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Monday, September 21, 2020

मां दुर्गा का पहला रूप : शैल पुत्री

मां दुर्गा का पहला रूप : शैल पुत्री

व्याख्याकार: सनातनपुत्र देवीदास विपुल “खोजी”

मां दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी का लिंक

नवदुर्गा हिन्दू धर्म में माता दुर्गा अथवा पार्वती के नौ रूपों को एक साथ कहा जाता है। इन नवों दुर्गा को पापों के विनाशिनी कहा जाता है, हर देवी के अलग अलग वाहन हैं, अस्त्र शस्त्र हैं परंतु यह सब एक हैं।


दुर्गा सप्तशती ग्रन्थ के अंतर्गत देवी कवच स्तोत्र में निम्नांकित श्लोक में नवदुर्गा के नाम क्रमश: दिये गए हैं


    प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

    तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।

    पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

    सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।

    नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

    उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।


शैलपुत्री (शैल मतलब पहाड या पाषाण)  

सम्पूर्ण जड़ पदार्थ भगवती का पहला स्वरूप हैं। आप यूं समझे पृथ्वी तत्व।

इस पूजन का अर्थ है प्रत्येक जड़ पदार्थ में परमात्मा को अनुभव करना। माता शैलपुत्री का जन्म शैल या पत्थर से हुआ है इसलिए इनकी पूजा से जीवन में पाषाण की भांति स्थिरता आती है।

माता शैलपुत्री की विधिवत आराधना से वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है और घर में खुशहाली आती है।

इनकी अर्चना से मूलाधार चक्र जागृत होते हैं जो अत्यन्त शुभ होता है।

दुर्गाजी पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं।


पौराणिक कथा:

एक बार जब सती के पिता प्रजापति दक्ष ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, पर भगवान शंकर को नहीं। सती अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। परन्तु सती संतुष्ट नही हुईं।

सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव था। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपनेआप को जलाकर भस्म कर लिया।

इस दारुण दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने तांडव करते हुये उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मी और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी फिर से भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिव की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है।

अन्य नाम: सती, पार्वती, वृषारूढ़ा, हेमवती और भवानी भी इसी देवी के अन्य नाम हैं।

मां शैलपुत्री के पूजा का महत्व

1. नवरात्र के पहले दिन सौभाग्य की देवी की पूजा सच्चे मन से करें।

2. प्रातः उठकर घर की साफ-सफाई कर, स्नान करें तथा स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

3. घर के मंदिर में साफ चौकी पर माता शैलपुत्री की फोटो रखें और कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर पान के पत्ते, नारियल और स्वास्तिक भी बनाएं।

4. उसके बाद मां शैलपुत्री को माला चढ़ाकर पास में ही दीये जलाएं। यह ध्यान रखें कि मां शैलपुत्री को सफेद फूल बहुत पसंद हैं तो उसे उनकी फोटो के पास रहने दें।

5. अब पूजा आरम्भ करें। अर्चना शुरू करने से पहले सभी तीर्थों, नदियों और दिशाओं का आह्वाहन करें और मां शैलपुत्री की कथा सुनें। कथा के समाप्त होने के बाद में अंत में आरती उतारें।

6. आरती के बाद देवी को सफेद मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद बांटें और रात में भी मां की फोटो के पास कपूर जलाएं।

पूजा विधि

सबसे पहले मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। इसके ऊपर केशर से 'शं' लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें।

मंत्र इस प्रकार है-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:।

मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें। इसके बाद प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। इस मंत्र का जप कम से कम 108 करें।

मंत्र - ॐ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।

मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां दुर्गा के चरणों में अपनी मनोकामना व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा आरती एवं कीर्तन करें। मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें। इसके बाद भोग अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। यह जप कम से कम 108 होना चाहिए।

ध्यान मंत्र

वन्दे वांच्छित लाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌ ।

वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

अर्थात- देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा है। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।

स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।

धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।

सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।

मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥


मां की आरती :

शैलपुत्री मां बैल पर सवार। करें देवता जय जयकार।

शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।

पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।

ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।

सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।

उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।

घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।

श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।

मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो


प्रतिपदा के दिन इनका पूजन-जप किया जाता है। मूलाधार में ध्यान कर इनके मंत्र को जपते हैं। धन-धान्य-ऐश्वर्य, सौभाग्य-आरोग्य तथा मोक्ष के देने वाली माता मानी गई हैं।

 

विधि-विधान से पूजन-अर्चन व जप करने पर साधक के लिए कुछ भी अगम्य नहीं रहता। विधान-कलश स्‍थापना, देवी का कोई भी चित्र संभव हो तो यंत्र प्राण-प्रतिष्ठायुक्त तथा यथाशक्ति पूजन-आरती इत्यादि तथा रुद्राक्ष की माला से जप संकल्प आवश्यक है।



जप के पश्चात अपराध क्षमा स्तोत्र यदि संभव हो तो अथर्वशीर्ष, देवी सूक्त, रात्र‍ि सूक्त, कवच तथा कुंजिका स्तोत्र का पाठ पहले करें। गणेश पूजन आवश्यक है। ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन करने से सिद्धि सुगम हो जाती है।

मंत्र:
    वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌।  वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

 

ऊँ शैलपुत्रायै च विद्महे सर्वदेवाय  धीमहि, तन्नो शैलपुत्री प्रचोदयात्।

प्रथम शैलपुत्री (हरड़) : कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। यह पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है। 

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नव - आरती : मां महिषासुरमर्दिनी 



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जय मां शैल पुत्री

 


Sunday, September 20, 2020

पागल बने बिना प्राप्ति असम्भव

 पागल बने बिना प्राप्ति असम्भव

सनातन पुत्र देवीदास विपुल


पागल यानी पा + गल। या पाग + ल। या पा + आग + ल। या प + अग + ल।

प्राय: जगत में पागल का अर्थ होता है जो अनाप शनाप हरकतें करें। चिकित्सा में जिसके मस्तिष्क में कुछ अतिरिक्त रसायन बनने के कारण मस्तिष्क के अन्य भागों को दिये जाने वाले संकेत उलट पलट जाते हैं। मेरी सहस्त्रसार की धारणा के माध्यम से यात्रा सहस्त्रसार की धारणा के माध्यम से मस्तिष्क में जो सूरजमुखी के फूल की भांति पराग नलिकाओं को रस मिलना बंद हो जाता है तो नाडियां सूख कर पागलपन का कारण बन सकती हैं। कुछ जन्मजात अभिशापित होते हैं तो कुछ मानसिक आघात से तो कुछ दवाईयों या नशे के सेवन के कारण दुष्प्रभाव के कारण।


परन्तु आप पागल के अन्य अर्थ भी जान लें। जो शायद आपने सोंचे भी न हो।


पागलपन का अन्य अर्थ होता है दीवानगी, जूनून की अधिकतम सीमा। जैसे यदि आप किसी भी वस्तु को चाहे वह प्रेम हो, धन हो, शोहरत हो या कोई भी इच्छा, कुछ कर गुजरने की तमन्ना नही रखते आप सफल होने की नहीं सोंच सकते। यदि वैज्ञानिक शोध के लिये पागल न हो तो क्या कुछ कर सकता है। तमाम किस्से आप पढ सकते हैं। वैसे ही सैनिक को युद्ध भूमि में देश की रक्षा का राष्ट्रभक्ति का पागलपन न हो तो क्या घायल अवस्था में भी कारगिल युद्ध में दो गोली लगने के बाद भी 8 मीटर ऊपर खडी पहाडी पर और चढकर चौकी पर कब्जा न किया होता।


इसे भी आप पागलपन कह सकते हैं। वे पागल ही थे जो आज इन गद्दार देश द्रोही परिवारवादी नेताओं को अपनी जान की कुर्बानी देकर देश लूटने को सौंप गये।

वह वास्तव में पागल हैं जो देश की रक्षा में इन सडे बुसे मानसिकता वाले दुष्टों की रक्षा कर रहें हैं।

वे पागल ही हैं जो पत्थर खाकर भी इन नमकहरामों को बाढ जैसी आपदा में बचाते हैं।

वे पागल ही जो उन नेताओं की रक्षा करते हैं जो उनको ही गाली देते हैं। उनकी ही हत्या का इंतजाम करते हैं।


बस इन पागलो को हम नमन करते हैं। दूसरे पागलों को पागलखाने भेजते हैं। तीसरी प्रकार के पागल जो सत्ता के लिये परिवार के सारे मूल्यों को ताक पर रखकर देश तक बेचने को तैयार रहते हैं। पर सबसे बडे पागल हम सब जो इन सत्ता और परिवार के लिये नीचता की सीमा तक गिरनेवाले नेताओं को समर्थन देते हैं।


एक पागल वो भी देश के लिये घर परिवार नाते रिश्ते छोडकर सिर्फ और सिर्फ देश के लिये रात दिन जुटा हुआ है। वो भी करने को तैयार जो उसके दुश्मन पैदा करता है।  


आप देखें इस दुनिया में भौतिक रूप से सब पागल।


अब दूसरा अर्थ: पागल यानी पा + गल।

जो पाने के बाद गल गया।

जिसका अहं, जगत की सारी तृष्णायें गल गई। नष्ट हो गईं। जैसे मीरा, सूर, तुलसी, कबीर, हमारी परम्परा के कुछ गुरू।

जहां एक तरफ प्रार्थना होती है “रूपं देहि, बलं देहि” वही दूसरी तरफ यह प्रार्थना वो ही लिखेगा जो पाने के बाद गल गया हो।

जो लिख गये


सहन शक्ति दे मुझे, मेरे प्रभु गुरूदेव जी।

सहता रहूं, सहता रहूं, सहता रहूं गुरूदेव जी॥

सहन मैं इतना करूं, अभिमान चकनाचूर हो।

न रहे मुझ में तनिक भी, कर कृपा गुरूदेव जी।।

सहन मैं इतना करूं, उदिग्न न हो मन मेरा।

कामना मंगल सभी की, मांगता गुरूदेव जी।।

सहन मैं इतना करू, प्रतिकार कुछ भी न करूं।

उफ तक निकालूं मुख से न, आशीष दो गुरूदेव जी।।

सहन करना साधना है, करती निर्मल है शिवोम्।

कृपा तेरी इस लिये, पाता रहूं गुरूदेव जी।।


अर्थात स्वयं शिव बन गया हो। वह पा गल हुआ पागल नहीं।


तीसरा अर्थ: पागल यानी पाग + ल।

पाग जो गुड या शक्कर से बना है। यानी पगा हुआ चाशनी को पाग कहते हैं।

ल मतलब लकार। ल् में प्रत्याहार के क्रम से ( अ इ उ ऋ ए ओ ) जोड़ दें और क्रमानुसार ( ट् ) जोड़ते जाऐं । फिर बाद में ( ङ् ) जोड़ते जाऐं जब तक कि दश लकार पूरे न हो जाएँ । जैसे लट् लिट् लुट् लृट् लेट् लोट् लङ् लिङ् लुङ् लृङ् ॥ इनमें लेट् लकार केवल वेद में प्रयुक्त होता है । लोक के लिए नौ लकार शेष रहे । अब इन नौ लकारों में लङ् के दो भेद होते हैं :-- आशीर्लिङ् और विधिलिङ् । इस प्रकार लोक में दस के दस लकार हो गए ।


अर्थ निकला जो लेट् लकार से है। वेदों के ज्ञान के पाग में पगा हुआ। अर्थात जो ज्ञानी है। जिसने वेदों का अनुभव किया। अह्म ब्रह्मास्मि की अनुभूति की। वेद महावाक्यों को समझा। वह भी हुआ पागल। 

 

मतलब योगी भी एक पा गल होता है पागल नहीं।  


चौथा अर्थ: पा + आग + ल।


जिसने वेदों की आग में जलकर खुद को पा लिया यानी अंतर्ज्ञानी हो गया। या यूं कहो जिसने जगत की वासना रूपी आग का दरिया पार कर ज्ञान प्राप्त किया वह भी पागल। पाकर ज्ञान की आग खुद को भस्म किया।


पाचंवा अर्थ: प + अग + ल।

प से बननेवाले विभिन्न लकारों के रूप + अग मतलब आगे + लकार । जिसके अर्थ निकलेगें। प से पढकर, अग से आगे बढकर + ल लेट् लकार जिसने वेदों के ज्ञान को जाना। वह पागल।


अब यहां आप हस सकते हैं विपुल पा गल ने आपको पा गल बनाने के चक्कर में पागल बनाकर पा  गल की व्याख्या कर दी और एक पागल को भी पा गल का सम्मान दिलाने के पागलपन की सीमा को पागलपन तक पगला दिया।


यात्रा सहस्त्रसार की धारणा के माध्यम से



 


ज्ञानी नहीं प्रेमी बनो ज्ञान खुद मिल जायेगा

 ज्ञानी नहीं प्रेमी बनो ज्ञान खुद मिल जायेगा

सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"

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मां जग्दम्बे के नव रूप, दश विद्या, पूजन, स्तुति, भजन सहित पूर्ण साहित्य व अन्य जानकारी 

उदाहरण: 
 

प्राय: लोग यह प्रश्न करते हैं कि ज्ञान बडा या भक्ति। मेरा उत्तर होगा भक्ति। भक्ति प्रेम का शुद्दतम स्वरूप है। बोलते है परम प्रेमा भक्ति।


ज्ञान सिर्फ मन को बुद्धि को जिज्ञासा को शांत करता है, बिना आनंद दिये। पर भक्ति सम्पूर्ण इन्द्रियो को आनांदित करती है। जब प्रेमाश्रु निकलते हैं तो उसका आनंद प्रेम और विरह की अनुभुति कराता है और प्रेम का ज्ञान देता है। जो लेनेवाला वह नीचे  हाथ  करता है जो देता है  उसका हाथ ऊपर  रहता है यहां भक्ति  ने  प्रेम  का  अनुभव  दिया उस अनुभव ने ज्ञान दिया। ज्ञान बिना अनुभव के मिलता  नहीं।


ज्ञान भक्ति  का  अनुभव  नहीं  करा  सकता  पर  भक्ति  तो  सारे अनुभव अनुभूति करा सकती  है। यह  तो समस्त ज्ञान  की  कुंजी है। यह प्रेम है जो जीवन का जगत का आधार है। सार है, अंतिम द्वार है। सच्चे  प्रेमी  को  ज्ञान  से क्या लेना  देना उसको  तो प्रीतम  के दर्शन की एक  झलक ही चाहिये।  ज्ञान तो  अपने आप  आवश्कयता होने पर चला आता है।  पर भक्ति  तो सिर्फ प्रेम से समर्पण से  स्मरण से ही आती है।


जहां एक ओर ज्ञान अहंकार को भी पैदा कर सकता है और निरंकुश बना सकता है वहीं भक्ति मन में दासत्व का भाव पैदा करती है जिसके कारण अहंकार पैदा होने का सवाल ही नहीं अत: पतन की सम्भावना कम रहती है।


यद्यपि ईश का अंतिम वास्तविक रूप निर्गुण निराकार और अद्वैत ही है। पर जो आनन्द भक्ति मार्ग और भक्तियोग में है वह कहीं नहीं।


ज्ञान योग हमें यह अनुभव कराता है कि हम ही ब्रह्म है। अद्वैत भाव पैदा कर ईश के निराकार भाव का ज्ञान करवाता है। जिसके कारण मनुष्य भ्रमित होकर पतन की ओर चल सकता है। स्वयं ईश होने का ओशो होने का भ्रम पाल सकता है। कुछ कारया सामाजिक दृष्टि से गलत कर सकता है और उस देश के कानून के अनुसार जेल तक जा सकता है।


पर द्वैत भाव और साकार सगुण उपासक सब अपने इष्ट की लीला जानकर और उत्साह से मनन स्मरण में जुट जाता है।


अत: मेरी निगाह में भक्ति श्रेष्ठ है और यही भक्ति सब कुछ प्रदान कर देती है। इस सन्दर्भ में कृष्ण उद्वव सम्वाद और गोपिका प्रेम की कथा विख्यात है और उत्कृष्ट उदाहरण भी।


एक बार की बात है भगवान कृष्ण के परम मित्र उद्धव जी को अपने ज्ञान पर अभिमान हो गया। वह सोंचने लगे भक्ति और प्रेम के गहरे प्रभाव को वह अपने ज्ञान रूपी योग से छिन्न भिन्न कर सकते हैं। श्री कृष्ण यह जान गये और उद्धव जी को वृज में प्रेम में पागल राधा को समझाने हेतु भेज दिया।


गर्व में चूर उद्धव जी ज्ञान की गठरी बांधे राधा एवम उनकी सहेलियाँ को समझाने हेतु वृज यानि गोकुल पहुँचते हैं तो वहां का वातावरण प्रकृति एवम् निवासिओं को देखकर दंग रह जाते हैं। श्री कृष्ण के वियोग में सभी पर सन्नाटे छाए हुए हैं। यहाँ तक कि वहां के निवासी या मात्र राधा ही नहीं उदास थे बल्कि प्रकृति को यानि पेड़, पौधे, गाय, यमुना तथा वातावरण सबके सब मुरझाये हुए थे।


जब उद्धव अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से राधा एवम् उनकी सहेली को समझाने बैठे तो वहां ज्ञान का प्रकाश लाख समझाने पर भी की कृष्ण कुछ नहीं है, वह मेरा मित्र एक साधारण व्यक्ति है। उसके पीछे तुम सब इतना पागल क्यों हो रहे हो। इस पर कृष्ण के वियोग में घुट घुट कर जीने वाली गोप और गोपिकायें बोली अरे उधो मन नहीं दस बीस मन यानि ह्रदय जो एक होता है, हम सब कृष्ण को समर्पित हो चुकी हैं। उनके बिना एक पल भी जीना हम सब के लिए मुमकिन नहीं हैं। हमें तो वृज के हर वस्तु उनकी अनुपस्तिथि में ऐसा लगता है की काट रहा है। हम सब का जीना दुर्लभ है। हमें यहाँ की कोई भी वस्तु यहाँ तक की प्रकृति यानि के फल, फूल, गाय, बैल, यमुना कुछ भी नहीं भाता है। हम सब तो उनके बिना पागल की भांति यमुना के किनारे भूखे प्यासे लोट पोट कर इतना दुखी हैं की आँका नहीं जा सकता। हम सब तो अपना सुध बुध खो चुकी हूँ की मैं कहाँ की हूँ क्या करती हूँ और क्या करना चाहिए। बस श्री कृष्ण का ही चेहरा और उसके साथ की मस्ती ही याद है। बाद में उद्धव जी को अपनी ज्ञान की गठरी समेटकर वापस आना पड़ा। उन गोपिकाओं पर उनके ज्ञान का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। लाख ज्ञान की बात समझाने पर भी उन गोपिकाओं के बहते हुए प्रेमाश्रु को नहीं रोक पाए।


अंत में जब उद्धव लौट रहे थे सभी के आँखों से आंसू के धरा बह रही थी। उद्धव जी के ज्ञान पर प्रेम का प्रकाश रूपी बदल छा गया। यानि ज्ञान पर प्रेम का आच्छादित होना संभव हो गया। ज्ञान का बस प्रेम के उपर नहीं चल पाया। ज्ञान नदी बन गयी तो प्रेम सागर बन गया। उद्धव का ज्ञान प्रेम के सामने छोटा पड गया।


जब उद्धव श्री कृष्ण के पास पहुचे तो वहां का दृश्य उनको समझाने में सक्षम नहीं हो पाए। उद्धव जी ने कहा की मैं उन सबके सामने हार कर वापस लौट आया।


इसीलिए मैं निवेदन करता हूं। प्रेमी बनो ज्ञानी नहीं। ज्ञान की चिंता मत करो। तुम्हारा प्रेम ज्ञान का सागर लाकर खडा कर सकता है। समर्पित हो जाओ अपने प्रेमी प्रभु को। आंचल को गीला होने दो। यह आन्नंद हर किसी को नसीब नहीं होता है। सिर्फ और सिर्फ सच्चे प्रेमी ही इसका पान कर सकते हैं। तुम भाग्यशाली हो जो इसका बिना आवाज आन्नद ले रहे हो।


भूल जाओ अपने आप को समर्पित कर दो अपने को देखो वो दौडा चला आयेगा। वो तो तुम्हारी तरफ सदा दया का भाव रखता है। क्योकि हम सब उसकी संतान हैं। वह तुम्हारे कष्ट नहीं सहन कर सकता। पर तुम तो सिर्फ स्वार्थ के लिए जगत को पाने के लिए उसको याद करते हो। तुम भूल चुके हो जब वह नारायण था तुम भी नर थे। उसी के समान पर तुम भूल गये भटकते गये जगत के सुख के लिये षड्यंत्र बुनते रहे जगत को पाने को। आज जब यह कृपा मिली तो लाभ उठाओ।


बस यही मैं कहता हूं। कलियुग में यदि तुम क्या हो यह न जान सकोगे तो फिर कभी  जान सकोगे यह मुश्किल है। तुम क्या हो। तो कभी न जान सकोगे। ईश प्राणीधान एकमात्र सुगम मार्ग है। बस उस पर चल पडो।

अपने इष्ट का सघन सतत मंत्र जप करते रहो। यह मंत्र जप तुमको भक्ति से दर्शन तक, शक्ति तक। ज्ञान से वैराग्य तक और मोक्ष तक पहुंचाने का सामर्थ  रखता है।


जय गुरूदेव जय मां काली।



(नास्तिकों को चुनौती) सचल मन वैज्ञानिक ध्यान विधियां: एक वैज्ञानिक का विश्लेषण

 सचल मन वैज्ञानिक ध्यान  विधियां: एक वैज्ञानिक का विश्लेषण 

  (नास्तिकों को चुनौती) 

सनातनपुत्र देवीदास विपुल"खोजी"


जैसे जैसे मानव विज्ञान की खोज अपने सुख के लिए करता जा रहा है वह समाजिक रूप से अधिक दीवालिया होता जा रहा  है। दूसरे शब्दों में आलसी।


बस इसी आलस्य के कारण ईश्वरीय शक्ति को भी लोगों के घर की काल बेल बजानी पडती है किंतु शठ मानव अपने द्वार तक नहीं खोलता क्योंकि उसे भौतिक सुख ही चारवाक की भांति  रुचिकर लगता है।


सचल मन वैज्ञानिक ध्यान  विधियां का निर्माण शायद ईश ने इसीलिये कराया है जिससे मनुष्य बिना कहीं जाये। बिना पैसा या समय खर्च किए अपने घर पर सनातन की शक्ति का अनुभव अनुभूति कर सकें। प्रभु ने इस कार्य के लिये मुझे यानि एक पोस्ट ग्रेगुएट इंजीनियर वैज्ञानिक को चुना। जिसे लोग विश्वास कर सकें और अपने घर पर ही कुछ तो करें।


क्योंकि आज की तारीख में चाहे कृष्ण राम जीसस या अल्ल्ह खुद सामने आ जायें तो हम उन्हें झूठा कह कर अपमानित करनें में देर नहीं करेंगे। लेकिन यदि कोई भौतिक रूप की डिग्रियों को सामने लाकर बात करेगा तो उसकी बात काटने के पहले हजार बार सोंचना पडेगा। मेरा यह खुद का अनुभव है।


वैसे मैं पूरे होशो हवास के साथ नास्तिकों चार्वाकों को चुनौती ही देता हूं तुम महामूर्ख अज्ञानी हो। बस यह विधि अपने घर पर बिना पूर्वाग्रह के अपने घर पर करो। तुमको समय तो देना ही पडेगा। दुनिया का कोई भी काम करो तुमको समय देना पडता है। तो इस कार्य के लिये लोग लाखों मंत्र जप करते हैं। सालो साल लगते हैं। वह अनुभव मात्र कुछ समय में मिले तो घाटे का सौदा नहीं है। मेरा मोबाइल नोट कर लो। 9969680093।

काल मत करो। व्हाट्सप करो। तुम्हे तुम्हारा उत्तर समय पर मिल जायेगा।


फिर से एक बार नास्तिकों को चुनौती।


"MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"
 


हमारे पास डाटा है कि एक दिन से एक महीने का समय पर्याप्त हुआ है। औसतन 11 दिन में लोग अचम्भित हो गये। लोगों को कृष्ण शिव दुर्गा अथवा काली मां की दर्शनाभूति के साथ प्रकाश और अन्य शारीरिक अनुभव हो चुके हैं।


मैं चाहता हूं हमारे मित्र लाभांवित हो। जीवन के वास्तविक उद्देश्य के साथ वे कितने रहस्यों को जान सकते हैं खुद को पहिचान सकते हैं। यदि आप लाभांवित होगें तो मुझे अच्छा लगेगा। मेरा कौन सा स्वार्थ पूरा होगा। आप सोंचे। अत: अनुरोध है। व्यर्थ की किताबी और पूर्वाग्रहित बात न करें। सारगर्भित और विवेकपूर्ण अनुभवित बात रखें। सामान्य ज्ञान हेतु गूगल गुरू की शरण में जायें।

 

मित्रों मै हर्कोर्टियन हूं (एच.बी.टी.आई, कानपुर का इंजीनियर हर्कोर्टियंस कहलाता है)  पर बेहतर है पूरा परिचय दूं। कारण कल एक बेटे के समान नादान जूनियर ने मेरी पोस्ट पर अपनी बात रखी। मुझे अच्छा लगा परंतु रैगिंग न होने कारण आज के बच्चे बात करना नहीं जानते। मैं अपने सीनियर्स को जो मेरे साथ तक के 12 के हैं (क्योकिं मैं सी.टी. का हूं जो बी.एस.सी. के बाद होता था) मैं उनको सर कहता हूं और मुझे मेरे 83 तक के पास आउट जो वाइस चांसलर तक हैं वे सम्मान करते हैं। बातचीत में सर ही कहते हैं। नाम तक नहीं लेते हैं। यह परम्परा थी एच.बी.टी.आई. की। जो धीरे धीरे मरती गई। कि आज सीनियर्स से बात करना नहीं आता।


मैं सनातन के गीता के वेदों के प्रचार हेतु निकला हूं। जिसमें एच.बी.टी.आई के ही तमाम मित्रों का सहयोग है और जो अनुभव के साथ मेरे साथ जुडे है। चलो कुछ नाम भी लेता हूं। सर्व श्री अंशुमन द्विवेदी, 96 या 97, पेंट, कन्साई नेरोलेक का भारत का बिजनेस हेड। अरुण दद्दा 96 या 97 फूड, अपनी इंडस्ट्री, और भी नाम हैं। डा यशोधरा शर्मा प्रिंसिपल डिग्री कॉलेज आगरा। यहां तक की कुछ सन्यासी भी लेकिन उनका नाम नहीं ले सकता।


प्रिय मित्रों। जीवन रहस्यमय है और विज्ञान की सीमायें। हम अपनी बाहरी खोजों से नित्य नये नये अनुसंधान करते हैं कि मनुष्य को सुख मिले पर क्या वह सुखी हो पा रहा है। नये क्रूर अपराध क्या सुख दे पा रहें। मोबाइल की खोज मनुष्य को नजदीक लाने के लिये की गई पर क्या हम अपने सम्बंधियों से नजदीक हैं। हम एक आभासी जीवन जीते जा रहें हैं। जो पूर्णतया: असत्य और कष्टकारी है। मतलब क्या बाहर की शोध हमें सुख दे पा रही है। यह ठीक है औसतन आयु बढी पर क्या हम अपने बुजुर्गों के समान मानसिक औए शारिरिक अभावों के बावजूद सुखी हैं। मुझको तो मेरे पिता जी मरते मरते मार गये। क्या हम अपने बच्चों को डांट भी सकते हैं। मुझे जितनी पिटाई हुई कहीं उतनी आज बीस साल के बच्चे को कर दो तो मर जायेगा। तमाम बातें जो तर्कों से तौली जा सकती हैं पर नतीजा कुछ नहीं। वातावरण को समाज को दोष देकर हम बचने का बहाना खोज सकते हैं। पर क्या हम सुखी हैं। समाज तो हम से ही बना है। देश और वातावरण भी हमसे बना है। तो जिम्मेदार कौन? हम ही हुये न।


अत: मैंने अंदर की खोज भी आरम्भ की। बिना पूर्वाग्रहित हुये। इसके लिये संतुलित होना बहुत जरूरी है। क्या हम उन तमाम संतों को ज्ञानियों सिर्फ अपने पूरवाग्रह के कारण मूर्ख या झूठा बोल दें। क्या हम उन तमाम महात्माओं को जो इतना साहित्य बिना किसी सुख सुविधा के लिख गये उसका मजाक बनायें। सनातन में तो चारवाक जिन्होने ईश्वर को नहीं माना उनको भी बराबर सम्मान दिया और ऋषि का स्थान दिया।


यह भी सत्य है। जो सिर्फ अपने को सही कहे वो है महामूर्ख। आजकल दुकानदार भी बहुत हैं। पर ईमानदार भी हैं। अत: यदि हमको शोध करनी है तो सबको सुनकर परन्तु खुद प्रयोग कर अपनी शोध जारी रखनी होगी। सनातन हर तर्क को मानता है और कहता है ईश तक पहुंचने के तमाम रास्ते हैं। बाइबिल कहती है सिर्फ ईशू और ये ही सही बाकी गलत। कुरान तो जो न माने उसको मारने का हुक्म देती है। मुस्लिम देशों में कुरान की बात काटने पर सजाये मौत तक दी जाती है। मतलब साफ सनातन बुद्धि को विस्तारित होने का मौका देकर खुद की गीता लिखने की अनुमति देती है। पर बाइबिल और कुरान अपनी किताब के बाहर सोंचने को अपराध मानती है। अत: मैंने बाइबिल कुरान पढा पर शोध का मार्ग सनातन को ही बनाया। दोनो पुस्तक पूर्णतया: मानव व्यवहार और मानव जिज्ञासा विरोधी हैं। जो आंतरिक शोध को रोकती हैं। चाहें उसके लिये हिंसा के साथ झूठ, छल और फरेब ही क्यों न करना पडे, क्योंकि इनको मान्यता दी है।


अत: मैंनें ध्यान की आधुनिक वैज्ञानिक विधियां जिसको सचल मन वैज्ञानिक ध्यान विधियां (समवैध्यावि) या Movable Mind Scientific Techniques for  Meditation- MMSTM नाम दिया है, उसका निर्माण प्रभू कृपा से कर दिया।


ईसाईयों हेतु जीसस को याद कर उनकी पद्दति  के द्वारा  मुस्लिम हेतु नमाज पढकर उनकी पद्दति के द्वारा, इसी भांति आस्तिक, सगुण, साकार, द्वैत उपासक हेतु, निराकार, प्रकृतिपूजक हेतु, नास्तिक, अनीश्वरवादी हेतु, नास्तिक अहम् वादी हेतु उनके विचार और पद्दति के द्वारा ईश शक्ति को अनुभवित कर सकता है।


मेरा मतलब ईश्वरिय शक्ति जीसस नहीं गाड, मोहम्मद नहीं अल्लह, कोई इंसान नही भगवान सिर्फ एक ही एक ही है। जो वेद कहता है गीता कहती है। उसका अनुभव करो। जिससे तुम्हारी मिथ्या सोंच टूट जाये और तुम मात्र मानव जाति को मानो। पर यह भी सही इसको ईसाई भले ही एक बार देख लें पर मुस्लिम देखेगा यह संदेह है।  


मैं अपने को न गुरू मानता हूं। न बनने की या धन कमाने की इच्छा है। मैं हूं एक खोजी। एक शोध कर्ता। जिसने वाहिक के साथ अंदर की भी शोध की। अपने अनुभव लेखों में स्वकथा में ब्लाग पर लिखे हैं। और अपने व्हाटाअप ग्रुप “ आत्म अवलोकन और योग” के माध्यम से अनुभवित लोगों को मार्गदर्शन दे रहा हूं। किताबी ज्ञानियों को दूर से प्रणाम करता हूं। तर्क से पहले हार मान लेता हूं। नकली गुरूओ से तांत्रिकों से भिडता हूं। बस सिर्फ और सिर्फ अनुभवित लोगों से ही बात करना पसंद करता हूं। ग्रुप में भारत सरकार और अन्य बडे बडे वैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर्स, हिंदू, मुसलमान, सिख, गुरू, सन्यासी, भीषण तांत्रिक, घनघोर नास्तिक जो ईश्वर को गाली देकर अनुभव प्राप्त कर चुके हैं। वे सदस्य हैं। मैनें प्रयोग किये हैं तब बात कर रहा हूं। ग्रुप में कुछ जगह खाली है। यदि आप व्यर्थ बात न करें। सिर्फ मूक बनकर पोस्ट देखें तो आपको उनके नम्बर और पते भी मिल जायेंगे।


मैं चाहता हूं हमारे मित्र भी लाभांवित हो। जीवन के वास्तविक उद्देश्य के साथ वे कितने रहस्यों को जान सकते हैं खुद को पहिचान सकते हैं। यदि आप लाभांवित होगें तो मुझे अच्छा लगेगा। मेरा कौन सा स्वार्थ पूरा होगा। आप सोंचे। अत: अनुरोध है। व्यर्थ की किताबी और पूर्वाग्रहित बात न करें। सारगर्भित और विवेकपूर्ण अनुभवित बात रखें। सामान्य ज्ञान हेतु गूगल गुरू की शरण में जायें।


आपका हितैषी मित्र


अन्य लेख हेतु : 

MMSTM समवैध्यावि ध्यान हेतु : 

https://freedhyan.blogspot.com/2018/04/blog-post_45.html


Friday, September 18, 2020

क्यों करें सचल मन वैज्ञानिक ध्यान विधियां

वेद को गाली देनेवाले कौन थे चार्वाक

वेद को गाली देनेवाले कौन थे चार्वाक

शोध संकलन : सनातनपुत्र देवीदास विपुल “खोजी”


यह श्लोक आपने सुना ही होगा।

यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥

अर्थ है कि जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नहीं है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है?

 

इसको लिखने वाले चार्वाक थे। 

 

लेकिन आगे पढने के पूर्व आप यह समझ लें कि सनातन या हिंदुत्व से महान कोई नहीं। जिस व्यक्ति ने उनके मूल्यों को गाली दी उसको भी एक ऋषि का दर्जा देकर उनकी बात पर चर्चा की। इसी लिये जो भी हिंदुत्व को समझ लेता है वह हिंदुत्व का मुरीद हो जाता है। इसी कारण पूरे विश्व में लोग सनातन की ओर प्रेरित हो रहें हैं। 

 

दूसरी एक बात और यदि हम प्रश्न पूछे कि आप कैसे देखते हैं तो आप कहेगे आंख से। यदि आंख नहीं तो अंधा है। जब मनुष्य मरता है तो आंख सहित सभी इंद्रियां रहती हैं पर मनुष्य देख नहीं पाता। तो वह देखनेवाला को उसी को आत्मा कहते हैं।  

 

प्रचलित धारणा यही है कि चार्वाक शब्द की उत्पत्ति ‘चारु’+’वाक्’ (मीठी बोली बोलने वाले) से हुई है। चार्वाक सिद्धांतों के लिए बौद्ध पिटकों में ‘लोकायत’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसका मतलब ‘दर्शन की वह प्रणाली है जो जो इस लोक में विश्वास करती है और स्वर्ग, नरक अथवा मुक्ति की अवधारणा में विश्वास नहीं रखती’। चार्वाक या लोकायत दर्शन का ज़िक्र तो महाभारत में भी मिलता है लेकिन इसका कोई भी मूल ग्रन्थ उपलब्ध नहीं।

 

चार्वाक संभवत: इस दुनिया के पहले ऐसे ऋषि थे, जिन्होंने खुले तौर पर वेदों, वैदिक ऋषियों और वैदिक कर्मकांड को चुनौती दी. वे नास्तिक थे। 

 

Thursday, September 17, 2020

समझे वेद या श्रुति क्या : वैज्ञानिकेय व्याख्या

 समझे वेद या श्रुति क्या : वैज्ञानिकेय व्याख्या 

शोधकर्ता : सनातन पुत्र देवीदास विपुल “खोजी”
विपुल सेन उर्फ विपुल “लखनवी”,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
वेब:   vipkavi.info , वेब चैनल:  vipkavi
 ब्लाग : https://freedhyan.blogspot.com/

आप यह जान लें कि यूनेस्को ने 7 नवम्बर 2004 को वेदपाठ को मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया है।

 

वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियां भारत में पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में रखी हुई हैं। इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियां बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विश्व विरासत सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है।

 

मनुस्मृति कहती है कि अति प्राचीनकाल के ऋषियों ने उत्कट तपस्या द्वारा अपने तप:पूत हृदय में 'परावाक' वेदवाड्मय का साक्षात्कार किया था, अत: वे मंत्रदृष्टा ऋषि कहलाए- 'ऋषयो मंत्रदृष्टार:।'

 

यह बात आज भी सत्य है यदि आपको योग का अनुभव/अनुभुति होती है तो आप जो बोलते हैं वह वेद कए अनुसार ही होता है गीता उसका अनुमोदन करती है और अधिकतर ग्रन्थ उसकी व्याख्या।

कारण

संस्कृत देवनागरी यानि देवों की भाषा।

जिसका जन्म आपके शरीर से होता है।

आपके शरीर के विभिन्न चक्रों पर कूछ ध्वनियाँ गूंजित होती हैं। जो बिना चोट किये उत्पन्न होतीं हैं अत: अनाहत कहलाती हैं।

उन को ध्वनियों जब लिपिबद्ध किया गया तो संस्कृत भाषा बनी। जिसको आज भी आप सुन सकते हैं यदि आपको योग की सघन अनुभूति है।

अब योग में ब्रह्म ज्ञान होता है अत: वह एकदम शुद्ध ज्ञान होता है। जिसको ऋषियों ने लिखा समझा और जिससे वेद निर्मित हुये।

इसी लिये जो वेद का सार है वह हर योगी का एक ही होता है भले भाषा अलग हो या योगी के स्तर के अनुसार कुछ अन्य विवरण हो किंतु सार एक ही रहेगा। 

 

वेदों को हजारों वर्षों से ऋषियों ने अपने शिष्यों को सुनाया और शिष्यों ने अपने शिष्यों को इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी वेद एक-दूसरे को सुनाकर ही ट्रांसफर किए गए अर्थात उनको आज तक जिंदा बनाए रखा। आज भी यह परंपरा कायम है तभी तो असल में वेद कायम है। इस कारण इसे श्रुति बोलते हैं। 

 

चार ऋषि ने सुने वेद..

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम। दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु: समलक्षणम्॥ -मनु (1/13)

जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और (तु अर्थात) अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।

 

जिन्होंने सर्वप्रथम वेद सुने उन्हे वेदज्ञ ऋषि कहते हैं जो चार हैं: अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य। बाद में इनकी वाणी को बहुत से ऋषियों ने रचा और विस्तार दिया। अत: इनको मूलत: सनातन के संस्थापक माना जा सकता है। 

 

वेद पहले एक ही था। फिर ऋग्वेद हुआ, फिर युजुर्वेद व सामवेद। वेद के तीन भाग राम के काल में पुरुरवा ऋषि ने किए थे, जिसे वेदत्रयी कहे गए हैं।

फिर अंत में अथर्ववेद को लिखा अथर्वा ऋषि ने। वेदों को परब्रह्म ने सर्वप्रथम किसे सुनाया? यह शोध का विषय हो सकता है।

 

'वेद' परमेश्वर के मुख से निकला हुआ 'परावाक' है, वह 'अनादि' एवं 'नित्य' कहा गया है। वह अपौरूषेय ही है। वेद ही मानव धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रंथ हैं, दूसरा कोई धर्मग्रंथ नहीं है। 

 

अन्य धर्म या सम्प्रदाय कहते है पहले उनकी किताब, जो किसी एक ने लिखी और एक व्यक्ति पर आधारित है उसको मानो ही मानो। उसके दायरे में देखो फिर जानो। 

 

पर सनातन कहता है जिसपर हजारों ने एक ही बात की अनुभूति कर कहा  “जब तुम अपने को जान लोगे। तब हमको मान लोगे” । शर्त यह है तुम पहले स्वतंत्र रूप से बिना पूर्वाग्रह के अपने को जानकर योगी बनो। तुम अपने को कैसे जानोगे यह रास्ता हम तुम्हें, यानि वेद आधारित ग्रंथ बताते हैं। 

 

तो चार वेद हुए : ऋग, यजु, साम और अथर्व। ऋग्वेद पद्यात्मक है, यजुर्वेद गद्यमय है और सामवेद गीतात्मक है। इन चारों वेदों को बाद के ऋषियों ने अपने तरीके से रचा। उन ऋषियों को मंत्रदृष्टा कहा गया। अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य भी मं‍त्र दृष्टा ऋषि थे। अति प्राचीनकालीन में चार ऋषियों के पवित्रतम अंत:करण में वेद के दर्शन हुए थे। वेदों में ही ऋषियों ने लिखा है कि 'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये'- अर्थात कल्प के प्रारंभ में आदि कवि ब्रह्मा के हृदय में वेद का प्राकट्य हुआ था।

 

वेद के असल मंत्र भाग को संहिता कहते हैं और तत्व को ब्राह्मण।

 

वेद के भी दो विभाग हैं-

'वेदो हि मंत्रब्राह्मणभेदेन द्विविध:।'

1. मंत्र विभाग : (मंत्र का अर्थ मन को एक तंत्र में लाने वाला शब्द) इसको को 'संहिता' भी कहते हैं। वेद के मंत्रों में सुंदरता भरी पड़ी है। वैदिक ऋषि जब स्वर के साथ वेद मंत्रों का पाठ करते हैं, तो चित्त प्रसन्न हो उठता है। जो भी सस्वर वेदपाठ सुनता है, मुग्ध हो उठता है।

2. ब्राह्मण विभाग : (ब्राह्मण का अर्थ ब्रह्म को जानने वाला तत्व ज्ञानी जाति से नहीं) संहितापरक विवेचन को 'आरण्यक' एवं संहितापरक भाष्य को 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहते हैं।

 

मतलब यदि तुम वेद की व्याख्या और तत्व को समझकर लिखोगे तो तुम ब्राह्मण हो। 

 

ब्राह्मण विभाग में 'आरण्यक' और 'उपनिषद' का भी समावेश है।

ब्राह्मण ग्रंथों की संख्या 13 है, जैसे ऋग्वेद के 2, यजुर्वेद के 2, सामवेद के 8 और अथर्ववेद के 1।

मुख्य ब्राह्मण ग्रंथ 5 हैं- 1. ऐतरेय ब्राह्मण, 2. तैत्तिरीय ब्राह्मण, 3. तलवकार ब्राह्मण,

4. शतपथ ब्राह्मण और 5. ताण्डय ब्राह्मण।

 


उपनिषद क्या हैं

वेदोंको मानकर जो शोध किये गये यानि पी एच डी की थीसिस लिखी गई वह हुये उपनिषद वेदों के सार को यानि अंत को  'वेदांत' कहते हैं।

इसलिये वेदांतों को ही उपनिषद भी कहते हैं। 

 

उपनिषद में तत्व ज्ञान की चर्चा है। उपनिषदों की संख्या वैसे तो 108 बताते हैं किंतु मैं इसे हजारों मानता हूं क्योकिं भारत भूमि असीमित ज्ञान वाली धरती रही है अत: मात्र कुछ लोग ही ज्ञानी होगें यह बात हजम नहीं होती है। अन्य ज्ञानियों ने हो सकता है प्रकाशित न किया हो या नष्ट कर दिये गये हों। कोई अन्य कारण हो किंतु वेद ज्ञान मात्र कुछ को ही सीमित नहीं हो सकता। 

 

मुख्य 12 माने गए हैं, जैसे-

1. ईश, 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छांदोग्य, 10. बृहदारण्यक, 11. कौषीतकि, 12. श्वेताश्वतर

 

संहिता : मंत्र भाग।

ब्राह्मण : ब्राह्मण ग्रंथों में मुख्य रूप से यज्ञों की चर्चा है। वेदों के मंत्रों की व्याख्या है। यज्ञों के विधान और विज्ञान का विस्तार से वर्णन है।

 

मुख्य ब्राह्मण 3 हैं- (1) ऐतरेय, ( 2) तैत्तिरीय और (3) शतपथ।

 

आरण्यक : वन को संस्कृत में कहते हैं 'अरण्य'। अरण्य मतलब जंगल यानि संस्कृत के साहित्य और ज्ञान का जंगल। अरण्य में उत्पन्न हुए ग्रंथों का नाम पड़ गया 'आरण्यक'।

 

मुख्य आरण्यक 5 हैं- (1) ऐतरेय, (2) शांखायन, (3) बृहदारण्यक, (4) तैत्तिरीय और (5) तवलकार।

दुख्द है असंख्य वेद-शाखाएं, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषद विलुप्त हो चुके हैं। वर्तमान में ऋग्वेद के 10, कृष्ण यजुर्वेद के 32, सामवेद के 16, अथर्ववेद के 31 उपनिषद उपलब्ध माने गए हैं।

 


अब चार वेदों के 4 उपवेद इस प्रकार हैं-

आयुर्वेदो धनुर्वेदो गांधर्वश्र्चेति ते त्रय:। स्थापत्यवेदमपरमुपवेदश्र्चतुर्विध:॥

1. आयुर्वेद के कर्ता धन्वंतरि। 2. धनुर्वेद के कर्ता विश्वामित्र।

3. गांधर्ववेद के कर्ता नारद मुनि। 4. स्थापत्यवेद के कर्ता विश्वकर्मा हैं।

 


उपवेद क्यों बनाए?  

चार वेदों के ज्ञान को श्रेणीबद्ध किया गया ताकि उसको समझने और अनुसरण करने में आसानी हो। आयुध संबंधी जितने भी मंत्र थे उनको धनुर्वेद नामक ग्रंथ में संग्रहीत किया गया इसी तरह क्रमश: चारों वेदों में बिखरे हुए मंत्रों को विषयानुसार विद्वान ऋषियों ने एकत्रित किया।

 

व्यासजी (वह ऋषि जो लिपिबद्ध करे) ने किए वेद विभाजन:-

पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य, चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए। इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इंद्र, धनंजय, कृष्ण द्वैपायन, अश्वत्थामा आदि 28 वेदव्यास हुए। समय-समय पर वेदों का विभाजन किस प्रकार से हुआ, इसके लिए यह एक उदाहरण प्रस्तुत है।

 

कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने ब्रह्मा की प्रेरणा से 4 शिष्यों को 4 वेद पढ़ाए-

* मुनि पैल को ऋग्वेद * वैशंपायन को यजुर्वेद

 * जैमिनी को सामवेद तथा * सुमंतु को अथर्ववेद पढ़ाया।

 


वेद के विभाग 4 हैं:  

ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्हीं के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।

ऋग्वेद : ऋग- स्थिति,

ऋक अर्थात स्थिति और ज्ञान। इसमें 10 मंडल हैं और 1,028 ऋचाएं। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें 5 शाखाएं हैं- शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन।

यजुर्वेद : यजु- रूपांतरण। यजुर्वेद का अर्थ : यत्+जु = यजु। 'यत्' का अर्थ होता है गतिशील तथा 'जु' का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में 1975 मंत्र और 40 अध्याय हैं। इस वेद में अधिकतर यज्ञ के मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। यजुर्वेद की 2 शाखाएं हैं- कृष्ण और शुक्ल।

सामवेद : साम- गति‍शील 'साम' अर्थात रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इसमें 1875 (1824) मंत्र हैं। ऋग्वेद की ही अधिकतर ऋचाएं हैं। इस संहिता के सभी मंत्र संगीतमय हैं, गेय हैं। इसमें मुख्य 3 शाखाएं हैं, 75 ऋचाएं हैं और विशेषकर संगीतशास्त्र का समावेश किया गया है।

अथर्ववेद : अथर्व- जड़। 'थर्व' का अर्थ है कंपन और 'अथर्व' का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ काम करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। अथर्ववेद में 5,987 मंत्र और 20 कांड हैं। इसमें भी ऋग्वेद की बहुत-सी ऋचाएं हैं। इसमें रहस्यमय विद्या का वर्णन है।

 


वेद से निकला षड्दर्शन : जब ऋषियों ने वेद को सीधा सीधा न मानकर प्रयोग द्वारा तर्क द्वारा सिद्ध क़िया और पी एच डी की तो जो लिखा वह है षड्दर्शन।

यह भी हजारों होंगे पर काल गर्त और आक्राताओं द्वारा नष्ट कर दिये गये होंगें। अब यह छह है अत: षट्दर्शन या षड्दर्शन कहते हैं।  1.न्याय, 2.वैशेषिक, 3.सांख्य, 4.योग, 5.मीमांसा, 6.वेदांत। उक्त 6 को वैदिक दर्शन (आस्तिक-दर्शन) क्योंकि यह वेदों को मानते हैं। 

 

तथा

7. चार्वाक, 8. बौद्ध, 9. जैन इन 3 को 'अवैदिक दर्शन' (नास्तिक-दर्शन) कहा है। क्योंकि यह वेद को प्रमाण नहीं मानते। मानेंगे कैसे जब वेद संस्कृत में है और इनका ज्ञान पाली भाषा में है। कुछ लोगों ने जबरिया अपना ज्ञान छौंक कर लिखा होगा।

वैसे बुद्ध और जैन की सारी शिक्षायें वेद या वेद गर्न्थों द्वारा समझी जा सकतीं हैं। मेरे एक लेख में मैंने बुद्ध को श्रीमद्बग्वद्गीता और पांतान्जलि से समझाया है। बुद्ध ने कुछ नया नहीं बोला।

वाले आस्तिक और न मानने वाले नास्तिक हैं, इस दृष्टि से उपर्युक्त न्याय-वैशेषिकादि षड्दर्शन को आस्तिक और चार्वाकादि दर्शन को नास्तिक कहा गया है।

 


6 वेदांग :

वेदों के 6 अंग- (1) शिक्षा, (2) छंद, (3) व्याकरण,

(4) निरुक्त, (5) ज्योतिष और (6) कल्प।

 


6 उपांग : यानी उप अंग

(1) प्रतिपदसूत्र, (2) अनुपद, (3) छंदोभाषा (प्रातिशाख्य), (4) धर्मशास्त्र, (5) न्याय तथा (6) वैशेषिक।

ये 6 उपांग ग्रंथ उपलब्ध हैं। इसे ही षड्दर्शन कहते हैं, जो इस तरह है- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत।


वेदों के उपवेद : ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्य वेद-  ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।


आधुनिक विभाजन : आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों का विभाजन कुछ इस प्रकार किया गया- (1) याज्ञिक, (2) प्रायोगिक और (3) साहित्यिक।


वेदों का सार है उपनिषदें और उपनिषदों का सार 'गीता' को माना गया है। इस क्रम से वेद, उपनिषद और गीता ही धर्मग्रंथ हैं, दूसरा अन्य कोई नहीं। स्मृतियों में वेद वाक्यों को विस्तृत समझाया गया है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत को इतिहास तथा पुराणों को पुरातन इतिहास का ग्रंथ माना गया है।

विद्वानों ने वेद, उपनिषद और गीता के पाठ को ही उचित बताया है।

मेरा मानाना है कि यदि हम वेदों को गौशाला मानें तो गायें है उपनिषद गीता है दूध और राम चरित मानस है मक्खन। षट दर्शन को नंदी और अन्य शार्त्रों को बछडा मान सकते हैं।

ऋषि और मुनियों को दृष्टा कहा गया है और वेदों को ईश्वर वाक्य। वेद ऋषियों के मन या विचार की उपज नहीं है। ऋषियों ने वह लिखा या कहा जैसा कि उन्होंने पूर्ण जाग्रत अवस्था में देखा, सुना और परखा।

 


मनुस्मृति में श्लोक (II.6) के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है। वेद किसी भी प्रकार के ऊंच-नीच, जात-पात, महिला-पुरुष आदि के भेद को नहीं मानते। ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते हैं जिनमें से लगभग 30 नाम महिला ऋषियों के हैं। जन्म के आधार पर जाति का विरोध ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त (X.90.12) व श्रीमद्‍भगवत गीता के श्लोक (IV.13), (XVIII.41) में मिलता है।

श्लोक : श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।

तत्र श्रौतं प्रमाणंतु तयोद्वैधे स्मृति‌र्त्वरा॥

भावार्थ : अर्थात जहां कहीं भी वेदों और दूसरे ग्रंथों में विरोध दिखता हो, वहां वेद की बात की मान्य होगी। -वेद व्यास

प्रकाश से अधिक गतिशील तत्व अभी खोजा नहीं गया है और न ही मन की गति को मापा गया है। ऋषि-मुनियों ने मन से भी अधिक गतिमान किंतु अविचल का साक्षात्कार किया और उसे 'वेद वाक्य' या 'ब्रह्म वाक्य' बना दिया।

 

वेदों का काल

असली वेद जो ज्ञान का भंडार थे , उनमे से कुछ जानकारी मुगल साम्राज्य मे व कुछ अंग्रेजो के समय मे नष्ट हो गई । वेद हमे ब्रह्मांड के अनोखे , आलोकिक व अनंत राज बताते है जो समय व समझ से परे है। वेद की पुरात्न नीतिया व ज्ञान इस दुनिया को न केवल समझाते है इसके अलावा वो इस दुनिया को पुनः सुचारू तरीके से चलाने मे मददगार साबित हो सकते है।

 

वेदों का महत्व

प्राचीन काल से भारत में वेदों के अध्ययन और व्याख्या की परम्परा रही है। वैदिक सनातन वर्णाश्रम(हिन्दू) धर्म अनुसार आर्षयुग में ब्रह्मा से लेकरवेदव्यासतथा जैमिनि तक के ऋषि-मुनियों और दार्शनिकौं ने शब्द,प्रमाण के रूप में इन्हीं को माने हैं और इनके आधार पर अपने ग्रन्थों का निर्माण भी किये हैं। इतिहास(महाभारत), पुराण आदि महान् ग्रन्थ वेदों का व्याख्यानके स्वरूपमें रचे गए। प्राचीन काल और मध्ययुग में शास्त्रार्थ इसी व्याख्या और अर्थांतर के कारण हुए हैं। मुख्य विषय - देव, अग्नि, रूद्र, विष्णु, मरुत, सरस्वती इत्यादि जैसे शब्दों को लेकर हुए।

कणाद ने "तद्वचनादाम्नायस्य प्राणाण्यम्" और "बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे" कहकर वेद को दर्शन और विज्ञान का भी स्रोत माना है।

प्राचीन नियमविधाता महर्षि मनु ने कहा वेदोऽखिलो धर्ममूलम् - खिलरहित वेद अर्थात् समग्रसंहिता,ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदके रूपमें वेद ही धर्म वा धर्मशास्त्र का मूल आधार है। न केवल धार्मिक किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से भी वेदों का असाधारण महत्त्व है। वैदिक युग के आर्यों की संस्कृति और सभ्यताको जानने का एक ही वेद तो साधन है। मानव-जाति और विशेषतः वैदिकौंने अपने शैशव में धर्म और समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान केवल वेदों से मिलता है। विश्व के वाङ्मय में इनको प्राचीनतम ग्रन्थ( पुस्तक )माना सलोगन लेखन जाता है। आर्यौंका-भाषाओं का मूलस्वरूप निर्धारित करने में वैदिक भाषा अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई है।

सभी बड़े विद्वान और शोधकर्ता वेद को मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन पुस्तक मानते हैं। वे अपने जन्म से आज तक अपने मूल रूप में बने हुए हैं। उन्हें मूल स्वरुप में बनाए रखने वाली अनूठी विधियों को जानने के लिए पढ़ें – ‘वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?‘ कई विद्वान इसे सृष्टि के महानतम आश्चर्यों में गिनते हैं।

 

आतंकवादी जाकिर नाइक के गुरु

आतंकवादी जाकिर नाइक के गुरु और जाने पहचाने इस्लामिक विद्वान अब्दुल्ला तारिक भी वेदों को प्रथम ईश्वरीय किताब मानते हैं। जाकिर नाइक ने अपने वहाबी फाउंडेशन के चलते भले ही इस बात को खुले तौर पर स्वीकार न किया हो, पर इसका खंडन भी कभी नहीं किया। वेदों में मुहम्मद की भविष्यवाणी दिखाने की उनकी साजिश से इस बात की पुष्टि होती है कि वह वेदों को अधिकारिक रूप से प्रथम ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं। वैसे उनकी यह कोशिश मशहूर कादियानी विद्वान मौलाना अब्दुल हक़ विद्यार्थी की जस की तस नक़ल है।

कादियानी मुहीम का दावा ही यह था कि वेद प्रथम ईश्वरीय किताब हैं और मिर्जा गुलाम आखिरी पैगम्बर। वेद मन्त्रों के गलत अर्थ लगाने और हेर-फेर करने की उनकी कोशिश को हम नाकाम भी हो चुकी है। लेकिन इतनी कमजानकारी और इतनी सीमाओं के बावजूद वेदों को प्रथम ईश्वरीय पुस्तक के रूपमें मुसलमानों के बीच मान्यता दिलवाने की उनकी कोशिश काबिले तारीफ है।

मूलतः यह धारणा कि वेद ईश्वरीय नहीं हैं – ईश्वर को न मानने वालों और साम्यवादियों की है। हालाँकि वे वेदों को प्राचीनतम तो मानते हैं। उनकी इस कल्पना की जड़ इस सोच में है कि मनुष्य सिर्फ कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं का पुतला मात्र है। खैर, यह लेख नास्तिकों और साम्यवादियों की खोखली दलीलों और उनकी रासायनिक प्रक्रियाओं के अनुत्तरित प्रश्नों पर विचार करने के लिए नहीं है।

गौर करने वाली बात यह है कि नास्तिकों के इस मोर्चे को अब कई हताश मुस्लिमों ने थाम लिया है, जो अपने लेखों से वेदों की ईश्वरीयता को नकारने में लगे हुए हैं। पर अपने जोश में उन्हें यह होश नहीं है कि इस तरह वे अपने ही विद्वानों को झुठला रहेहैं और इस्लाम की मूलभूत अवधारणाओं को भी ख़त्म कर रहे हैं। हम उन से निवेदन करना चाहेंगे कि पहले वे अपने उन विद्वानों के खिलाफ फ़तवा जारी करें – जो वेदों को प्रथम ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं या उन में मुहम्मद को सिद्ध करनेकी कोशिश करते हैं, साथ ही अपनी नई कुरान को निष्पक्षता से देखने की दरियादिली दिखाएं।

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वेद को गाली देनेवाले कौन थे चार्वाक

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