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Sunday, September 20, 2020

(नास्तिकों को चुनौती) सचल मन वैज्ञानिक ध्यान विधियां: एक वैज्ञानिक का विश्लेषण

 सचल मन वैज्ञानिक ध्यान  विधियां: एक वैज्ञानिक का विश्लेषण 

  (नास्तिकों को चुनौती) 

सनातनपुत्र देवीदास विपुल"खोजी"


जैसे जैसे मानव विज्ञान की खोज अपने सुख के लिए करता जा रहा है वह समाजिक रूप से अधिक दीवालिया होता जा रहा  है। दूसरे शब्दों में आलसी।


बस इसी आलस्य के कारण ईश्वरीय शक्ति को भी लोगों के घर की काल बेल बजानी पडती है किंतु शठ मानव अपने द्वार तक नहीं खोलता क्योंकि उसे भौतिक सुख ही चारवाक की भांति  रुचिकर लगता है।


सचल मन वैज्ञानिक ध्यान  विधियां का निर्माण शायद ईश ने इसीलिये कराया है जिससे मनुष्य बिना कहीं जाये। बिना पैसा या समय खर्च किए अपने घर पर सनातन की शक्ति का अनुभव अनुभूति कर सकें। प्रभु ने इस कार्य के लिये मुझे यानि एक पोस्ट ग्रेगुएट इंजीनियर वैज्ञानिक को चुना। जिसे लोग विश्वास कर सकें और अपने घर पर ही कुछ तो करें।


क्योंकि आज की तारीख में चाहे कृष्ण राम जीसस या अल्ल्ह खुद सामने आ जायें तो हम उन्हें झूठा कह कर अपमानित करनें में देर नहीं करेंगे। लेकिन यदि कोई भौतिक रूप की डिग्रियों को सामने लाकर बात करेगा तो उसकी बात काटने के पहले हजार बार सोंचना पडेगा। मेरा यह खुद का अनुभव है।


वैसे मैं पूरे होशो हवास के साथ नास्तिकों चार्वाकों को चुनौती ही देता हूं तुम महामूर्ख अज्ञानी हो। बस यह विधि अपने घर पर बिना पूर्वाग्रह के अपने घर पर करो। तुमको समय तो देना ही पडेगा। दुनिया का कोई भी काम करो तुमको समय देना पडता है। तो इस कार्य के लिये लोग लाखों मंत्र जप करते हैं। सालो साल लगते हैं। वह अनुभव मात्र कुछ समय में मिले तो घाटे का सौदा नहीं है। मेरा मोबाइल नोट कर लो। 9969680093।

काल मत करो। व्हाट्सप करो। तुम्हे तुम्हारा उत्तर समय पर मिल जायेगा।


फिर से एक बार नास्तिकों को चुनौती।


"MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"
 


हमारे पास डाटा है कि एक दिन से एक महीने का समय पर्याप्त हुआ है। औसतन 11 दिन में लोग अचम्भित हो गये। लोगों को कृष्ण शिव दुर्गा अथवा काली मां की दर्शनाभूति के साथ प्रकाश और अन्य शारीरिक अनुभव हो चुके हैं।


मैं चाहता हूं हमारे मित्र लाभांवित हो। जीवन के वास्तविक उद्देश्य के साथ वे कितने रहस्यों को जान सकते हैं खुद को पहिचान सकते हैं। यदि आप लाभांवित होगें तो मुझे अच्छा लगेगा। मेरा कौन सा स्वार्थ पूरा होगा। आप सोंचे। अत: अनुरोध है। व्यर्थ की किताबी और पूर्वाग्रहित बात न करें। सारगर्भित और विवेकपूर्ण अनुभवित बात रखें। सामान्य ज्ञान हेतु गूगल गुरू की शरण में जायें।

 

मित्रों मै हर्कोर्टियन हूं (एच.बी.टी.आई, कानपुर का इंजीनियर हर्कोर्टियंस कहलाता है)  पर बेहतर है पूरा परिचय दूं। कारण कल एक बेटे के समान नादान जूनियर ने मेरी पोस्ट पर अपनी बात रखी। मुझे अच्छा लगा परंतु रैगिंग न होने कारण आज के बच्चे बात करना नहीं जानते। मैं अपने सीनियर्स को जो मेरे साथ तक के 12 के हैं (क्योकिं मैं सी.टी. का हूं जो बी.एस.सी. के बाद होता था) मैं उनको सर कहता हूं और मुझे मेरे 83 तक के पास आउट जो वाइस चांसलर तक हैं वे सम्मान करते हैं। बातचीत में सर ही कहते हैं। नाम तक नहीं लेते हैं। यह परम्परा थी एच.बी.टी.आई. की। जो धीरे धीरे मरती गई। कि आज सीनियर्स से बात करना नहीं आता।


मैं सनातन के गीता के वेदों के प्रचार हेतु निकला हूं। जिसमें एच.बी.टी.आई के ही तमाम मित्रों का सहयोग है और जो अनुभव के साथ मेरे साथ जुडे है। चलो कुछ नाम भी लेता हूं। सर्व श्री अंशुमन द्विवेदी, 96 या 97, पेंट, कन्साई नेरोलेक का भारत का बिजनेस हेड। अरुण दद्दा 96 या 97 फूड, अपनी इंडस्ट्री, और भी नाम हैं। डा यशोधरा शर्मा प्रिंसिपल डिग्री कॉलेज आगरा। यहां तक की कुछ सन्यासी भी लेकिन उनका नाम नहीं ले सकता।


प्रिय मित्रों। जीवन रहस्यमय है और विज्ञान की सीमायें। हम अपनी बाहरी खोजों से नित्य नये नये अनुसंधान करते हैं कि मनुष्य को सुख मिले पर क्या वह सुखी हो पा रहा है। नये क्रूर अपराध क्या सुख दे पा रहें। मोबाइल की खोज मनुष्य को नजदीक लाने के लिये की गई पर क्या हम अपने सम्बंधियों से नजदीक हैं। हम एक आभासी जीवन जीते जा रहें हैं। जो पूर्णतया: असत्य और कष्टकारी है। मतलब क्या बाहर की शोध हमें सुख दे पा रही है। यह ठीक है औसतन आयु बढी पर क्या हम अपने बुजुर्गों के समान मानसिक औए शारिरिक अभावों के बावजूद सुखी हैं। मुझको तो मेरे पिता जी मरते मरते मार गये। क्या हम अपने बच्चों को डांट भी सकते हैं। मुझे जितनी पिटाई हुई कहीं उतनी आज बीस साल के बच्चे को कर दो तो मर जायेगा। तमाम बातें जो तर्कों से तौली जा सकती हैं पर नतीजा कुछ नहीं। वातावरण को समाज को दोष देकर हम बचने का बहाना खोज सकते हैं। पर क्या हम सुखी हैं। समाज तो हम से ही बना है। देश और वातावरण भी हमसे बना है। तो जिम्मेदार कौन? हम ही हुये न।


अत: मैंने अंदर की खोज भी आरम्भ की। बिना पूर्वाग्रहित हुये। इसके लिये संतुलित होना बहुत जरूरी है। क्या हम उन तमाम संतों को ज्ञानियों सिर्फ अपने पूरवाग्रह के कारण मूर्ख या झूठा बोल दें। क्या हम उन तमाम महात्माओं को जो इतना साहित्य बिना किसी सुख सुविधा के लिख गये उसका मजाक बनायें। सनातन में तो चारवाक जिन्होने ईश्वर को नहीं माना उनको भी बराबर सम्मान दिया और ऋषि का स्थान दिया।


यह भी सत्य है। जो सिर्फ अपने को सही कहे वो है महामूर्ख। आजकल दुकानदार भी बहुत हैं। पर ईमानदार भी हैं। अत: यदि हमको शोध करनी है तो सबको सुनकर परन्तु खुद प्रयोग कर अपनी शोध जारी रखनी होगी। सनातन हर तर्क को मानता है और कहता है ईश तक पहुंचने के तमाम रास्ते हैं। बाइबिल कहती है सिर्फ ईशू और ये ही सही बाकी गलत। कुरान तो जो न माने उसको मारने का हुक्म देती है। मुस्लिम देशों में कुरान की बात काटने पर सजाये मौत तक दी जाती है। मतलब साफ सनातन बुद्धि को विस्तारित होने का मौका देकर खुद की गीता लिखने की अनुमति देती है। पर बाइबिल और कुरान अपनी किताब के बाहर सोंचने को अपराध मानती है। अत: मैंने बाइबिल कुरान पढा पर शोध का मार्ग सनातन को ही बनाया। दोनो पुस्तक पूर्णतया: मानव व्यवहार और मानव जिज्ञासा विरोधी हैं। जो आंतरिक शोध को रोकती हैं। चाहें उसके लिये हिंसा के साथ झूठ, छल और फरेब ही क्यों न करना पडे, क्योंकि इनको मान्यता दी है।


अत: मैंनें ध्यान की आधुनिक वैज्ञानिक विधियां जिसको सचल मन वैज्ञानिक ध्यान विधियां (समवैध्यावि) या Movable Mind Scientific Techniques for  Meditation- MMSTM नाम दिया है, उसका निर्माण प्रभू कृपा से कर दिया।


ईसाईयों हेतु जीसस को याद कर उनकी पद्दति  के द्वारा  मुस्लिम हेतु नमाज पढकर उनकी पद्दति के द्वारा, इसी भांति आस्तिक, सगुण, साकार, द्वैत उपासक हेतु, निराकार, प्रकृतिपूजक हेतु, नास्तिक, अनीश्वरवादी हेतु, नास्तिक अहम् वादी हेतु उनके विचार और पद्दति के द्वारा ईश शक्ति को अनुभवित कर सकता है।


मेरा मतलब ईश्वरिय शक्ति जीसस नहीं गाड, मोहम्मद नहीं अल्लह, कोई इंसान नही भगवान सिर्फ एक ही एक ही है। जो वेद कहता है गीता कहती है। उसका अनुभव करो। जिससे तुम्हारी मिथ्या सोंच टूट जाये और तुम मात्र मानव जाति को मानो। पर यह भी सही इसको ईसाई भले ही एक बार देख लें पर मुस्लिम देखेगा यह संदेह है।  


मैं अपने को न गुरू मानता हूं। न बनने की या धन कमाने की इच्छा है। मैं हूं एक खोजी। एक शोध कर्ता। जिसने वाहिक के साथ अंदर की भी शोध की। अपने अनुभव लेखों में स्वकथा में ब्लाग पर लिखे हैं। और अपने व्हाटाअप ग्रुप “ आत्म अवलोकन और योग” के माध्यम से अनुभवित लोगों को मार्गदर्शन दे रहा हूं। किताबी ज्ञानियों को दूर से प्रणाम करता हूं। तर्क से पहले हार मान लेता हूं। नकली गुरूओ से तांत्रिकों से भिडता हूं। बस सिर्फ और सिर्फ अनुभवित लोगों से ही बात करना पसंद करता हूं। ग्रुप में भारत सरकार और अन्य बडे बडे वैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर्स, हिंदू, मुसलमान, सिख, गुरू, सन्यासी, भीषण तांत्रिक, घनघोर नास्तिक जो ईश्वर को गाली देकर अनुभव प्राप्त कर चुके हैं। वे सदस्य हैं। मैनें प्रयोग किये हैं तब बात कर रहा हूं। ग्रुप में कुछ जगह खाली है। यदि आप व्यर्थ बात न करें। सिर्फ मूक बनकर पोस्ट देखें तो आपको उनके नम्बर और पते भी मिल जायेंगे।


मैं चाहता हूं हमारे मित्र भी लाभांवित हो। जीवन के वास्तविक उद्देश्य के साथ वे कितने रहस्यों को जान सकते हैं खुद को पहिचान सकते हैं। यदि आप लाभांवित होगें तो मुझे अच्छा लगेगा। मेरा कौन सा स्वार्थ पूरा होगा। आप सोंचे। अत: अनुरोध है। व्यर्थ की किताबी और पूर्वाग्रहित बात न करें। सारगर्भित और विवेकपूर्ण अनुभवित बात रखें। सामान्य ज्ञान हेतु गूगल गुरू की शरण में जायें।


आपका हितैषी मित्र


अन्य लेख हेतु : 

MMSTM समवैध्यावि ध्यान हेतु : 

https://freedhyan.blogspot.com/2018/04/blog-post_45.html


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