय की धार में है, अभी है, अभी नहीं होगा, यानि कि मानसिक है; वो सब अनित्य है।

तो एक तरीका ये है उसको देखने का, कि दो अलग-अलग आयाम हो गए, एक आयाम हुआ मन का कि क्या ये सब मानसिक है, जो बातें अभी हो रही हैं| मानसिक क्या है? मानसिक वो सब कुछ है जो द्वैतात्मक है, जहाँ पर आँखों से देखा जा रहा है, कानों से सुना जा रहा है और फिर मन से उसका विश्लेषण किया जा रहा है, यही द्वैत है | जो कुछ भी इन्द्रियों से पकड़ते हो, उसी का नाम द्वैत है|


विवेक का अर्थ हुआ ये देखना कि मैं जिन बातों को महत्वपूर्ण माने बैठा हूँ, वो सब इन्द्रियगत हैं, मानसिक हैं, समय की धारा की हैं या फिर वो सत्य हैं| और ये दो अलग-अलग आयाम हैं।  यहाँ एक ही आयाम में भेद नहीं किया जा रहा है।  यहाँ कहा जा रहा है कि तुम चाहे काले को महत्व दो, चाहे सफ़ेद को महत्व दो, बात एक ही है क्योंकि दोनों एक ही आयाम के हैं।  ठीक है? तुम चाहे पकड़ने को महत्व दो, चाहे छोड़ने को महत्व दो, बात एक ही है क्योंकि वो एक ही आयाम के हैं।  तो ये विवेक का प्रश्न ही नहीं है| क्योंकि विवेक का अर्थ है वास्तविक रूप से अंतर कर पाना और वास्तविक रूप से अंतर ये होता है कि जो बात मेरे सामने है, वो मानसिक है या सत्य है।

सत्य क्या? सत्य वो जो स्वयं अपने पर निर्भर है| सत्य में और द्वैत में यहीं अंतर है| कि द्वैत में जो कुछ है उसे अपने विपरीत पर निर्भर होना पड़ता है| काले को सफ़ेद पर निर्भर होना पड़ेगा| अगर सफ़ेद न हो तो काला नहीं दिखाई दे सकता| काला न हो तो सफ़ेद नहीं दिखाई दे सकता| अगर सब सफ़ेद ही सफ़ेद हो जाए तो तुम्हें सफ़ेद दिखना बंद हो जाएगा| तुम जो लिखते हो ब्लैक-बोर्ड पर वो इसी कारण दिखाई देता है क्योंकि पीछे काला है।



ये द्वैत की दुनिया है| यहाँ पर कुछ भी सत्य नहीं है, क्योंकि काला वो जो सफ़ेद का विपरीत है, सफ़ेद वो जो काले का विपरीत है।  और पूछो कि काला और सफ़ेद दोनों क्या, तो इसका कोई उत्तर ही नहीं मिलेगा| इन्द्रियां हमें जो भी कुछ दिखाती हैं, वो द्वैत की दुनिया का ही होता है| उसको जानने वालों ने सत्य नहीं माना है।  इसलिए उन्होंने इन्द्रियों और मन की दुनिया को एक आयाम में रखा है और सत्य को दूसरे आयाम में रखा है।  


विवेक का अर्थ है- इन दोनों आयामों को अलग-अलग देख पाना।  साफ-साफ देख पाना कि क्या है जो बस अभी है, अभी नहीं रहेगा, क्या है जो अपने होने के लिए, अपने विपरीत पर निर्भर करता है| सत्य अपने होने के लिए अपने विपरीत पर निर्भर नहीं करता।  सत्य का कोई विपरीत होता ही नहीं है।  सत्य पराश्रित नहीं होता।  सत्य है।  उसे किसी दूसरे के समर्थन की, सहारे की, प्रमाण की, कोई आवश्यकता नहीं होती है, वो बस होता है।  बात समझ में आ रही है? तो विवेक ये हैं कि मैं जानूं कि क्या सत्य है और क्या सत्य नहीं है।  मैं जानूं, क्या है जो मात्र मन में उठ रहा है, कल्पना है, विचारणा है और क्या है जो उस कल्पना का आधारभूत सत्य है, स्रोत ही है समस्त कल्पनाओं का।


अब इसको अगर और सपाट शब्दों में कहूं तो, ‘ब्रह्म को जगत से पृथक जानना ही विवेक है, सत्य को असत्य से अलग जानना ही विवेक है’।

बहक न जाना।  हम कब असत्य को सत्य मान लेते हैं? महत्व दे कर।  तुम्हारे सामने कुछ है, वो तुम्हें बहुत आकर्षित कर रहा है, तुमने उसे खूब महत्व दे दिया।  जब तुम किसी चीज़ को बहुत महत्व दे रहे हो, खिंचे चले जा रहे हो, आकर्षित हुए जा रहे हो, तो इसका अर्थ क्या है? तुम उसको क्या मान रहे हो? सत्य मान रहे हो| ये अविवेक है कि जो सत्य है नहीं, तुम उसकी ओर खिंचे जा रहे हो, तुम उसको महत्व दे रहे हो।  तुमने उसको बड़ी जगह दे दी।  ये अविवेक है।  विवेक का अर्थ है, जो सत्य नहीं है, उसको जानूँगा कि सत्य नहीं है।  सत्य क्या? जिसका समय कुछ नहीं बिगाड़ सकता।  सत्य क्या? जो अपने होने के लिए अपने विपरीत पर आश्रित नहीं है।


जब ज्ञानी कहते हैं कि विवेक से खाओ, विवेक से चलो, तो क्या आशय हुआ उनका? उनका आशय हुआ कि तुम्हारा चलना सत्य की दिशा में रहे, तुम्हारा बोलना सत्य की दिशा में रहे।  और सत्य की दिशा कैसे पता चलेगी? कहना तो ठीक है कि कह दिया कि सत्य की दिशा में चलो।


विवेक का अर्थ हुआ- सत्य की दिशा में चलो| पर बतायेगा कौन कि सत्य की क्या दिशा है? स्वयं सत्य बताएगा।  क्योंकि सत्य के अलावा और कोई बताने के लिए है ही नहीं कि उसकी दिशा क्या है| विवेक इसलिए आता है, श्रद्धा से।  स्वयं सत्य से पूछना पड़ता है कि अपने आने का, अपने तक पहुँचने का रास्ता बता दो, क्योंकि मन तो सत्य तक का रास्ता नहीं जान पायेगा।  बताओ क्यों? क्योंकि मन द्वैत के आयाम पर, मान लो X एक्सिस पर है और सत्य का कोई और ही आयाम| जिसने अपने आप को X,Y के तल पर कैद कर रखा हो, वो किसी और आयाम में कैसे पहुँचेगा? समझ रहे हो बात को? तो विवेक बहुत गहरी बात है।  विवेक का अर्थ ये नहीं है कि ज़रा देख कर पांव रखना कि कहीं गड्ढा न हो, कि पानी कहाँ है और ज़मीन कहाँ है।  इसमें अंतर करने का नाम विवेक नहीं है।  विवेक में अंतर निश्चित रूप से किया जाता है, पर वो अंतर इस बात का नहीं होता है कि तुम्हारे सामने जो खाना रखा है वो घी से बना है या तेल से बना है। वो अंतर बहुत सूक्ष्म अंतर है।  बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है वो अंतर करना, वो ये छोटी-मोटी बातों में नहीं है।



वो अंतर क्या है? नित्य और अनित्य का भेद करना, सत्य और असत्य का भेद करना, वास्तविक और छवि में भेद कर पाना।  जो ये कर पाए, वो विवेकी कहलाता है, कि बड़ा विवेकवान आदमी है।  आम आदमी कल्पनाओं में जीता है।  जो कल्पनाओं में जिये, वो विवेकी नहीं है।  जो छविओं में जिये, वो विवेकी नहीं है।  जो अपने मतों में जिये, धारणाओं में कैद रहे, वो विवेकी नहीं हो सकता।  जो किसी भी ऐसी वस्तु, ऐसी ऑब्जेक्ट से आकर्षित है या तादात्मय बैठा लिया है, जिसका आना-जाना पक्का है, अभी है, अभी नहीं है, जो कल्पना का विषय है, जिसने किसी भी ऐसी वस्तु से आकर्षण या तादात्मय बैठा लिया है, वो व्यक्ति विवेकी नहीं हो सकता।  ये बात समझ में आ रही है? तो ये सामने एक कार जा रही है हमारे, हम हाईवे पर हैं| तुम्हें वो कार खींच रही है अपनी ओर, नया मॉडल है, खूबसूरत रंग है और तुम खिंचे चले जा रहे हो।  ये क्या हुआ?

उत्तर मिलेगा खिंचे चले जा रहे हैं तो ये असत्य है। फिर यदि वो कार न दिखती तो क्या खिंचते उसकी ओर ? उत्तर मिलेगा नहीं। तो फिर वो कार तुम तक कैसे पहुँची? इन्द्रियों के माध्यम से। उत्तर मिलेगा मन से |

यानि जब भी कुछ तुम तक इन्द्रियों के माध्यम से पहुँचे और तुम्हें जकड़ ले, तो समझ लेना कि क्या हो रहा है, अविवेक| ‘ये विवेक की बात नहीं हो सकती, ये इन्द्रियों तक ही तो पहुँचा है मुझ तक’।

एक अन्य प्रश्न अगर तुम्हारे मन में प्रेम किसी व्यक्ति को देख कर उठता है, तो क्या वो वास्तविक प्रेम है? क्या ये विवेक है?

उत्तर मिलेगा, देख के अगर प्रेम होता है, तो नहीं है। तो अब  नहीं है ना।  क्योंकि ये बात पूरी तरह से अब इन्द्रियगत हो गई है।  दिखा, तो मन मचल उठा, या कि उसकी याद आई तो मन मचल उठा।  दोनों ही स्थितियों में हुआ क्या है? एक मानसिक तरंग है ये, एक प्रकार का ये विचलन ही है कि या तो स्मृति ने, या दिखने ने, या सुनने ने मन में एक हलचल पैदा कर दी।

उत्तर है विचार गया और सब ख़त्म यानि ये विवेक नहीं हो सकता,  इसको प्रेम मत समझ लेना।  समझ में आ रही है बात? विवेक का अर्थ है उसके साथ रहना, लगातार, जिसको आँखें देख नहीं सकती, जिसको कान सुन नहीं सकते, जिसकी बात ज़बान नहीं कर सकती।  लगातार उस आयाम से जुड़े रहने का नाम विवेक है कि मुझे तो बस वही पसंद है। फिर प्रश्न है  कौन?

‘जो मन का विषय नहीं है, जो आँखों का विषय नहीं है, जो ज़बान का या छूने का विषय नहीं है, पर फिर भी वो सबका स्रोत है, मुझे तो वो ही पसंद है, मैं उसी के साथ रहता हूँ’; ये है विवेक। और उसके अलावा कुछ और आता है, तो हमें नहीं भाता है।  सत्य के अलावा तुम हमारे सामने कुछ भी लाओगे, हमें रुचता ही नहीं है’, ये विवेक हुआ।

यही अविवेक कहलाता है  कि जो मुझसे समय छीन लेगा मैं फालतू ही उसके साथ जुड़ गया| और एक दूसरा तरीका भी है कि मन के आयाम से हट कर के किसी ऐसी जगह की तुमको कुछ झलक सी मिल जाए, कुछ इशारा सा मिल जाए, जो पक्की है, जो कभी हिलती ही नहीं।  जहाँ कुछ परिवर्तनीय नहीं है, जिसको एक बार जान लिया, एक बार पा लिया, तो बदल ही गए।  तब समझो कि तुम्हारे लिए ये चार दिन किसी काम के रहे।  दो तरह के लोग लौटेंगे वहाँ से।  एक वो जो अपने साथ कुछ ले कर के आयेंगे, और अपने साथ क्या ले कर के आते हैं लोग, लोग अपने साथ बहुत सारा ज्ञान ले कर के आयेंगे, जितनी वहाँ किताबें दी जायेंगी, उन किताबों का पूरा इतना ढेर ले कर के आयेंगे, बहुत सारी यादें और बहुत सारे नये फ़ोन नंबर ले कर के आयेंगे, और दो-दो सौ, चार-चार सौ फोटोग्राफ्स ले कर के आयेंगे। तो एक तो तरीका ये है कि तुम अपने साथ कुछ ले कर के आ रहे हो और दूसरा तरीका ये है कि तुम स्वयं ही बदल कर आ रहे हो। इसमें से क्या है जो तुम्हारे साथ रहेगा और क्या है जो नहीं रहेगा? यह जानना ही विवेक है।

MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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Sunday, July 7, 2019

क्या अंतर है ज्ञान और बुद्धि में

   क्या अंतर है ज्ञान और बुद्धि में 

 


सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"

 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
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एक मिलता जुलता स्थूल संदर्भ टमाटर का ले सकते हैं।

ज्ञान के अनुसार टमाटर एक फल है क्योंकि उसमें बीज होता है

बुद्धि टमाटर का प्रयोग सब्जी के रूप में करना जानती है।

ज्ञान अनुभव भी हो सकता है किंतु बुद्धि उस ज्ञान को तौलने का काम करती है। जैसे योग। यह एक अनुभुति हैं। जब हम वेद महावाक्य का अनुभव कर लेते हैं। तब हमको द्वैत और अद्वैत स्वत: समझ में आ जाता है किंतु हम उसे सीमित ही व्यक्त कर सकते हैं। वेदांत के अनुसार “ आत्मा में परमात्मा की एकात्मकता का अनुभव ही योग है”। वेद महावाक्यों का अनुभव ही ब्रह्म ज्ञान है।

किंतु यह आवश्यक नहीं कि हम ज्ञान को इंद्रियों के माध्यम से पूर्णतया: व्यक्त भी कर सकें।  अतः अगर यह कहा जाए की ज्ञान और बुद्धि के बीच प्रयोग का अंतर होता है तो गलत न होगा; ज्ञान को शिक्षा का अनुभव का परिणाम कह सकते है।  इसलिए, ज्ञान का दान तो संभव है पर बुद्धि का दान संभव नहीं;  ज्ञान तो हमारे पास हमेशा से ही प्रचुर रहा है, आज समस्या का कारण हमारी बुद्धि है !"

बुद्धि एक ऐसा महत्वपूर्ण तत्व है, जिसके द्वारा मनुष्य का जीवन प्रकाशित होता है, प्रेरित होता है। यदि अन्य प्राणियों से मनुष्य में कोई विशेषता है, तो वह है-बुद्धि। जहाँ बुद्धि नहीं, वहाँ मनुष्य, मनुष्य नहीं, वह बिना सींग-पूँछ का एक तुच्छ प्राणी मात्र रह जाता है। बुद्धि के द्वारा ही जीवन में गलत- सही, उत्कृष्ट-निकृष्ट, धर्म-अधर्म,कार्य-अकार्य की ठीक-ठीक निर्णय होता है। जिस तरह किसी यान में लगा हुआ प्रकाश यन्त्र चालक को सही मार्ग का दर्शन कराता है, उसी तरह मानव शरीर में बुद्धि का स्थान है। बुद्धि ही ऐसी कसौटी है, जिस पर मनुष्य जीवन को, जगत को परख कर ठीक-ठीक निर्णय पर पहुँच सकता है। जिस तरह नेत्रहीन के लिए मनोरम दृश्य व्यर्थ है उसी तरह बुद्धि-हीन के लिए जीवन और जगत के मधुर रहस्य, शास्त्र-वार्ता, ज्ञान-विज्ञान व्यर्थ है और उनके बिना जीवन जड़ है, पशु तुल्य है। इसीलिए हमारे यहाँ बुद्धि को शुद्ध-निर्मल बनाने के लिए बहुत जोर दिया गया है। संसार में जो भी गति, उन्नति-प्रगति, विकास, खोज, अन्वेषण हो रहे हैं, यह सब बुद्धि की ही देन हैं।

        “बुद्धेर्बुद्धिमताँ लोके नास्त्यगम्यं हि किंचन।  बुद्धथा यतो हता नन्दाश्चाणक्ये नासिपाणयः॥”

    “बुद्धिमानों की बुद्धि के समक्ष संसार में कुछ भी असाध्य नहीं है। बुद्धि से ही शस्त्र-हीन चाणक्य ने सशस्त्र नन्दवंश का नाश कर डाला।”

    मनुष्य के हाथ पैरों की, शरीर की स्थूल शक्ति सीमित है। यह प्रत्यक्ष में अपनी सीमा तक ही कारगर सिद्ध होती है, लेकिन बुद्धि की शक्ति बहुत अधिक व्यापक है। यह दूर, आते दूर तक भी प्रभाव डाल सकती है।

“दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू याम्याँ दूरे हिनस्ति सः।” बुद्धिमान की भुजायें बड़ी लम्बी होती हैं, जिनसे वह दूर तक वार कर सकता है। महर्षि व्यास के अनुसार “बुद्धि श्रेष्ठानि कर्माणि” बुद्धि से विचारपूर्वक किए गये कार्य ही श्रेष्ठ होते हैं।

    बुद्धि मनुष्य के लिए दैवी विभूतियों में उच्च कोटि का वरदान है। इसके सहारे मनुष्य अपने जीवन को अधिक उन्नत, प्रभावशाली बना सकता है। संसार में जो कुछ मनुष्य कृत उपलब्ध है, वह बुद्धि की ही देन है। कहावत है-बुद्धिमान का एक दिन मूर्ख के जीवन भर के बराबर होता है।

    बुद्धि का विकास करना जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। बुद्धि को विकसित, संस्कारित और समर्थ बनाने की प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यकता है। इसलिए कि वह अधिकाधिक उत्कृष्ट जीवन बिता सके, मानवीय गरिमा को आत्मसात् कर सके। बुद्धि को अधिकाधिक प्रौढ़, व्यापक बनाने के लिए ज्ञान की साधना, विचारों की अर्चना करना आवश्यक है। ज्ञान, विचार-साधना के क्षेत्र में हम जितने अधिक प्रयत्न करेंगे, उतना ही हमारी बुद्धि का विकास होगा।

    बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए सर्वोपरि आवश्यकता है ‘सीखने और सिखाने की तीव्र लगन की।’ सीखने के लिए मानव जाति का संचित अब तक का ज्ञान कुछ कम नहीं है। नाना क्षेत्रों में ज्ञान का अथाह भण्डार भरा पड़ा है। इसके अतिरिक्त संसार की खुली पुस्तक से हर समय कुछ न कुछ सीखने को मिलता ही रहता है। दूसरी बात है, सीखे हुए को सिखाने की। दूसरों को सिखाने से भी बुद्धि का विकास होता है। वस्तुतः दूसरों के माध्यम से ही जो कुछ सीखा हुआ है, वह परिष्कृत होता है।

    सीखने के क्षेत्र में दूसरों के विचारों से परहेज नहीं करना चाहिए। खासकर हमारे यहाँ की यह विशेषता है और हमारी परम्परा ही कुछ ऐसी रही है, जिसके अनुसार हमने किसी के भी विचार से परहेज नहीं किया। संसार भर के विचारों का हमने प्रयोग किया और जो उपयुक्त लगा उसे स्वीकार करने में आना-कानी नहीं की। बुद्धि की साधना करने वाले के लिए अपनी ग्रहण शक्ति को एकाँगी नहीं बनाना चाहिए। अपने आपको किसी एक ही विचारधारा में कैद नहीं कर लेना चाहिए। जो ऐसी भूल कर बैठते हैं, उनकी बुद्धि भी एकाँगी बन जाती है। वह नाना दिशाओं में विकसित नहीं हो पाती।

    बुद्धि के साधक लिए-ज्ञान की उपासना करने वाले को किसी भी स्थिति में पहुँचकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि बस, अब इतिश्री हो चुकी। स्मरण रखिये, ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। यह नित नूतन विकास क्रम की गोद में पलता है, इसीलिए बुद्धि की भी कोई सीमा नहीं हो सकती। उसके लिए भी विकसित होने के नित नये अध्याय खुलते रहते हैं। प्रसिद्ध विचारक बेकन ने कहा है “ईश्वर ने बुद्धि की कोई सीमा निश्चित नहीं की है।”

    ज्ञानार्जन के लिए अपने बुद्धि के यन्त्र को सब क्षेत्रों में, सब संस्थाओं में, सब प्रणालियों में घुसकर सीखने दें। किसी एक-संस्था, विचार-प्रणाली, नियम में आबद्ध न करें। जहाँ-जहाँ भी ज्ञान के नये स्रोत प्रकाश में आवें, वहाँ-वहाँ ही आप प्रवेश कीजिए-सीखिए। अध्यात्म, समाजशास्त्र, परिवार, अर्थ विज्ञान, नीति, सदाचार, राजनीति, विज्ञान, जन-सेवा, मानस-शास्त्र, धर्म-संस्कृति सभी विषयों, सभी क्षेत्रों में अपनी गति रखें। आपके ज्ञानार्जन का क्षेत्र जितना व्यापक होगा, उतनी ही आपकी बुद्धि भी विशाल-व्यापक बनेगी।

    नीतिकार ने कहा है- “दृष्टि पूर्तन्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलं।” देखकर कदम रखिये, छानकर पानी पीजिये। सब ओर से जानकारी किया हुआ खरा उतरे, उसे व्यवहार में लाइये। किसी भी बात को इसलिए मत मान लें कि किसी व्यक्ति विशेष ने कहा है या वह किसी ग्रन्थ में लिखी है अथवा एक बहुत बड़ा मानव समुदाय उसके अनुसार चलता है। प्रत्येक बात, विचार, परम्परा को मौलिक चिन्तन की कसौटी पर ही सही-सही परखे बिना व्यवहार में नहीं लाना चाहिए।

    बुद्धि को किसी भी तरह आग्रह प्रधान, मोहासक्त एकांगी नहीं रखना चाहिए। पुरातन का ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए तो वर्तमान का भी। लेकिन ग्रहण वही करना चाहिए जो अपने स्वतन्त्र विचार की कसौटी पर, अपने तथा समाज के लिए हितकर सिद्ध हो। हममें से बहुत कम लोग ही इस तरह बुद्धि को स्वतन्त्र रख पाते हैं। हममें से अधिकाँश तो किन्हीं संस्थाओं, विचार प्रणालियों, चली आ रही मान्यताओं अथवा नये विचारों को आँख मूँद कर बुद्धि पर पर्दा डालकर मान लेने के अभ्यासी हैं। हमारे जो विश्वास बन गये हैं जो मान्यतायें हमारी हैं, उनसे हम इस तरह चिपक जाते हैं कि उनसे परे-कुछ सोचने, समझने, मानने की गुंजाइश ही नहीं रहने देते। लेकिन इस तरह को प्रवृत्ति बुद्धि की विकसित न कर उसे कुण्ठित करना ही है। इसलिए सब पढ़ लिख कर, देखकर सुनकर भी बुद्धि को स्वतन्त्र रखना, उसमें मौलिकता का जीवन डालना आवश्यक है।

    स्वतन्त्र बुद्धि की कसौटी पर जो सत्य लगे उसे अपने तक ही सीमित न रखकर, उसे स्वतन्त्रता पूर्वक व्यक्त करने, दूसरों को सिखाने की क्षमता और साहस का होना भी आवश्यक है। बहुत से लोग बड़े बुद्धिमान होते हैं, निर्णय पर भी पहुँच जाते हैं लेकिन वे साहस के साथ अपने अनुभव को प्रकट नहीं करते। उक्त प्रकार से बुद्धि को दबाने पर वह कुण्ठित हो जाती है, उसकी क्षमता नष्ट हो जाती है।

    आप जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, उसे साहस के साथ प्रकट कीजिए, दूसरों को सिखाइये। चाहे आपको कितने ही विरोध-अवरोधों का सामना करना पड़े, आपकी बुद्धि जो निर्णय देती है, उसका गला न घोटें। आप देखेंगे कि इससे और आपकी बुद्धि अधिक कार्य कुशल समर्थ बनेगी।

    एक किस्सा सुनें।

सभी कैंडिडेट के इंटरव्यू हो चुके थे। बुद्धि शर्मा और ज्ञान प्रकाश आहूजा ये दो कैंडिडेट थे जो डिग्री और नॉलेज सहित हर लिहाज से बिल्कुल बराबर थे, लेकिन मैनेजर तो किसी एक को ही बना सकते थे। पूरा इंटरव्यू पैनल तय नहीं कर पा रहा था किसे मैनेजर बनाएं और किसे "बैटर लक नेक्स्ट टाइम" कहें?

    कंपनी के सीईओ कबीर मेहता तक ये बात पहुँची कि पैनल मैनेजर के लिए एक नाम नहीं तय कर पा रहा है। उन्होंने दो कागज के टुकड़े लिए और उनपर 5-5 सवाल लिखे। एक कागज उन्होंने बुद्धि शर्मा और एक कागज ज्ञान प्रकाश आहूजा को दिया।

    सीईओ ने बोलना शुरू किया "आप दोनों को इन पांच सवालों के जवाब लिखकर मुझे ये कागज वापस देना है। जिसने भी ये कागज कम समय में लौटा दिया, वहीं इस कंपनी का मैनेजर होगा। हर सही जवाब के लिए आपके टाइम में से एक सैकंड कम हो जाएगा और हर गलत जवाब के लिए दो सैकंड आपके टाइम में जुड़ जाएंगे।" "औऱ हां, आप चाहें तो जवाब गूगल पर भी ढूंढ़ सकते हैं"

    ज्ञान का जनरल नॉलेज बहुत अच्छा था। इसके लिए वो कई प्राइज भी जीत चुका था। वो बहुत खुश था। मन ही मन सोच रहा था "इस टेस्ट में तो मैं ही अव्वल आऊंगा"

    ...लेकिन जैसे ही उसने सवाल पढ़े उसका सारा कॉन्फिडेंस काफूर हो गया।

    सवाल ये थे...

    1. चांद पर कदम रखने वाले 18वे इंसान का नाम क्या था?

    2. क्रिकेट इतिहास का 1335वां रन किस खिलाड़ी ने बनाया था?

    3. भारत में सबसे पहले चाय किस महिला/पुरुष ने बनाई थी?

    4. महात्मा गांधी की हाइट कितनी थी?

    5.दुनिया की सबसे पहली कविता किस महिला/पुरुष ने लिखी थी?

    ज्ञान ने मोबाइल निकालकर गूगल ओपन किया। वो पहले सवाल का जवाब सर्च कर ही रहा था तब तक बुद्धि अपना कागज जवाब लिखकर सीईओ को वापस दे चुकी थी।

    ज्ञान की दुविधा बढ़ गई। एक तरफ उसे गूगल पर भी सवालों के जवाब नहीं मिल रहे थे और दूसरी तरफ वो ये समझ नहीं पा रहा था कि बुद्धि ने सवाल इतनी जल्दी कैसे सॉल्व कर दिए।

    30 मिनट बाद भी जब एक भी सवाल का जवाब नहीं मिला तो ज्ञान ने अपने कागज वापिस दे दिया।

    सीईओ ने बुद्धि शर्मा को नया मैनेजर घोषित कर दिया।

    ज्ञान ने हिचकते हुए सीईओ से पूछा "सर, क्या मैं जान सकता हूं कि इन सवालों के जवाब क्या है"?

    "क्यों नही" ये कहते हुए सीईओ ने बुद्धि का जवाब लिखा हुआ कागज ज्ञान को दे दिया।

    बुद्धि के जवाब पढ़ते ही ज्ञान का पारा चढ़ गया। "अगर इस लड़की को ही जॉब देनी थी तो इंटरव्यू का दिखावा क्यों किया। इसने हर सवाल के जवाब में लिखा है-आई गोट इट।"

    सीईओ मुस्कुराए और कहा "तुमने शुरुआत में मेरे इंस्ट्रक्शन ध्यान से नहीं सुने। मैंने कहा था जो ये कागज कम समय में लौटाएगा वो इस कंपनी का मैनेजर होगा। बुद्धि ने 15 सैकंड में मुझे ये कागज लौटा दिया। उसके पांचों जवाब गलत थे इसलिए 10 सैकंड की पेनल्टी के बाद भी उसका टाइम 25 सैकंड ही था। जबकि तुम्हारा टाइम पेनल्टी जोड़कर 30 मिनट 10 सैकंड था। अब तुम बताओ मैनेजर की पोस्ट के लिए सही कैंडिडेट कौन है-तुम या बुद्धि।"

    ज्ञान निशब्द था।

    हर आदमी विद्या बुद्धि की शक्ति से सम्पन्न नहीं होता। किन्हीं बिरलों को ही यह ज्ञान सम्पदा मिलती है। सृष्टि में चौरासी लाख प्रकार के जीव जन्तु, कीट-पतंग, पशु-पक्षी बताये जाते हैं, इनमें नाममात्र की बुद्धि होती है, उसके सहारे वे बेचारे मुश्किल से अपनी जीवन यात्रा पुरी कर पाते हैं। उनका बुद्धिबल इतना कम होता है कि कई बार तो उन बेचारों को छोटी-2 अड़चनों के कारण अपने प्राण तक गंवाने पड़ते और आये दिन तरह-तरह के दुख भोगने पड़ते हैं। यदि उनकी बुद्धि थोड़ी अधिक विकसित रही होती तो वे भी मनुष्य की भाँति सुखी और समृद्ध रहे होते। परन्तु कर्म की गहन गति के कारण उन्हें वह साधन प्राप्त नहीं है, फलस्वरूप मनुष्य की अपेक्षा कई दृष्टियों से अधिक सक्षम होते हुए भी जैसे तैसे जीवन का भार ढो रहे हैं।

    मनुष्य अनेकों अन्य जीव जन्तुओं की तुलना में बहुत पिछड़ा हुआ है। पक्षियों की तरह वह आकाश में नहीं उड़ सकता, कच्छ-मच्छ की तरह जल में किलोल नहीं कर सकता, हिरन और घोड़े की बराबर दौड़ नहीं सकता, हाथी की बराबर बोझ नहीं ले जा सकता, सिंह-व्याघ्र जैसा बलवान नहीं, भेड़-बकरी की तरह घासपात खाकर गुजारा नहीं कर सकता, उल्लू और चमगादड़ की तरह रात्रि में भली प्रकार देख नहीं सकता, ऊंट की तरह कई दिन बिना खाये नहीं गुजार सकता, सर्प की तरह सैकड़ों वर्ष नहीं जी सकता, जुगनू की तरह चमक नहीं सकता, मोर सा सुन्दर नहीं, बन्दर सी छलाँग नहीं मार सकता, सर्दी-गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, इतना निर्बल, पिछड़ा हुआ होते हुए भी अन्य समस्त जीव जन्तुओं से वह आगे बढ़ा हुआ है, सृष्टि का मुकुटमणि है, सबका नेता तथा स्वामी है, इतनी बड़ी सफलता का कारण है उसका बुद्धि बल। इस बुद्धि बल ने ही उसे एक साधारण प्राणी से महान मानव बना दिया है।

    नीति का वचन है कि “बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धिस्य कुतोबलम्” जिसमें बुद्धि है उसमें बल है, निर्बुद्धि में बल कहाँ से आया? जो जितना ही बुद्धिमान है वह उतना ही बलवान है। बुद्धिहीन का सारा बल निष्फल हो जाता है। मनुष्य ने इस बुद्धि बल के द्वारा ही इतना प्रभुत्व प्राप्त किया है। इसी की न्यूनाधिकता के कारण मनुष्य-2 के बीच में अन्तर दिखाई देता है। साधारणतः मानव प्राणियों के शरीर और आकृति में कोई भारी अन्तर नहीं होता, फिर भी राजा-रंक, धनी-दरिद्र, विद्वान-मूर्ख, सत्तारूढ़-पराश्रित, शोषक-शोषित, पुण्यात्मा-पापी, महापुरुष-दीनहीन, चतुर-भोंदू के बीच जमीन आसमान का अन्तर पाया जाता है। एक पालकी में बैठकर चलता है एक पालकी को उठाता है। एक की उंगलियों के इशारे पर लाखों करोड़ों प्राणियों की गतिविधि होती है, एक दूसरों द्वारा कठपुतली की तरह नचाया जाता है। एक का सर्वत्र जयघोष होता है और उसके चरणों पर सर्वस्व अर्पित किया जाता है। दूसरी ओर एक ऐसा व्यक्ति है जिसे कोई आँख उठाकर भी नहीं देखता। इतना भारी अन्तर शरीरों के कारण नहीं, बुद्धिबल के कारण है, जिसमें जितना बुद्धि तत्व अधिक है वह उतना ही बड़ा आदमी बन जाता है।

    बुद्धि की महत्ता सर्वोपरि है। यह मनुष्य के लिए एक ईश्वरीय वरदान है। सृष्टि के सब जीवों को यह बुद्धिबल प्राप्त नहीं है, यहाँ तक कि सब मनुष्यों को भी वह पर्याप्त मात्रा में प्राप्त नहीं है। असंख्य मनुष्य ऐसे है जिनके पास नाम मात्र का बुद्धि तत्व है। उसकी मात्रा इतनी न्यून है कि जीवन यापन का कार्य चलाने के अतिरिक्त उसके द्वारा और कोई बड़ा काम नहीं कर सकते, उस थोड़ी सी बुद्धि से जब वे अपना उदर पोषण ही मुश्किल से कर पाते हैं तो उसके द्वारा कोई महान कार्य करना, यश प्राप्त करना या दूसरों का उपकार करना किस प्रकार संभव है? बहुत थोड़े मनुष्य इस संसार में ऐसे हैं जिनको विशिष्ट बुद्धिबल प्राप्त है, जो दूर की सोच सकते हैं, जिनको बारीक बातें सोचने की क्षमता है, जिनका विवेक परिमार्जित है, जो बहुश्रुत हैं, जिन्होंने विशाल अध्ययन किया है एवं जो अपने बुद्धिबल से असाधारण कार्य करने की क्षमता रखते हैं।

    यह बुद्धिबल परमात्मा ने जिन विशिष्ट व्यक्तियों को दिया है वह एक विशेष उद्देश्य से दिया है। ज्ञान परमात्मा की अमानत है, धरोहर है, वह इसलिए दी गई है कि इस अमानत को वह परमात्मा की इच्छानुसार उसके बताये हुए प्रयोजनों के लिए खर्च करे। जिस किसी को भी परमात्मा असाधारण विशेषताएं देता है, इसी उद्देश्य से देता है कि वह उनके द्वारा सृष्टि के अन्य प्राणियों को लाभ पहुँचावे। जिन मनुष्यों को असाधारण बुद्धिबल दिया गया है उनके लिए परमात्मा ने यह कर्त्तव्य नियत कर दिया है कि वे उस शक्ति को अपने से कमजोरों के लिए, कम बुद्धि वालों के लिए निरन्तर वितरण करते रहें।

    बुद्धिमानों का परम पवित्र उत्तर दायित्व यह है कि वे अपने बुद्धिबल को जन कल्याण के लिए लगावें। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि हमने परिश्रमपूर्वक इतनी विद्या प्राप्त की है तो इससे हम भोग ऐश्वर्य उठाकर ऐश आराम क्यों न करें? मजे-मौज क्यों न उड़ावें? ठाठ-बाट जमाने और गुलछर्रे उड़ाने में इसका उपयोग क्यों न करें? ऐसा सोचना उचित नहीं। एक राजा अपने नौकरों को नियत मात्रा में वेतन देता है, जिससे वे अपना गुजारा कर सकें परन्तु किसी विशेष कर्मचारी को वह विश्वास पात्र समझ कर उसे खजांची नियुक्त करता है और उसके पास बड़ी-बड़ी रकमें जमा करता है। यह रकमें इसलिए खजांची को दी जाती है कि वह उन्हें सुरक्षित रखे और सिर्फ उन कामों में खर्च करे जिनके लिए राजा आज्ञा दे, राज का हित हो। यदि वह खजांची इस प्रकार सोचने लगे कि राजा मुझ पर प्रसन्न है, उसने मेरी योग्यता के अनुसार मेरे पास इतना धन रख दिया है तो मुझे यह अधिकार है कि मैं इसका मनमाना उपयोग क्यों न करूं? अपने मौज मजे के लिए यह धन क्यों न खर्च करूं? तो ऐसा सोचना उस खजांची के लिए अनुचित होगा। यदि खजांची को मौज मजा करने के लिए इतना धन राजा ने दे दिया है तो अन्य कर्मचारी, जो उसी प्रकार दिन भर परिश्रम करते हैं, उन्हें भी उतना-उतना ही धन उसी प्रकार खर्च करने के लिए क्यों नहीं दिया? यदि नहीं दिया तो राजा को पक्षपाती ठहराया जायगा। यही बात परमात्मा के बारे में कही जा सकती है।

    जो व्यक्ति इस विज्ञानरूपी ब्रह्म की उपासना करता है, यह वैज्ञानिक कहाता है, ( भागवत में श्री कृष्ण के अनुसार जो मेरे सगुण निराकार रूपों को जानता है। मेरी लीलाओ को वर्णन करता है वह विज्ञानी है। जो मेरे निर्गुण निराकार रूप को जानता है व्ह ज्ञानी है।)

वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने में समर्थ हो इसीलिए विज्ञान को जानना चाहिए, विज्ञान की उपासना (अनुसंधान) करनी चाहिए, विज्ञान को सिद्ध करके ब्रह्मबोध का प्रयोग करके मोक्षकाम होना चाहिए। हमारे यहां शालिहोत्र संहिता का पशु विज्ञान, अगस्त्य संहिता का विद्युत विज्ञान, भारद्वाज संहिता का वैमानिक विज्ञान, चरक संहिता का चिकित्सा विज्ञान, भृगु संहिता का अन्तरिक्ष विज्ञान, वशिष्ठ संहिता का युद्ध विज्ञान आदि सबके सब विज्ञान से भरे हैं।

लेकिन ज्ञान को निरंन्तर ही प्राप्त करने की चेष्टा भी करनी चाहिये।

    भगवान भी गीता में कहते हैं :- ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्यामि, मैं तुम्हें विज्ञानसहित ज्ञान का उपदेश कर रहा हूँ। हमारे यहां विज्ञान और धर्म भिन्न हैं ही नहीं।

किन्तु यह ध्यान में रहे कि जो पाश्चात्य म्लेच्छ मंदबुद्धि कथित वैज्ञानिकों ये कहते रहते हैं, और जिनके खुद के सिद्धांत और खोज हर बीस तीस सालों में बदलते रहते हैं, उन गली के कुत्ते के समान लक्ष्यहीन केवल आधिभौतिक पटल पर विराजित अनुसंधानों को, जो कथित रूप से स्वयं को पूर्ण वैज्ञानिक मानते हैं, उनकी बातों की अपेक्षा सनातन के आधिभौतिक के साथ साथ आधिदैविक और आध्यात्मिक पटल पर विराजित कल्याणप्रद विज्ञान की ओर भी परम्परा के अनुसार, मर्यादा के अनुसार, अधिकृत रीति से तपोबल के माध्यम से अनुसंधान करें।

मन की सङ्कल्प विकल्प की अद्भुत शक्ति का प्रयोग करें। मनसस्तु परा बुद्धि: यो बुद्धे: परतस्तु सः। मन से बड़ी बुद्धि और बुद्धि से बड़े आत्मरूप आप चेतन ब्रह्म हैं।                  

MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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इस ब्लाग पर प्रकाशित साम्रगी अधिकतर इंटरनेट के विभिन्न स्रोतों से साझा किये गये हैं। जो सिर्फ़ सामाजिक बदलाव के चिन्तन हेतु ही हैं। कुलेखन साम्रगी लेखक के निजी अनुभव और विचार हैं। अतः किसी की व्यक्तिगत/धार्मिक भावना को आहत करना, विद्वेष फ़ैलाना हमारा उद्देश्य नहीं है। इसलिये किसी भी पाठक को कोई साम्रगी आपत्तिजनक लगे तो कृपया उसी लेख पर टिप्पणी करें। आपत्ति उचित होने पर साम्रगी सुधार/हटा दिया जायेगा।


Friday, July 5, 2019

दश महाविद्या के दस शिवावतार

                      दश महाविद्या के दस शिवावतार


सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"

 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
वैज्ञानिक अधिकारी, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
 फोन : (नि.) 022 2754 9553  (का) 022 25591154   
मो.  09969680093
  - मेल: vipkavi@gmail.com  वेब:  vipkavi.info वेब चैनलvipkavi
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दस महाविद्या के बारे में कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। सारी शक्ति एवं सारे ब्रह्मांड की मूल में हैं ये दस महाविद्या। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक जिन जालों में उलझा रहता है और जिस सुख तथा अंतत: मोक्ष की खोज करता है, उन सभी के मूल में मूल यही दस महाविद्या हैं। दस का सबसे ज्यादा महत्व है। 

 

 

संसार में दस दिशाएं स्पष्ट हैं ही, इसी तरह 1 से 10 तक के बिना अंकों की गणना संभव नहीं है। ये दशों महाविद्याएं आदि शक्ति माता पार्वती की ही रूप मानी जाती हैं। 

 

 

कथा के अनुसार महादेव से संवाद के दौरान एक बार माता पार्वती अत्यंत क्रुद्ध हो गईं। क्रोध से माता का शरीर काला पडऩे लगा। यह देख विवाद टालने के लिए शिव वहां से उठ कर जाने लगे तो सामने दिव्य रूप को देखा। फिर दूसरी दिशा की ओर बढ़े तो अन्य रूप नजर आया। बारी-बारी से दसों दिशाओं में अलग-अलग दिव्य दैवीय रूप देखकर स्तंभित हो गए। तभी सहसा उन्हें पार्वती का स्मरण आया तो लगा कि कहीं यह उन्हीं की माया तो नहीं। उन्होंने माता से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि आपके समक्ष कृष्ण वर्ण में जो स्थित हैं, वह सिद्धिदात्री काली हैं। ऊपर नील वर्णा सिद्धिविद्या तारा, पश्चिम में कटे सिर को उठाए मोक्षा देने वाली श्याम वर्णा छिन्नमस्ता, वायीं तरफ भोगदात्री भुवनेश्वरी, पीछे ब्रह्मास्त्र एवं स्तंभन विद्या के साथ शत्रु का मर्दन करने वाली बगला, अग्निकोण में विधवा रूपिणी स्तंभवन विद्या वाली धूमावती, नेऋत्य कोण में सिद्धिविद्या एवं भोगदात्री दायिनी भुवनेश्वरी, वायव्य कोण में मोहिनीविद्या वाली मातंगी, ईशान कोण में सिद्धिविद्या एवं मोक्षदात्री षोडषी और सामने सिद्धिविद्या और मंगलदात्री भैरवी रूपा मैं स्वयं उपस्थित हूं। उन्होंने कहा कि इन सभी की पूजा-अर्चना करने में चतुवर्ग अर्थात- धर्म, भोग, मोक्ष और अर्थ की प्राप्ति होती है। इन्हीं की कृपा से षटकर्णों की सिद्धि तथौ अभिष्टि की प्राप्ति होती है। शिवजी के निवेदन करने पर सभी देवियां काली में समाकर एक हो गईं।

महाविद्या के शिव

हिन्दू धर्म में देवों के देव महादेव पुकारे जाने वाले भगवान शिव मूर्त या सगुण और अमूर्त या निर्गुण रूप में पूजे जाते हैं। ऐसा शास्त्रों में वर्णन आता है की शिव बिना उनकी शक्ती के शव हैं और शक्ति बिना शिव में शून्य है। भगवान शंकर और मूल शक्ति (देवी) के दस प्रमुख स्वरूपों के बारे में पुराणों में वर्णन मिलता है। वेदों के अनुसार शिव का एक नाम ‘रुद्र’ भी है। रुद्र का अर्थ है भयानक तथा दुख से मुक्ति दिलाने वाला। भगवान शंकर संहार के देवता हैं। साथ ही साथ शिव परम कल्याणकारी हैं। शास्त्रों के अनुसार शिव के दस रुद्रावतार व्यक्ति को सुख, समृद्धि, भोग, मोक्ष प्रदान करने वाले एवं व्यक्ति की दसों दिशाओं से रक्षा करने वाले हैंं।

1. महाकालेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस रुद्रावतारों में पहला अवतार महाकाल माने जाते हैं। महाकेश्वर का स्वरुप श्यामवर्णी है और ये काल के भी काल कहे जाते हैं। महाकालेश्वर अवतार की शक्ति महाविद्या महाकाली मानी जाती हैं। उज्जैन में महाकाल नाम से ज्योतिर्लिंग प्रख्यात है। उज्जैन तीर्थ के गढ़कालिका क्षेत्र में मां कालिका उपखंड शक्तिपीठ स्थित है। मूल महाकाली महाविद्या शक्तिपीठ पश्चिमबंगाल के कलकत्ता स्थित महाकाली मंदिर है।

2. तारकेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस रुद्रावतारों में दूसरा अवतार तारकेश्वर (तार) नाम से प्रचलित है। तारकेश्वर का स्वरुप तारे की भांति पीतांबर है अर्थात नीलम लिए हुए पीला। तारकेश्वर अवतार की शक्ति देवी तारा मानी जाती हैं। तारा पीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूम में स्थित द्वारका नदी के पास महाश्मशान में स्थित है।

3.भुवनेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस रुद्रावतारों में तीसरा रुद्रावतार है भुवनेश्वर अर्थात बाल भुवनेश। भुवनेश्वर का स्वरुप शीतल श्वे़त है। भुवनेश्वर अवतार की शक्ति को भुवनेश्वरी (बाला भुवनेशी) कहा जाता है। दस महाविद्या में से एक देवी भुवनेश्वरी की शक्तिपीठ उत्तराखंड में है।

4. षोडेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस रुद्रावतारों में चौथा अवतार है षोडेश्वर अर्थात षोडश श्रीविद्येश। षोडेश्वर का स्वरुप सोलह कलाओं वाला है। षोडेश्वर अवतार की शक्ति महाविद्या षोडशी श्रीविद्या को माना जाता है। ‘दस महा-विद्याओं’ में तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं।

5. भैरवनाथ रुद्रावतार: शिव के दस रुद्रावतारों में पांचवें रुद्रावतार भैरवनाथ अर्थात भैरव माने गए हैं। भैरवनाथ के 52 स्वरुप माने गए हैं तथा मूलतः भैरव तामसिक देव कहे जाते हैं और इन्हें दिशाओं का रक्षक माना जाता है। भैरवनाथ अवतार की शक्ति भैरवी मानी गई हैं। दशमहाविद्या की सारिणी में इस आदिशक्ति को त्रिपुर भैरवी गिरिजा भैरवी कहा गया है। शक्तिपीठों के वर्णन में जहां देवी के ओष्ठ गिरे थे उस स्थान को उज्जैन के शिप्रा नदी तट स्थित भैरव पर्वत पर मां भैरवी का शक्तिपीठ माना गया है।

6. दमोदेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस रुद्रावतारों में छठा अवतार दमोदेश्वर अर्थात छिन्नमस्तक नाम से प्रचलित है। इस अवतार की शक्ति देवी छिन्नमस्ता मानी जाती हैं। छिनमस्तिका मंदिर प्रख्यात तांत्रिक पीठ है। दस महाविधाओं में से एक छिन्नमस्तिका का विख्यात मंदिर चिंतपूर्णी नाम से भी प्रसिद्द है। शास्त्रों के अनुसार दामोदर-भैरवी नदी के संगम पर स्थित इस पीठ को शक्तिपीठ माना जाता है। दामोदर को शिव व भैरवी को शक्ति माना जाता है।

7. धूमेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस प्रमुख रुद्र अवतारों में सातवां अवतार धूमेश्वर अर्थात द्यूमवान नाम से प्रख्यात है। धूमेश्वर का स्वरुप धुम्रवर्ण अर्थात धुएं जैसा है। धूमेश्वर अवतार की महाविद्या को देवी धूमावती माना गया है। संपूर्ण भारत में धूमावती का एकमात्र मंदिर मध्यप्रदेश के दतिया जिले में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ ‘पीताम्बरा पीठ’ के प्रांगण में स्थित है।

8. बग्लेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस प्रमुख रुद्र अवतारों में आठवां रुद्र अवतार बग्लेश्वर अर्थात बगलामुख नाम से प्रचलित है। बग्लेश्वर का स्वरुप पीला है। इस अवतार की महाविद्या को देवी बगलामुखी माना जाता है। दस महाविद्याओं में से एक बगलामुखी का सबसे प्रचलित मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित बगलामुखी मंदिर है।

9. मतंगेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस प्रमुख रुद्र अवतारों में नौवां अवतार मातंग है। मतंगेश्वर का स्वरुप हरा है। मतंगेश्वर अवतार की शक्ति को महाविद्या देवी मातंगी माना जाता है। देवी मातंगी सनातन धर्म में उच्छिष्ट चंडालिनी के रूप पूजी जाती है। देवी मातंगी का एकमात्र मंदिर मध्यप्रदेश में झाबुआ शहर में स्थित है। ये देवी ब्राह्मणों की कुल देवी भी कहलाई जाती है।

10. कमलेश यां कमलेश्वर रुद्रावतार: शिव के दस प्रमुख रुद्र अवतारों में दसवां अवतार कमलेश यां कमलेश्वर नाम से प्रचलित है। कमलेश्वर का स्वरुप कमल की भांति अष्टदल कारी है अर्थात 64 कलाओं वाला है। इन्हें शिव का कमल स्वरुप भी कहा जाता है। कमलेश्वर अवतार की शक्ति को महाविद्या कमला माना जाता है।

 

MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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इस ब्लाग पर प्रकाशित साम्रगी अधिकतर इंटरनेट के विभिन्न स्रोतों से साझा किये गये हैं। जो सिर्फ़ सामाजिक बदलाव के चिन्तन हेतु ही हैं। कुलेखन साम्रगी लेखक के निजी अनुभव और विचार हैं। अतः किसी की व्यक्तिगत/धार्मिक भावना को आहत करना, विद्वेष फ़ैलाना हमारा उद्देश्य नहीं है। इसलिये किसी भी पाठक को कोई साम्रगी आपत्तिजनक लगे तो कृपया उसी लेख पर टिप्पणी करें। आपत्ति उचित होने पर साम्रगी सुधार/हटा दिया जायेगा।

 


नवदुर्गा की नवऔषधियां

                        नवदुर्गा की नवऔषधियां


सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"

 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
वैज्ञानिक अधिकारी, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
 फोन : (नि.) 022 2754 9553  (का) 022 25591154   
मो.  09969680093
  - मेल: vipkavi@gmail.com  वेब:  vipkavi.info वेब चैनलvipkavi
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नवदुर्गा, यानि मां दुर्गा के नौ रूप। इन 9 औषधि‍यों में भी विराजते हैं, मां अम्बे के यह नौ रूप, जो समस्त रोगों से बचाकर जगत का कल्याण करते हैं। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया और चिकित्सा प्रणाली के इस रहस्य को ब्रह्माजी द्वारा उपदेश में दुर्गाकवच कहा गया है। 

 

ऐसा माना जाता है कि यह औषधि‍यां समस्त प्राणि‍यों के रोगों को हरने वाली और और उनसे बचा रखने के लिए एक कवच का कार्य करती हैं, इसलिए इसे दुर्गाकवच कहा गया। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जीवन जी सकता है। जानिए दिव्य गुणों वाली 9 औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है -


1 प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़ - नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकार की समस्याओं में काम आने वाली औषधि‍ हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। 

इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है। पथया - जो हित करने वाली है।   कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।> अमृता - अमृत के समान

हेमवती - हिमालय पर होने वाली।

चेतकी - चित्त को प्रसन्न करने वाली है।

श्रेयसी (यशदाता) शिवा - कल्याण करने वाली।


2 द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी - ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वाली और स्वर को मधुर करने वाली है। इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है।

यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी की आराधना करना चाहिए।


3 तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर - नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है। यह औषधि‍ मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।

 

4 चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा - नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डा देवी की आराधना करना चाहिए।


5 पंचम स्कंदमाता यानि अलसी - नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है। 

 

अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।

अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।

उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।

इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए। 

 

6  षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया - नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है। इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व  कात्यायनी की आराधना करना चाहिए।

7 सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन - दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है।इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

 

8 अष्टम महागौरी यानि तुलसी - नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।

 

तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।

अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्‍नी देवदुन्दुभि:

तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।

मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।

इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।


9 नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी - नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी या शतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए।

इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए।

 

 

MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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Thursday, July 4, 2019

सर्व विघ्नों का नाश करने वाली ‘महाविद्या तारा’

सर्व विघ्नों का नाश करने वाली ‘महाविद्या तारा’

सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"

 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
वैज्ञानिक अधिकारी, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
 फोन : (नि.) 022 2754 9553  (का) 022 25591154   
मो.  09969680093
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सर्व विघ्नों का नाश करने वाली ‘महाविद्या तारा’, स्वयं भगवान शिव को अपना स्तन दुग्ध पान कराकर हलाहल की पीड़ा से मुक्त करने वाली।

देवी महा-काली ने हयग्रीव नमक दैत्य के वध हेतु नीला वर्ण धारण किया तथा उनका वह उग्र स्वरूप उग्र तारा के नाम से विख्यात हुआ। ये देवी या शक्ति, प्रकाश बिंदु के रूप में आकाश के तारे के समन विद्यमान हैं, फलस्वरूप देवी तारा नाम से विख्यात हैं। शक्ति का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष प्रदान करने वाली तथा अपने भक्तों को समस्त प्रकार के घोर संकटों से मुक्ति प्रदान करने वाली हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध ‘मुक्ति’ से हैं, फिर वह जीवन और मरण रूपी चक्र हो या अन्य किसी प्रकार के संकट मुक्ति हेतु

भगवान शिव द्वारा, समुद्र मंथन के समय हलाहल विष का पान करने पर, उनके शारीरिक पीड़ा (जलन) के निवारण हेतु, इन्हीं ‘देवी तारा’ ने माता के स्वरूप में शिव जी को अपना अमृतमय दुग्ध स्तन पान कराया था। जिसके कारण भगवान शिव को समस्त प्रकार के शारीरिक पीड़ा से मुक्ति मिली, देवी, जगत-जननी माता के रूप में और घोर से घोर संकटों कि मुक्ति हेतु प्रसिद्ध हुई। देवी तारा के भैरव, हलाहल विष का पान करने वाले अक्षोभ्य शिव हुए, जिनको उन्होंने अपना दुग्ध स्तन पान कराया। जिस प्रकार इन महा शक्ति ने, भगवान शिव के शारीरिक कष्ट का निवारण किया, वैसे ही देवी अपने उपासकों के घोर कष्टों और संकट का निवारण करने में समर्थ हैं तथा करती हैं।

मुख्यतः देवी की आराधना-साधना मोक्ष प्राप्त करने हेतु, वीरा-चार या तांत्रिक पद्धति से की जाती हैं, परन्तु भक्ति भाव युक्त सधाना ही सर्वोत्तम हैं, देवी, के परम भक्त बामा खेपा ने यह सिद्ध भी किया।

संपूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर उधर फैला हुआ हैं, उनके एकत्रित होने पर इन्हीं देवी के रूप का निर्माण होता हैं तथा वह समस्त ज्ञान इन्हीं देवी का मूल स्वरूप ही हैं, कारणवश इनका एक नाम नील-सरस्वती भी हैं।

देवी का निवास स्थान घोर महा-श्मशान हैं, जहाँ सर्वदा चिता जलती रहती हो तथा ज्वलंत चिता के ऊपर, देवी नग्न अवस्था या बाघाम्बर पहन कर खड़ी हैं। देवी, नर खप्परों तथा हड्डियों के मालाओं से अलंकृत हैं तथा सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करती हैं। तीन नेत्रों वाली देवी उग्र तारा स्वरूप से अत्यंत ही भयानक प्रतीत होती हैं।

प्रथम ‘उग्र तारा’, अपने उग्र तथा भयानक रूप हेतु जानी जाती हैं। देवी का यह स्वरूप अत्यंत उग्र तथा भयानक हैं, ज्वलंत चिता के ऊपर, शव रूपी शिव या चेतना हीन शिव के ऊपर, देवी प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी हैं। देवी उग्र तारा, तमो गुण सम्पन्न हैं तथा अपने साधकों-भक्तों के कठिन से कठिन परिस्थितियों में पथ प्रदर्शित तथा छुटकारा पाने में सहायता करती हैं।

द्वितीय ‘नील सरस्वती, इस स्वरूप में देवी संपूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त ज्ञान कि ज्ञाता हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर-उधर बिखरा हुआ पड़ा हैं, उन सब को एकत्रित करने पर जिस ज्ञान की उत्पत्ति होती हैं, वे ये देवी नील सरस्वती ही हैं। इस स्वरूप में देवी राजसिक या रजो गुण सम्पन्न हैं। देवी परम ज्ञानी हैं, अपने असाधारण ज्ञान के परिणाम स्वरूप, ज्वलंत चिता के शव को शिव स्वरूप में परिवर्तित करने में समर्थ हैं।

एकजटा, यह देवी का तीसरे स्वरूप या नाम हैं, पिंगल जटा जुट वाली यह देवी सत्व गुण सम्पन्न हैं तथा अपने भक्त को मोक्ष प्रदान करती हैं मोक्ष दात्री हैं। ज्वलंत चिता में सर्वप्रथम देवी, उग्र तारा के रूप में खड़ी हैं, द्वितीय नील सरस्वती, शव को जीवित कर शिव बनाने में सक्षम हैं तथा तीसरे स्वरूप में देवी एकजटा जीवित शिव को अपने पिंगल जटा में धारण करती हैं या मोक्ष प्रदान करती हैं। देवी अपने भक्तों को मृत्युपरांत, अपनी जटाओं में विराजित अक्षोभ्य शिव के साथ स्थान प्रदान करती हैं या कहे तो मोक्ष प्रदान करती हैं।

देवी अन्य आठ स्वरूपों में ‘अष्ट तारा’ समूह का निर्माण करती है तथा विख्यात हैं,

१. तारा२. उग्र तारा३. महोग्र तारा४. वज्र तारा५. नील तारा६. सरस्वती७. कामेश्वरी८. भद्र काली-चामुंडा

सभी स्वरूप गुण तथा स्वभाव से भिन्न-भिन्न है तथा भक्तों की समस्त प्रकार के मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ, सक्षम हैं।

देवी उग्र तारा के स्वरूप वर्णन का वर्णन।

देवी तारा, प्रत्यालीढ़ मुद्रा (जैसे की एक वीर योद्धा, अपने दाहिने पैर आगे किये युद्ध लड़ने हेतु उद्धत हो) धारण कर, शव या चेतना रहित शिव के ऊपर पर आरूढ़ हैं। देवी के मस्तक पंच कपालों से सुसज्जित हैं, नव-यौवन संपन्न हैं, नील कमल के समान तीन नेत्रों से युक्त, उन्नत स्तन मंडल और नूतन मेघ के समान कांति वाली हैं। विकट दन्त पंक्ति तथा घोर अट्टहास करने के कारण देवी का स्वरूप अत्यंत उग्र प्रतीत होता हैं। देवी का स्वरूप बहुत डरावना और भयंकर हैं तथा वास्तविक रूप से देवी, चिता के ऊपर जल रही शव पर आरूढ़ हैं तथा इन्होंने अपना दाहिना पैर शव रूपी शिव के छाती पर रखा हैं। देवी घोर नील वर्ण की हैं, महा-शंख (मानव कपाल) की माला धारण किये हुए हैं, वह छोटे कद की हैं तथा कही-कही देवी अपनी लज्जा निवारण हेतु बाघाम्बर भी धारण करती हैं। देवी के आभूषण तथा पवित्र यज्ञोपवीत सर्प हैं, साथ ही रुद्राक्ष तथा हड्डियों की बानी हुई आभूषणों को धारण करती हैं। वह अपनी छोटी लपलपाती हुई जीभ मुंह से बाहर निकले हुए तथा अपने विकराल दन्त पंक्तियों से दबाये हुए हैं। देवी के शरीर से सर्प लिपटे हुए हैं, सिर के बाल चारों ओर उलझे-बिखरे हुए भयंकर प्रतीत होते हैं। देवी चार हाथों से युक्त हैं तथा नील कमल, खप्पर (मानव खोपड़ी से निर्मित कटोरी), कैंची और तलवार धारण करती हैं। देवी, ऐसे स्थान पर निवास करती हैं जहाँ सर्वदा ही चिता जलती रहती हैं तथा हड्डियाँ, खोपड़ी इत्यादि इधर-उधर बिखरी पड़ी हुई होती हैं, सियार, गीदड़, कुत्ते इत्यादि हिंसक जीव इनके चारों ओर देखे जाते हैं।

देवी तारा के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा।

स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, देवी तारा की उत्पत्ति मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में, चोलना नदी के तट पर हुई। हयग्रीव नाम के दैत्य के वध हेतु देवी महा-काली ने ही, नील वर्ण धारण किया था। महाकाल संहिता के अनुसार, चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि में ‘देवी तारा’ प्रकट हुई थीं, इस कारण यह तिथि तारा-अष्टमी कहलाती हैं, चैत्र शुक्ल नवमी की रात्रि तारा-रात्रि कहलाती हैं।

एक और देवी तारा के उत्पत्ति संदर्भ कथा ‘तारा-रहस्य नमक तंत्र’ ग्रन्थ से प्राप्त होता हैं; जो भगवान विष्णु के अवतार, श्री राम द्वारा लंका-पति दानव राज दशानन रावण का वध के समय से हैं।

सर्वप्रथम स्वर्ग-लोक के रत्नद्वीप में वैदिक कल्पोक्त तथ्यों तथा वाक्यों को देवी काली के मुख से सुनकर, शिव जी अपनी पत्नी पर बहुत प्रसन्न हुए। शिव जी ने महाकाली से पूछा, आदि काल में अपने भयंकर मुख वाले रावण का विनाश किया, तब आश्चर्य से युक्त आप का वह स्वरूप ‘तारा’ नाम से विख्यात हुआ। उस समय, समस्त देवताओं ने आप की स्तुति की थी तथा आप अपने हाथों में खड़ग, नर मुंड, वार तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थी, मुख से चंचल जिह्वा बहार कर आप भयंकर रुपवाली प्रतीत हो रही थी। आप का वह विकराल रूप देख सभी देवता भय से आतुर हो काँप रहे थे, आपके विकराल भयंकर रुद्र रूप को देखकर, उन्हें शांत करने के निमित्त ब्रह्मा जी आप के पास गए थे। समस्त देवताओं को ब्रह्मा जी के साथ देखकर देवी, लज्जित हो आप खड़ग से लज्जा निवारण की चेष्टा करने लगी। रावण वध के समय आप अपने रुद्र रूप के कारण नग्न हो गई थी तथा स्वयं ब्रह्मा जी ने आपकी लज्जा निवारण हेतु, आपको व्याघ्र चर्म प्रदान किया था। इसी रूप में देवी ‘लम्बोदरी’ के नाम से विख्यात हुई। तारा-रहस्य तंत्र के अनुसार, भगवान राम केवल निमित्त मात्र ही थे, वास्तव में भगवान राम की विध्वंसक शक्ति देवी तारा ही थी, जिन्होंने लंका पति रावण का वध किया।

देवी तारा से सम्बंधित अन्य तथ्य।

सर्वप्रथम वशिष्ठ मुनि ने देवी तारा कि आराधना की थी, परिणाम स्वरूप देवी ’वशिष्ठाराधिता’ के नाम से भी जानी जाती हैं। सर्वप्रथम मुनि-राज ने देवी तारा की उपासना वैदिक पद्धति से कि, परन्तु वे देवी की कृपा प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके। अलौकिक शक्तियों से उन्हें ज्ञात हुआ की देवी की आराधना का क्रम चीन देश में रहने वाले भगवान बुद्ध को ज्ञात हैं, वे उन के पास जाये तथा साधना का सही क्रम, पद्धति जानकर देवी तारा की उपासना करें। तदनंतर वशिष्ठ मुनि ने चीन देश की यात्रा की तथा भगवान बुद्ध से आराधना का सही क्रम ज्ञात किया, जिसे चिनाचार पद्धति, वीर साधना या आगमोक्ता पद्धति (तंत्र) कहा गया। भगवान बुद्ध के आदेश अनुसार उन्होंने चिनाचार पद्धति से देवी की आराधना की तथा देवी कृपा लाभ करने में सफल हुए। (बंगाल प्रान्त के बीरभूम जिले में वह स्थान आज भी विद्यमान हैं, जहाँ मुनिराज ने देवी की आराधना की थी, जिसे जगत-जननी तारा माता के सिद्ध पीठ ‘तारा पीठ’ के नाम से जाना जाता हैं।)

‘तारा’ नाम के रहस्य से ज्ञात होता हैं, ये तारने वाली हैं, मोक्ष प्रदाता हैं। जीवन तथा मृत्यु के चक्र से तारने हेतु, यह नाम ‘तारा’ देवी के नाम-रहस्य को उजागर करता हैं। महाविद्याओं में देवी दूसरे स्थान पर विद्यमान हैं तथा देवी अपने भक्तों को ‘वाक्-शक्ति’ प्रदान करने तथा भयंकर विपत्तिओ से अपने भक्तों की रक्षा करने में समर्थ हैं। शत्रु नाश, भोग तथा मोक्ष, वाक् शक्ति प्राप्ति हेतु देवी कि साधना विशेष लाभकारी सिद्ध होती हैं। सामान्यतः तंत्रोक्त पद्धति से साधना करने पर ही देवी की कृपा प्राप्त की जा सकती हैं।

देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध श्मशान भूमि से हैं, जो उनका निवास स्थान हैं। साथ ही श्मशान से सम्बंधित समस्त वस्तुओं-तत्वों जैसे मृत देह, हड्डी, चिता, चिता-भस्म, भूत, प्रेत, कंकाल, खोपड़ी, उल्लू, कुत्ता, लोमड़ी इत्यादि से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। गुण तथा स्वभाव से देवी तारा, महा-काली से युक्त हैं।

देवी उग्र तारा, अपने भक्तों के जीवन में व्याप्त हर कठिन परिस्थितियों से रक्षा करती हैं। देवी के साधक नाना प्रकार के सिद्धियों के युक्त होते हैं, गद्ध-पद्ध-मयी वाणी साधक के मुख का कभी परित्याग नहीं करती हैं, त्रिलोक मोहन, सुवक्ता, विद्याधर, समस्त जगत को क्षुब्ध तथा हल-चल पैदा करने में साधक पूर्णतः समर्थ होता हैं। कुबेर के धन के समान धनवान, निश्चल भाव से लक्ष्मी वास तथा काव्य-आगम आदि शास्त्रों में शुक देव तथा देवगुरु बृहस्पति के तुल्य हो जाते हैं, मूर्ख हो या जड़ वह बृहस्पति के समान हो जाता हैं। साधक ब्रह्म-वेत्ता होने का सामर्थ्य रखता हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के की साम्यता को प्राप्त कर, समस्त पाशों से मुक्त हो ब्रह्मरूप मोक्ष पद को प्राप्त करते हैं। पशु भय वाले इस संसार से मुक्ति लाभ करता हैं या अष्ट पाशों (घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति) में बंधे हुए पशु आचरण से मुक्त हो, मोक्ष (तारिणी पद) को प्राप्त करने में समर्थ होता हैं।

देवी काली तथा तारा में समानतायें।

देवी काली ही, नील वर्ण धारण करने के कारण ‘तारा’ नाम से जानी जाती हैं तथा दोनों का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। जैसे दोनों शिव रूपी शव पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये हुए आरूढ़ हैं, अंतर केवल देवी काली शव रूपी शिव पर आरूढ़ हैं तथा देवी तारा जलती हुई चिता पर आरूढ़ हैं। दोनो। दोनों का निवास स्थान श्मशान भूमि हैं, दोनों देवियों की जिह्वा मुंह से बाहर हैं तथा भयंकर दन्त-पंक्ति से दबाये हुए हैं, दोनों रक्त प्रिया हैं, भयानक तथा डरावने स्वरूप वाली हैं, भूत-प्रेतों से सम्बंधित हैं, दोनों देवियों का वर्ण गहरे रंग का हैं एक गहरे काले वर्ण की हैं तथा दूसरी गहरे नील वर्ण की। दोनों देवियाँ नग्न विचरण करने वाली हैं, कही-कही देवी काली कटे हुई हाथों की करधनी धारण करती हैं, नर मुंडो की माला धारण करती हैं वही देवी तारा व्यग्र चर्म धारण करती हैं तथा नर खप्परों की माला धारण करती हैं। दोनों की साधना तंत्रानुसार पंच-मकार विधि से की जाती हैं, सामान्यतः दोनों एक ही हैं इनमें बहुत काम भिन्नताएं दिखते हैं। दोनों देवियों का वर्णन शास्त्रानुसार शिव पत्नी के रूप में किया गया हैं तथा दोनों के नाम भी एक जैसे ही हैं जैसे, हर-वल्लभा, हर-प्रिया, हर-पत्नी इत्यादि, ‘हर’ भगवान शिव का एक नाम हैं। परन्तु देवी तारा ने, भगवान शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर, अपना स्तन दुग्ध पान कराया था। समुद्र मंथन के समय कालकूट विष का पान करने के परिणाम स्वरूप, भगवान शिव के शरीर में जलन होने लगी तथा वे तड़पने लगे, देवी ने उन के शारीरिक कष्ट को शांत करने हेतु अपने अमृतमय स्तन दुग्ध पान कराया। देवी काली के सामान ही देवी तारा का सम्बन्ध निम्न तत्वों से हैं

श्मशान वासिनी :तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी देवता मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वह स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही हैं, यह वह स्थान हैं जहाँ ‘पंच या पञ्च महाभूत’ या देह में विद्यमान स्थूल तत्त्व, चिद्-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतों से संसार के समस्त जीवों के देह का निर्माण होता हैं, समस्त जीव शरीर या देह इन्हीं पंच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वह स्थान हैं जहाँ पञ्च भूत या तत्त्व के मिश्रण से निर्मित देह, अपने-अपने तत्त्व में विलीन हो जाते हैं। तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, श्मशान भूमि को इसी कारण-वश अपना निवास स्थान बनाते हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं, इसका एक और महत्त्वपूर्ण कारण हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं, मानव देह कई प्रकार के विकारों का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं जहाँ इन विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। मन या हृदय भी वह स्थान हैं या कहें तो वह श्मशान हैं, जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं अतः देवी काली-तारा अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं।

चिता : मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर जला देना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी हृदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके।

देवी का आसन : देवी शव रूपी शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं। देवी की कृपा लाभ से ही, देह पर प्राण रहते हैं।

करालवदना या घोररूपा : देवी काली, तारा घनघोर या अत्यंत काले वर्ण की हैं तथा स्वरूप से भयंकर और डरावनी हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के हृदय में स्थित हैं, उन्हें डरने के आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल या यम भी देवी से भय-भीत रहते हैं।

पीनपयोधरा : देवी काली-तारा के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनों लोकों का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं।

प्रकटितरदना : देवी काली-तारा के विकराल दन्त पंक्ति बहार निकले हुए हैं तथा उन दाँतो से उन्होंने अपने जिह्वा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिह्वा को, सत्व गुण के प्रतीक उज्ज्वल दाँतो से दबाये हुए हैं।

मुक्तकेशी : देवी के बाल, घनघोर काले बादलों की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आँधी आने वाली हो।

संक्षेप में देवी तारा से सम्बंधित मुख्य तथ्य।

मुख्य नाम : तारा।अन्य नाम : उग्र तारा, नील सरस्वती, एकजटा।भैरव : अक्षोभ्य शिव, बिना किसी क्षोभ के हलाहल विष का पान करने वाले।भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान राम।कुल : काली कुल।दिशा : ऊपर की ओर।स्वभाव : सौम्य उग्र, तामसी गुण सम्पन्न।वाहन : गीदड़।सम्बंधित तीर्थ स्थान या मंदिर : तारापीठ, रामपुरहाट, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत; सुघंधा, बांग्लादेश तथा सासाराम, बिहार, भारत।कार्य : मोक्ष दात्री, भव-सागर से तारने वाली, जन्म तथा मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त करने वाली।शारीरिक वर्ण : नीला।

द्वितीय महाविद्या तारा की कृपा से सभी शास्त्रों का पांडित्य, कवित्व प्राप्त होता हैं, साधक बृहस्पति के समान ज्ञानी हो जाता हैं। वाक् सिद्धि प्रदान करने से ये नील सरस्वती कही जाती हैं, सुख, मोक्ष प्रदान करने तथा उग्र आपत्ति हरण करने के कारण इन्हें ताराणी भी कहा जाता हैं।

देवी की साधना एकलिंग शिव मंदिर (पाँच कोस क्षेत्र के मध्य एक शिव-लिंग), श्मशान भूमि, शून्य गृह, चौराहे, शवासन, मुंडों के आसन, गले तक जल में खड़े हो कर, वन में करने का शास्त्रों में विधान हैं। इन स्थानों पर देवी की साधना शीघ्र फल प्रदायक होती हैं, विशेषकर सर्व शास्त्र वेत्ता होकर परलोक में ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करता हैं।

मत्स्य सूक्त के अनुसार कोमलासन (जिसका मुंडन संस्कार न हुआ हो या छः से दस मास के भीतर के गर्भच्युत मृत बालक), कम्बल का आसन, कुशासन अथवा विशुद्ध आसन पर बैठ कर ही देवी तारा की आराधना करना उचित हैं। नील तंत्र के अनुसार पाँच वर्ष तक के बालक का मृत देह भी कोमलासन की श्रेणी में आता हैं, कृष्ण मृग या मृग तथा व्याघ्र चर्म आसन पूजा में विहित हैं।

लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कीर्ति, शांति, तुष्टि, पुष्टि रूपी आठ शक्तियां नील सरस्वती की पीठ शक्ति मानी जाती हैं, देवी का वाहन शव हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव तथा परमशिव को षट्-शिव (६ शिव) कहा जाता हैं।

तारा, उग्रा, महोग्रा, वज्रा, काली, सरस्वती, कामेश्वरी तथा चामुंडा ये अष्ट तारा नाम से विख्यात हैं। देवी के मस्तक में स्थित अक्षोभ्य शिव अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

महा-शंख माला जो मनुष्य के ललाट के हड्डियों से निर्मित होती हैं तथा जिस में ५० मणियाँ होती हैं, से देवी की साधना करने का विधान हैं। कान तथा नेत्र के बीज के भाग को या ललाट का भाग महा-शंख कहलाता हैं, इस माला का स्पर्श तुलसी, गोबर, गंगा-जल तथा शाल-ग्राम से कभी नहीं करना चाहिये।

देवी की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता है

गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए

देवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैं

लाल व नीले फूल और नारियल चौमुखा दीपक चढाने से देवी होतीं हैं प्रसन्न

देवी के भक्त को ज्ञान व बुद्धि विवेक में तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पता

देवी की मूर्ती पर रुद्राक्ष चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है

महाविद्या तारा के मन्त्रों से होता है बड़े से बड़े दुखों का नाश

देवी माँ का स्वत: सिद्ध महामंत्र है-

श्री सिद्ध तारा महाविद्या महामंत्र

ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट

इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे

1. बिल्व पत्र, भोज पत्र और घी से हवन करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है

2.मधु. शर्करा और खीर से होम करने पर वशीकरण होता है

3.घृत तथा शर्करा युक्त हवन सामग्री से होम करने पर आकर्षण होता है।

4. काले तिल व खीर से हवन करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।

देवी के तीन प्रमुख रूपों के तीन महा मंत्र

महाअंक-देवी द्वारा उतपन्न गणित का अंक जिसे स्वयं तारा ही कहा जाता है वो देवी का महाअंक है –“1”

विशेष पूजा सामग्रियां-पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलाती है

सफेद या नीला कमल का फूल चढ़ाना

रुद्राक्ष से बने कानों के कुंडल चढ़ाना

अनार के दाने प्रसाद रूप में चढ़ाना

सूर्य शंख को देवी पूजा में रखना

भोजपत्र पर ह्रीं लिख करा चढ़ाना

दूर्वा,अक्षत,रक्तचंदन,पंचगव्य,पञ्चमेवा व पंचामृत चढ़ाएं

पूजा में उर्द की ड़ाल व लौंग काली मिर्च का चढ़ावे के रूप प्रयोग करें

सभी चढ़ावे चढाते हुये देवी का ये मंत्र पढ़ें-ॐ क्रोद्धरात्री स्वरूपिन्ये नम:

१)देवी तारा मंत्र-ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट

२)देवी एक्जता मंत्र-ह्रीं त्री हुं फट

३)नील सरस्वती मंत्र-ह्रीं त्री हुं

सभी मन्त्रों के जाप से पहले अक्षोभ्य ऋषि का नाम लेना चाहिए तथा उनका ध्यान करना चाहिए

सबसे महत्पूरण होता है देवी का महायंत्र जिसके बिना साधना कभी पूरण नहीं होती इसलिए देवी के यन्त्र को जरूर स्थापित करे व पूजन करें

यन्त्र के पूजन की रीति है-

पंचोपचार पूजन करें-धूप,दीप,फल,पुष्प,जल आदि चढ़ाएं

ॐ अक्षोभ्य ऋषये नम: मम यंत्रोद्दारय-द्दारय

कहते हुये पानी के 21 बार छीटे दें व पुष्प धूप अर्पित करें

देवी को प्रसन्न करने के लिए सह्त्रनाम त्रिलोक्य कवच आदि का पाठ शुभ माना गया है

यदि आप बिधिवत पूजा पात नहीं कर सकते तो मूल मंत्र के साथ साथ नामावली का गायन करें

तारा शतनाम का गायन करने से भी देवी की कृपा आप प्राप्त कर सकते हैं

तारा शतनाम को इस रीति से गाना चाहिए-

तारणी तरला तन्वी तारातरुण बल्लरी,

तीररूपातरी श्यामा तनुक्षीन पयोधरा,

तुरीया तरला तीब्रगमना नीलवाहिनी,

उग्रतारा जया चंडी श्रीमदेकजटाशिरा,

देवी को अति शीघ्र प्रसन्न करने के लिए अंग न्यास व आवरण हवन तर्पण व मार्जन सहित पूजा करें

अब देवी के कुछ इच्छा पूरक मंत्र

1) देवी तारा का भय नाशक मंत्र

ॐ त्रीम ह्रीं हुं

नीले रंग के वस्त्र और पुष्प देवी को अर्पित करें

पुष्पमाला,अक्षत,धूप दीप से पूजन करें

रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें

मंदिर में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

नीले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें

पूर्व दिशा की ओर मुख रखें

आम का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

2) शत्रु नाशक मंत्र

ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौ: हुं उग्रतारे फट

नारियल वस्त्र में लपेट कर देवी को अर्पित करें

गुड से हवन करें

रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें

एकांत कक्ष में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

काले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें

उत्तर दिशा की ओर मुख रखें

पपीता का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

3) जादू टोना नाशक मंत्र

ॐ हुं ह्रीं क्लीं सौ: हुं फट

देसी घी ड़ाल कर चौमुखा दीया जलाएं

कपूर से देवी की आरती करें

रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें

4) लम्बी आयु का मंत्र

ॐ हुं ह्रीं क्लीं हसौ: हुं फट

रोज सुबह पौधों को पानी दें

रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें

शिवलिंग के निकट बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

भूरे रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें

पूर्व दिशा की ओर मुख रखें

सेब का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

5) सुरक्षा कवच का मंत्र

ॐ हुं ह्रीं हुं ह्रीं फट

देवी को पान व पञ्च मेवा अर्पित करें

रुद्राक्ष की माला से 3 माला का मंत्र जप करें

मंत्र जाप के समय उत्तर की ओर मुख रखें

किसी खुले स्थान में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

काले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें

उत्तर दिशा की ओर मुख रखें

केले व अमरुद का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

देवी की पूजा में सावधानियां व निषेध-

बिना “अक्षोभ ऋषि” की पूजा के तारा महाविद्या की साधना न करें

किसी स्त्री की निंदा किसी सूरत में न करें

साधना के दौरान अपने भोजन आदि में लौंग व इलाइची का प्रयोग नकारें

देवी भक्त किसी भी कीमत पर भांग के पौधे को स्वयं न उखाड़ें

टूटा हुआ आइना पूजा के दौरान आसपास न रखें

श्री तारा महाविद्या शाबर साधना

मन्त्र

ॐ तारा तारा महातारा, ब्रह्म-विष्णु-महेश उधारा, चौदह भुवन आपद हारा, जहाँ भेजों तहां जाहि, बुद्धि-रिद्धि ल्याव, तीनो लोक उखाल डार-डार, न उखाले तो अक्षोभ्य की आन, सब सौ कोस चहूँ ओर, मेरा शत्रु तेरा बलि, खः फट फुरो मंत्र, इश्वरो वाचा.

विधि

इस मंत्र को नवरात्रों में १०००० बार जप कर सिद्ध कर लेवें. फिर १०८ बार रोज़ जप करते रहे. साधक का बुद्धि और रिद्धि बल बढता रहता है. कोई भी शत्रु हानी नहीं पहुंचा सकता है. सभी अभिचार साधक पर निष्फल रहते हैं

वाक् सिद्धि विकास हेतु श्री तारा साधना

देवी तारा दस महाविद्याओं में से एक है इन्हे नील सरस्वती भी कहा जाता है ! ये सरस्वती का तांत्रिक स्वरुप है

अब आप एक एक अनार निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ गणेश जी व् अक्षोभ पुरुष को काट कर बली दे ..

ॐ गं उच्छिस्ट गणेशाय नमः भो भो देव प्रसिद प्रसिद मया दत्तं इयं बलिं गृहान हूँ फट .

.ॐ भं क्षं फ्रें नमो अक्षोभ्य काल पुरुष सकाय प्रसिद प्रसिद मया दत्तं इयं बलिं गृहान हूँ फट ..

अब आप इस मंत्र की एक माल जाप करे ..

॥क्षं अक्षोभ्य काल पुरुषाय नमः स्वाहा॥

फिर आप निम्न मंत्र की एक माला जाप करे ..

॥ह्रीं गं हस्तिपिशाची लिखे स्वाहा॥

न मंत्रो की एक एक माला जाप शरू में व् अंत में  करना अनिवार्य है क्यों नील तारा देवी के बीज मंत्र की जाप से अत्यंत भयंकर उर्जा का विस्फोट होता है शरीर के अंदर .. ऐसा लगता है जैसे की आप हवा में उड़ रहे हो .. एक हि क्षण में सातो आसमान के ऊपर विचरण की अनुभति तोह दुसरे ही क्षण अथाह समुद्र में गोता  लगाने  की .. इतना  उर्जा का विस्फोट होगा की आप कमजोर पड़ने लग जायेंगे आप के शारीर उस उर्जा का प्रभाव व् तेज को सहन नहीं कर सकते इस के लिए ही यह दोनों मात्र शुरू व् अंत में एक एक माला आप लोग अवस्य करना .. नहीं तोह आप को विक्षिप्त होने से स्वं माँ भी नहीं बचा सकती 

 

इस साधना से आप के पांच चक्र जाग्रत हो जाते है तोह आप स्वं ही समझ सकते हो इस मंत्र में कितनी उर्जा निर्माण करने की क्षमता है ..  एक एक चक्र को उर्जाओ के तेज धक्के मार मार के जागते है

मूल मंत्र-

॥स्त्रीं ॥

जप के उपरांत रोज  देवी के दाहिने हात में समर्पण व् क्षमा पार्थना करना ना भूले ..

साधना समाप्त करने की उपरांत यथा साध्य हवन  करना .. व् एक कुमारी कन्या को भोजन करा देना ..अगर किसी कन्या को भोजन करने में कोई असुविधा हो तोह आप एक वक्त में खाने की जितना मुल्य हो वोह आप किसी जरुरत मंद व्यक्ति को दान कर देना …

भगवती आप सबका कल्याण करे ..

जब भगवती का बीजमंत्र का एक लाख से ऊपर जप पूर्ण हो जाये तब उनके अन्य मंत्रो का जाप लाभदायी होता है

कुछ लॊग अपने आपको वयक्त नहीं कर पाते, उनमे बोलने की छमता नहीं होती ,उनमे वाक् शक्ति का विकास नहीं होता ऐसे जातको को बुधवार के दिन तारा यन्त्र की स्थापना करनी चाहिए ! उसका पंचोपचार पूजन करने के पश्चात स्फटिक माला से इस मंत्र का २१ माला जप करना चाहिए –

मंत्र – ॐ नमः पद्मासने शब्दरुपे ऐं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्वादिनी स्वाहा

२१ वे दिन हवन सामग्री मे जौ-घी मिलाकर उपरोक्त मंत्र का १०८ आहुति दे और पूर्ण आहुति प्रदान करे !

इस साधना से वाक् शक्ति का विकास होता है , आवाज़ का कम्पन जाता रहता है ! यह मोहिनी विद्या है एवं बहुत से प्रवचनकार,कथापुराण वाचक इसी मंत्र को सिद्ध कर जन समूह को अपने शब्द जालो से मोहते है ! अपने पास कुछ भी गोपनीय नहीं रख रहा सब आप लोगो से शेयर कर रहा हु !! प्रतिदिन साधना से पूर्व माँ तारा का पूजन कर एक -एक माला (स्त्रीम ह्रीं हुं ) तारा कुल्लुका एवं ( अं मं अक्षोभ्य श्री ) की अवश्य करे I

 


MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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