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Monday, October 8, 2018

कबीरदास से साक्षात्कार



कबीरदास से साक्षात्कार
सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"




बात फरवरी 2018 की है जो मेरे फेस बुक पर 17 फरवरी को पोस्ट भी है। गोरखपुर जाना हुआ तो मगहर भी गया। 
 
 
मित्रो कबीर को जानने की इच्छा ही रही थी। पहले मजार पर गया। मत्था टेका कुछ ध्यान लगाया। एक लंबे कुछ गोरे चेहरे लंबी ढाढी सिर पर घुमावदार पीला मकुट किसी गद्दी पर बैठे महात्मा दिखे। ऊपर मसिजद नुमा हरे गुम्बद। पीछे मक्का की मस्जिद जैसा चित्र। अंदर से बोला गया कि पीरू खान ने यह मजार बनाई है।
 
 

समाधि पर मत्था टेका तो वोही आकृति सफेद कपड़ो में आसन पर दिखाई दी। समाधि पर विष्णु के नारियल लोटेनुमा कलश और दूर एक चक्र भी दिखाई दिया। अंदर से आवाज आई इस समाधि का निर्माण भगवान सिंह नामक शिष्य ने किया।
 
 

मजे की बात फूल दोनो में कही नही मिले थे। उन मजार और समाधि के वीच में समभुज त्रिकोण की मध्य कोने पर कबीर दिखे। जहाँ उनके अंतर्ध्यान होने के बाद फूल मिले थे। ऐसा प्रतीत हुआ।
वोही सज्जन जो दोनो जगह दिखे। पर यह सफेद टोपी पहने थे जैसी उनके चित्रों में है।



इनके मतलब कबीरदास वैष्णव थे। साकार से निराकार सगु से निर्गुण की ओर गए। वैसे उन्होने राम की बात जगह जगह की है।
 
 
 
कुल मिलाकर आज जो पढ़ा रहे है कुछ कि कबीरपंथी के नाम पर कि वे निरकार थे तो यह गलत है। वे अपुन लोगो की तरह साकार पूजन से निराकार का अनुभव और योग को जान पाए थे।



कुछ ऐसे ही फेसबुक पर पिछले दिनों मैं एक मॉनसिक रोगी अधर्म की दुकान चलानेवाले रामपाल की पोस्ट की दुनिया मे गया। वहाँ देखा कि व्यक्ति किस तरह झूठ बोलकर भी भारत मे अपनी दुकान चला सकता है।

के चेले क्या बकवास लिखते है। 
 
 

1 राम कृष्ण इत्यादि सब झूठे। सब चोर पतित है।
 
 
2 वेद पुराण सिर्फ कबीर के गुण गाते है। हंसी आती है वेदों के क्या अनर्थ लगाए हैं। कही भी यदि क शब्द आ भी गया तो वह सीधे कबीर बन गया। ऐसी काल्पनिक बकवास।
 
 
3 गीता गलत है। रामायण गलत। साथ में तमाम बकवास

Thursday, August 8, 2019

चर्चा शायद आपको न मालूम हो

 चर्चा शायद आपको न मालूम हो

 

 

सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"

 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
वैज्ञानिक अधिकारी, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
 फोन : (नि.) 022 2754 9553  (का) 022 25591154   
मो.  09969680093
  - मेल: vipkavi@gmail.com  वेब:  vipkavi.info वेब चैनलvipkavi
ब्लाग: freedhyan.blogspot.com,  फेस बुक:   vipul luckhnavi “bullet

किसी का प्रश्न है कि फिर इतने शास्त्र क्यो तंत्र पर।

मैं कहूंगा कि क्योकि यह शक्ति को बांधकर अपने वश में करने का सबसे जल्दी उपलब्ध मार्ग है।

किसी दिन अचानक मन्त्र जप करते करते आपके अंदर आवेग आता है। मन मस्तिष्क सब सुन्न सा हो जाता है। हाथ पैर भीचने से लगते है। मन मे प्राण में हर तरफ यह विचार आने लगता है कि मैं ही ब्रह्म हूँ। शिव हूँ विष्णु हूँ इत्यादि साथ उन देवो की भांति ऐसा लगता है मुख खुल गया। उंगली में चक्र आ गया। हाथ मे त्रिशूल आ गया। वैगेरह वगैरह। और इसके साथ कुछ अनुभूतिया भी होने लगती है। जैसे मेरा आकार बढ़ने लगा है। बोली भी बदल जाती है। मुख से निकलने लगता है कि मैं यह हूँ वह हूँ।।

फिर धीरे धीरे सब शांत हो जाता है।

शिव लोक मिलेगा। मोक्ष नही। शिव एक पद मात्र है।

हर देव के तन्त्र है।

जिससे वह लोके मिल जाता है।

पर मोक्ष निराकार से ही मिलता है। क्योकि तन्त्र साकार है। सगुण है इसीलिए।

वाम मार्गी अहिंसक मार्ग। भक्ति मार्ग है समर्पण का दासत्व भाव का साकार का।

प्रश्न है पर आप तो साकार पर ज्यादा दबाब देते है

दक्षिण मार्ग हिंसक और शक्ति को वश में करने का।

कॉल मार्ग सबका बाप।

क्योकि इसमें आनन्द है। अहंकार की संभावना कम है। दासत्व भाव है। समर्पण है।

हॉ यही है। पर इसके पहले दर्शन जरूरी है या निराकार का कोई अनुभव।

प्रश्न है कि तंत्र में  इछुक साधक को किस मार्ग को चुनना चाइये

सर्वश्रेष्ठ है और सर्वहित है। भक्तिमार्ग। निसमे आनन्द के जीवन मूल्यों का पता चलता है। प्रभु खुद सहायता करते है।

फिर भी आपसे पूछता है एक तंत्र साधक को तंत्र के लिए किस मार्ग का चयन करना चाहिये। बताये सर आपका एक अच्छे मार्गदर्शक भी है ज्ञानी के साथ साथ।

आपसे बोला पहले लेख पढ़ो। mmstm करो। फिर जो अनुभव हो बात करो। हर काम मे जल्दबाजी ठीक नही। आपको तंत्र मार्ग सूट करेगा कि नहीं। यह पता चल जायेगा। वैसे सात्विक और अहिंसंक मार्ग मैं सर्वश्रेष्ठ मानता हूं। अघोर मार्ग समाज से कटा हुआ और अलग है।

जी सर मैं जरूर करूँगा

ढोंग से ही सही। यदि अदीक्षित हो तो जबरदस्ती नाम जप मन्त्र जप करते रहो। पाठ इत्यादि करते रहो। एक नियम बना और पालन करो।

औषधि मरीज को जबरदस्ती देनी पड़ती है। वह फायदा कर जाती है। प्रभु का नाम जप भी औषधि है।


क्रोध को प्रेम से। घृणा को स्नेह से।

पाप को पुण्य से।अंधेरे को प्रकाश से।

लूले को हाथ से। अकेले को साथ से।

सूखे को सींच के। बैरी को भींच के।

जीतना चाहिए। जीतना चाहिए।


सोने को ताप के, शत्रु को भाप के।

अज्ञान को ज्ञान से, स्वामी को प्राण से।

भूखे को अन्न से, प्यासे को जल से।

अकेले को साथ से, हाथों में हाथ से।

जीतना चाहिए, जीतना चाहिए।


पर्व को उल्लास से, प्रेम को विश्वास से।

सुख दुःख बांट के, हठी को डांट के।

लक्ष्य को जान कर, मार्ग पहिचान कर।

गुरु में विस्वास कर, जीवन में आस कर।

जीतना चाहिए, जीतना चाहिए।

लेख को पढ़कर, कविता को लिख कर।

नीति को प्यार कर, अनीति प्रहार कर।।

प्रभु को जान कर, सनातन को मान कर।

आहट को भानकर, गीत को गानकर।।

जीतना चाहिए, जीतना चाहिए।।


इन पंक्तियों में पर्व के भी लेखन हैं।

कृष्ण के संदीपन। बचपन के। कबीर के रामानन्द। रविदास कबीर के गुरुभाई थे। अतः दोनो पूर्ण ज्ञानी थे। क्योकि दोनो ने साकार से निराकार की यात्रा की। जो सनातन कहता है। ईश एक है। उस तक जाने के मार्ग अनन्त। महावीर स्वामी तो गुरु शिष्य परम्परा की जैन दर्शन की पराकाष्ठा थे। वे 24 वे तीर्थयनकर थे। यानी 24 वे शिष्य जो जिन हुए। मतलब जिनकी आराधना से निर्वाण मिल सकता है। बुध्द के दो गुरु थे। दूसरे सनातनी थे। जिनका नाम रुद्ररामदतपुत्त था। पहले अलाराकलाम थे। दूसरे गुरु ने उनको विपश्यना यानी श्वासोश्वास करना सिखाया था। जेसस ने बौद्ध लामाओं से शिक्षा ली थी।

बाकी अपूर्ण ज्ञानी क्योकि सिर्फ एक ही मार्ग की बात की।  क्योकि सनातन कहे पूरा सर्किल सब विधि एक ईश तक जाती है ।

महावीर जैन परम्परा जो सनातन की गुरु शिष्य शाखा। अनीश्वरवादी पर देवो की तरह जिन की पूजा से उद्धार। बौध्द अनीश्वर पर सारे सिद्दांत सनाटन के अष्टकर्म तो पातञ्जलि के। अप्रिमितताये गीता से और उपनिषद से। हा भाषा अलग पाली में सँस्कृत नही।

जेसस वेरी नैरो सिर्फ मेरे पीछे चलो। मोहहमद और नैरो मेरे पीछे आओ नही तो कत्ल हो जाओ।

ग्रुप में कोई विवादास्पक बहस से क्या मिलेगा। सिर्फ ऊर्जा खर्च। ग्रुप खचड़ा बन जायेगा।

क्या मिलेगा बहस से मैं ओशो को व्यक्तिगत रूप से पापी मानता हूँ। महाज्ञानी पापी। तुम उसको महाज्ञानी। इसका नतीजा क्या होगा। न मैं समझा पाऊंगा न तुम समझा पाओगे।

अतः निवेदन है ओशो पर चर्चा न की जाए। मेरी गलती थी। मैने कुछ तर्क जो फेसबुक पर दिए थे। वह यही पर पोस्ट कर दिए।

विपुल जी आपने लिखा है *महाज्ञानी पापी* इसका तात्पर्य???????‬

मतलब ज्ञान था। पर मनगुरु की वाणी से भटक कर सामाजिक पाप कर डाले।

वैसे आपसे अनुरोध है कि पहले ब्लाग पर जाकर कुछ लेख पढ़ ले। जिससे आपके प्रश्न और जिज्ञासाएं शांत हो जाएगी।

साथ ही यदि आप अदीक्षित है तो mmstm यानी सचल मन वैज्ञानिक ध्यान विधि अपने घर पर करे। ताकि आपको ईश शक्ति का अनुभव हो सके।

जय माँ काली। जय गुरुदेव।

*सच्चे संत हमेशा यही कहेंगे*

*कि मेरी पूजा मत करना*

*नाही ही मुझसे कूछ ऊम्मीद लगा के रखना की मै कोई चमत्कार करुंगा*...

*दु:ख पैदा तुमने किया है और ऊसे दुर तुम्हे ही करना पडेगा*

*मै सिर्फ तुम्हे मार्ग बता सकता हु क्योंकी मै चला हु ऊस मार्ग पर*

*लेकिन ऊस रास्ते तुम्हे स्वयम ही चलना पडेगा*

सच्ची प्यास है जो लिए, ग्रुप में वो रुक पाय।

जैसे कच्चा हो घडा, जल भरते फुट जाय।।

जिस प्रकार एक चित्र को पूरा होने के लिए। बगीचे को सुंदर होने के लिए रंगों की और विभिन्न पुष्पों की आवश्यकता होती है। फल को निकलने के लिए पौधे को एक निश्चित समय के बाद फलित होने के लिए तैयार होना पड़ता है। जन्म के पूर्व नवमास कष्ट भोगने पड़ते है। कुछ इसी प्रकार ईश कृपा हेतु, गुरू प्राप्ति हेतु एक स्तर तक प्रयास कर जाना होता है। तब तक मनुष्य यह सोंचता है यह सब मैं कर रहा हूँ यह मेरा पुरुषार्थ  है। पर बाद में मालूम पड़ता है। नहीं यह मेरा भरम था। कर्त्ता करण और कारक सिर्फ ईश है। प्रश्न वो ही निर्मित करता है। उत्तर भी वो ही देता है। अंक भी वोही देता है।

अतः कभी भी जल्दबाजी न करे। जब समय आएगा सब हो जाता है। आपके हाथ सिर्फ इतना है कि कर्म रूपी शक्ति को किस दिशा में ले जाये। राम नाम की तरफ या जगत काम की तरफ।

वास्तव में ये भी तब तक है जब तक उसका भान नही होता है। जब हो जाता है तो हर कर्म उसी का हर मर्म और धर्म उसी का लगता है। मैं तो बस निमित्त मात्र।

अब यदि उत्थान चाहते हो तो राम नाम लो। मतलब मन्त्र जप करो सतत। निरन्तर। अखण्ड।

मोक्ष है निराकार कृष्ण यानि सुप्त ऊर्जा में विलीन होना जिसे अल्लह गाड कहते है। इसी को निर्वाण कहते है।

साकार कृष्ण यानि विष्णु लोक की यात्रा। मोक्ष नही। लोको में जाना परम् पद हैं।

अति सुंदर और मौलिक प्रश्न है।

जब प्रथम मानव बना तो ईश के नजदीक था। प्रभु ने उसे कर्म की शक्ति दी। पर सोंच उसको अपनी भी दी। कर्म फल निर्धारित हुए। अब मनुष्य का मन जगत की ओर भागा। उस समय काम सर्वशक्तिमान जगत में था। क्योकि जनसंख्या बढ़ानी थी। उसी काम के उद्देग में मनुष्य लिप्त होता गया। यह कोई पाप न था। पर इसके आनन्द हेतु मर्यादाएं तोड़कर स्त्री को दुःख पहुचकर लिप्त हो गया।

जो पाप हो गया। उसका कर्मफल मनुष्य को नीचे गिराता गया। बाद में सत्ता सुख की लालसा पैदा होने के बाद उससे और गलत कर्म करवाती गई। इस प्रकार मनुष्य गिरता गया।

इसी के आधार पर चारो युग विभाजित हुए। जैसे

सतयुग अच्छे लोग 75 से 100

द्वापर 75 से 50

त्रेता 50 से 25

कलियुग 25 से 0।

मनुष्य को जब नीचे श्रेणी में रहता है तो अहसास नही होता। पर जैसे जैसे उसकी बुद्धि शुद्ध होती जाती है उसकी सोंच और कर्म बदलते है। वह ईश के नजदीक आता जाता है। यहाँ एक बात समझो कर्म चाहे सत्व या दुर्गुणी दोनो की शक्ति ईश की है पर सोंच हमारी। यानी हमारे कर्मफल के अनुसार। जैसे जैसे सोंच सुधरी वैसे वैसे हर कार्य मे प्रभु दिखना आरम्भ। हमारी आंखों का पर्दा हटना चालू हुआ।

तुम यह समझ लो जगत में जो जितना भौतिक शक्तिशाली वह उतने अधिक पुनयकर्मो के बैलेंस से कम हो रहा है।

जो जितना कष्ट में वह अपने दुष्कर्मो को कम कर रहा है क्योंकि भोग रहा है।

क्या आप जानते है मुक्तानन्द के ऊपर श्री विष्णु तीर्थ जी महाराज ने शक्तिपात करदिया था।

गुरु नही ऐसी ही टाइमपास में।

भगवान क्या है? और है भी या नहीं है?

सर, पुरा विवरण बताए ,बड़ी जिज्ञासा है

मित्र ब्लाग पर 104 लेख जो मॉर्च से अब तक लिखे है। कुछ पढ़ लो तुम जो सोंच भी नही सकते वो उत्तर भी मिल जायेंगे।

शक्तिपात से क्या होता है

मित्र ब्लाग पर 104 लेख जो मॉर्च से अब तक लिखे है। कुछ पढ़ लो तुम जो सोंच भी नही सकते वो उत्तर भी मिल जायेंगे।

एक ही बात को कहां तक कितनी बार लिख सकते है।

Freedhyan.blogspot.com

इसकी आवश्यकता नही।

1- वो एक चीज जो हम पाना चाहते है उसके लिए और

2- वो एक चीज जो हम त्यागना चाहते हैं

उन दोनों के प्राप्ति और विषर्जन के लिए अपना पूरी क्षमता से प्रयास करें।


प्रयास साधनात्मक भी...व्यवहारिक भी...

नैतिक भी ...चारित्रिक भी...

आप लिंक के लेख पढ़ें। सबसे पहले ताकि आपकी परेशानियां दूर हो।

तन्द्रिल अवस्था मे लोकान्तर भ्रमण के सम्बन्ध मे मार्गदर्शन करने वाली कौई पुस्तक है ?

जी उजाले की ओर ब्रह्मांड के सभी लोको की यात्रा। स्वामी अमर द्वारा रचित। खोपड़ी आउट हो जाती है।

सर बुक की pdf बना लीजिए

इतना समय नही और न शौक़।

नही उनके लेख नही है। यह सब मेरे लेख है।

माथे पर भी बोहोत खुजली होती है अब तो‬‬

आप यह सब खुद करते है या दीक्षा ली है।

आज बंगलोर से 100 किमी दूर सिद्धार बेट्टा यानी सिद्ध पहाड़ी जो करीबन 3 किमी चढाई और उबड़ खाबड़ पत्थर का मार्ग है । उस पर जाने का सौभाग्य हो गया। कुछ डर रहा था। 110 किलो भार 58 पार की उम्र। पर देवी जी का नाम लेते हुए सकुशल वापिस।

कहते है इस पहाडी से 700 सन्तो ने निर्वाण प्राप्त किया।

आपको इस लेख में सब चक्रो का वर्णन मिल जाएगा।

http://freedhyan.blogspot.com/2018/04/blog-post_2.html?m=0

आत्मज्ञान क्या है? बुद्धि में जगत के मिथ्यात्व का दृढ़ निश्चय हो जाना ही आत्मज्ञान है।

ध्यान दें, विचार में बड़ा बल है, जैसे आपका देखा गया स्वप्न, आपके ही विचारों से निर्मित है, आपका वर्तमान में देखा जा रहा जाग्रत रूपी स्वप्न भी आपके विचारों से ही निर्मित है। आपका विचार बदलते ही जैसे स्वप्न बदल जाता है, ऐसे ही कोई विचार आप दृढ़ता से पकड़ लें तो आपका जाग्रत भी, बदल जाएगा।

जगत के विचार ने जगत में पहुँचा दिया है, जगदीश का विचार जगदीश तक पहुँचा देता है।

देखो, एक कुम्हार मिट्टी से चिलम बना रहा था। उसके मित्र ने देखा तो पूछा कि चिलम क्यों बना रहे हो? कुम्हार बोला कि आजकल लोग नशा बहुत करते हैं, चिलम खूब बिकेगी।

मित्र बोला कि गर्मी का मौसम है, सुराही बनाओ। अब तो सुराही बिकेगी। कुम्हार ने चिलम बनाना छोड़ा, और उसी मिट्टी से सुराही बनाने लगा।

मिट्टी बोली कि तुमने यह परिवर्तन क्यों कर दिया? कुम्भकार बोला कि मेरा विचार बदल गया।

मिट्टी बोली कि तुम्हारा तो विचार ही बदला, पर मेरा तो जीवन ही बदल गया।

अगर मैं चिलम बनती तो मुझमें आग रखी जाती, स्वयं भी जलती औरों को भी जलाती। पर अब सुराही बन गई हूँ तो पानी भरा जाएगा, खुद भी शीतल रहूँगी औरों को भी शीतल करूँगी।

तो जैसे वहाँ मिट्टी तो वही थी, यहाँ आपका जीवन तो वही है। निर्णय आपको करना है कि इसे जगत से जोड़ना है कि जगदीश से जोड़ना है?

http://freedhyan.blogspot.com/2018/07/16.html?m=0

वह करते क्या है। मतलब ध्यान की कौन सी विधि। मेरे विचार से वह विपश्यना तो नही कर रहे।

यदि नही तो मन्त्र कौन सा।

मेरे विचार से वह मात्र ॐ का जाप कर रहे होंगे।

मैं समझता हूँ। उनको विष्णु मन्त्र जाप के ध्यान लगाने से आराम मिल सकता है। यह ठंडा मन्त्र होता है। विष्णु की जगह कृष्ण भी लगा सकते है। वासुदेवाय सबसे ठंडा है।

बेहतर होगा। एक बार वासुदेवाय मन्त्र से mmstm करे। फिर जाप आरम्भ कर ध्यान करे।

सबसे गर्म मन्त्र नवार्ण

फिर काली

फिर रुद्र

फिर महामृत्युंजय

फिर गायत्री

सबसे ठंडा

सरस्वती। वासुदेवाय। कृष्ण।विष्णु।

कारण यह है कि प्रायः लोग गायत्री आरम्भ करते समय अनुष्ठानिक कर्म भी करते है। पर धीरे धीरे यह समाप्त हो जाता है। जो थोड़ी बहुत क्षणिक परेशानियां पैदा कर सकता है। अतः सबसे अच्छा है कि मन्त्र जप सहज और कर्म हो अनुष्ठान नही। तब मन्त्र अपना अनुष्ठानिके रूप न लेकर बैलेंस बढाता है। मन्त्र जप कभी भी किसी को कम नही करना चाहिए बल्कि और बढा कर उसी मन्त्र से कष्ट दूर होने की प्रार्थना समर्पण भाव से करना चाहिए।

उसको बोले अनुष्ठानिक जप न कर 24 घण्टे जप करे।

Mmstm कर ले फिर जप करे। फोटो गायत्री की ले।

नही मैं नही मानता। मन्त्र जप नुकसान करता है। क्या है हर मन्त्र या इष्ट की अलग अलग कार्य करने की फ्रीकेन्सी होती है। इन को एक दूसरे के सहयोग हेतु उपयुक्त होना चाहिए। अब इन्होंने पढा गायत्री फोटो दुर्गा की। जो आसमान हुई। अतः क्षणिक परेशानी। दूसरे यह निश्चित रूप से करन्यास इत्यादि जरूर करते होंगे जो अनुष्ठान ही होता है।

यह सब अनुष्ठानिक क्रियाये है। जैसे जप विन्यास इत्यादि।

1 यदि आप किसी धार्मिक स्थान पर जाते है और अपनी ओर से अनुभव हेतु प्रयास करते है तो एक तरह से उस धार्मिक स्थान को चुनौती देते है कि भाई मुझे अनुभव कराओ।

2 आप अनजाने में गर्व के शिकार होते है कि हम बहुत महान है हमको तो अनुभव होना ही चाहिए।

3 आप अपनी ऊर्जा नष्ट करते है क्योंकि अनुभव हेतु आप संकल्प लेते है। तो आपकी ऊर्जा खर्च करती है।

4 आप एक चित्त में एक नया संस्कार पैदा कर लेते है। क्योकि फिर आप अनुभव पर सोंचने लगते है औरो से चर्चा करते है।

अतः जो स्वतः हो वह होने दो। अपनी तरफ से कोई भी प्रयास गलत है।

अनुभवों में अधिक मत फँसो। इनके लिए एक अवस्था होती है। हमे उनसे ऊपर उठना है। निर्विकल्प होना है।

जय अम्बे। जय गुरुदेव।

बहिन जी डरने का कोई काम नही। कोई चिंता न करे। आप अपना मन्त्र बिना डर के सतत निरन्तर और निर्बाध करती रहे। किसी प्रकार का बन्धन न ले। यदि मन हो तो mmstm करे और मन्त्र जप करती जाए। वैसे आप mmstm कर रही है यह अच्छी बात है। शिव कल्याणकारी है। कुछ न मांगे न बोले बस मन्त्र जप करती जाए।

आपको शुभकामनाये।

जय महाकाल। भक्त हो सम्भाल। बन जा ढाल।।

देखिये किसी भी कार्य मे जल्दबाजी उचित नही। मन्त्र जप से हमारा शरीर धीरे धीरे शुद्ध होता है। जब आपको और बेहतर अनुभव होंगे। और आवश्यक हुआ तो समर्थ गुरु तक पहुचा दूंगा।

तब तक आप न किसी की सुने न करे। बस अपना इष्ट और मन्त्र साथ रखे।

सर एक जने का कहना है क्या भगवान कभी किसी को परेशान करते हैं

कभी नही। सिर्फ हमारे कर्मफल सामने रख देते है। लोग इसको परीक्षा भी कहते है।

ईश सिर्फ शक्ति जो कर्म करने की क्षमता प्रदान करती है। बाकी हम अपने कर्मो को भोगते है।

हा दैवीय शक्तियां हमको अनुष्ठानिक फल और मनवांक्षित प्रदान कर सकती है।

ईश का अंतिम स्वरूप निराकार निर्गुण ही है। पर मनुष्य ने अपनी शक्तियों से उसे विभिन्न रूप में आने को बाध्य कर रखा है। मनुष्य बेहद शक्तिशाली होता है। पर वह अपनी शक्तियों से अनजान रहता है।

हम इसी साकार के द्वारा निराकार तक जा सकते है। द्वैत से अद्वैत। सगुण से निर्गुण तक जा सकते है।

प्रश्न पूछे। सब नए ही होते है। जब जागो तब ही सवेरा।

जी।

ताराचंद जी बेहतर है आप कुल देवी को आराध्य बनाये। यू तो सब एक है पर एक स्तर के बाद। चुकी कुल देवी पहले से पूजित होती है अतः वह जल्दी सिद्ध होती है।

आप mmstm करे। अपनी कुल देवी के मन्त्र से। फिर बताये।

ममता जी यह ऊर्जा है जो मन्त्र जप से बढ़ती है। आप घबराए नही। कभी कभी चंदन का टीका इत्यादि लगा लिया करे। डरे नही करती रहे।

आप ॐ का जाप न करे।

शिव का करे।

ॐ का बिलकुल नही।

मन्त्र के साथ ॐ ठीक है। अकेले नही।

मत जाए ॐ से। कुछ लगा ले आगे।

मात्र ॐ का जाप ग्रहस्थ्य को नही करना चाहिए। यह तीव्र वैराग्य पैदा करता है जो परिवार में बाधक है।

ॐ सन्यासी ब्रम्हचारी या अकेले को करना चाहिए।

Ok sir लेकिन प्राणायाम में भी ना करें

यह कर सकते है। कुछ बार  लगातार नही।

मतलब निरन्तर नही। अब उद्गीध भृमरी में तो करना ही पड़ता है।

भस्त्रिका, कपालभाति,बाहय,अनुलोम विलोम, भ्रामरी, उद्घगीत, ध्यान। ये  हम करते हैं

करते रहे। बस ॐ नही।

गुरुदेव मैं जब भी पूजा पर बैठता हूँ तो बार -बार जम्हाईयां आती हैं कृपया मार्गदर्शन करें

होता है। चलेगा। ध्यान करते करते सो जाएं।


http://freedhyan.blogspot.com/2018/05/blog-post_3.html?m=0

क्यो खतरनाक है यू ट्यूब की साधनाये।


मेरे पास कुछ ऐसे लोग व्हाट्सएप ग्रुप और व्यक्तिगत भी आते है जो यू ट्यूब को देखकर चक्र साधना, कुण्डलनी जागरण, या क्रिया योग या अन्य कुछ आरंभ करते है। कुछ दिनों बाद अधिकतर लोग आज्ञा चक्र या कनपटी पर तीव्र दर्द, कमर में दर्द, अत्याधिक पसीना, खुजली, दाने इत्यादि की शिकायत करते है। कोई कोई तो अनुभव से भयभीत होकर सलाह मागने लगता है।

चलिए आज इस पर चर्चा की जाए। मेरे खुद के अनुभवों से जो सार निकलता है उस पर विचार रखता हूँ


परमपिता परमेश्वर की कृपा से इस संसार में हर जीव की उत्पत्ति बीज के द्वारा ही होती है चाहे वह पेड़-पौधे हो, कीडे – मकोडे, जानवर या फिर मनुष्य योनी। चित्त में भी कर्मफल बीज के रूप संचित होते हैं। यानी बीज को जीवन की उत्पत्ति का कारक माना गया है। बीज मंत्र भी कुछ इस तरह ही कार्य करते है। हिन्दू धरम में सभी देवी-देवताओं के सम्पूर्ण मन्त्रों के प्रतिनिधित्व करने वाले शब्द को बीज मंत्र कहा गया है।


वस्तुतः बीजमंत्रों के अक्षर उनकी गूढ़ शक्तियों के संकेत होते हैं। इनमें से प्रत्येक की स्वतंत्र एवं दिव्य शक्ति होती है। और यह समग्र शक्ति मिलकर समवेत रूप में किसी एक देवता के स्वरूप का संकेत देती है। जैसे बरगद के बीज को बोने और सींचने के बाद वह वट वृक्ष के रूप में प्रकट हो जाता है, उसी प्रकार बीजमंत्र भी जप एवं अनुष्ठान के बाद अपने देवता का साक्षात्कार करा देता है।


अब आप कुछ समझे होंगे। वास्तव में ध्यान चाहे वह कोई भी विधि हो। त्राटक, विपश्यना, शब्द, नाद, स्पर्श योग या मन्त्र जप या और कुछ। इनके द्वारा हमारी ऊर्जा बढ़ती है। आप जानते है शक्ति मतलब ऊर्जा। अब होता यह है  यदि हमारे शरीर को इस प्रकार की ऊर्जा सहने की आदत नही होती तो हमको रोग या शारीरिक कष्ट हो सकते है।


आप जानते है ऊर्जा मतलब hn h is plank constant n is frequency. इस कारण विभिन्न विधियों और मन्त्रो के अलग अलग ऊर्जा के आयाम अलग आवृत्तियों के कारण हो जाते है।

उदाहरण आपने किसी विशेष चक्र पर उसके बीज मंत्र से ध्यान किया। उस ऊर्जायित आयाम के कारण चक्र के बीज मंत्र उद्देलित हो गए। अब चक्र की एक विशिष्ट ऊर्जा निकली। उस चक्र के ऊपर नीचे का चक्र तो जागृत नही तो यह ऊर्जा कहा से निकलेगी। रास्ता न मिलने पर यह रोग पैदा कर सकता है जो असाध्य भी हो सकता है।

यदि आपके चक्र कुण्डलनी जागरण के पश्चात मूलाधार को भेदकर धीरे धीरे ऊपर के चक्रो में आते है तो यह ऊर्जा नीचे के चक्रो से निकल जाती है और शरीर मे रोग नही होता।

अब यदि बिना कुण्डलनी जगे चक्रो के बीज मंत्र उर्जित हो गए तो भगवान मालिक।


वही समर्थ गुरु अपनी ऊर्जा से शिष्य की अधिक ऊर्जा को नियंत्रित कर सकता है।

 अब मैं लीजिए आपने त्राटक किया वह भी बिंदु या रंग और जो निराकार है। तो आपके आज्ञा चक्र की ऊर्जा बढ़ी। यदि वह बाहर नही निकल पाई तो वह आपके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को प्रभावित कर सकती है। ये न्यूरॉन्स बहुत कोमल और याददाश्त को गुत्थियों में संग्रहित करते है। इस कारण आपका मस्तिष्क संतुलन बिगड़ सकता है। आप जिद्दी या कुछ हद तक पागल भी हो सकते है।

इस सबका एक ही उपचार है कि प्रणायाम के द्वारा अपनी अतिरिक्त ऊर्जा को श्वास से बाहर निकाले और आसनों द्वारा शरीर मजबूत करे।

यदि यह नही कर सकते हो किसी साकार मन्त्र का जप करे। यह जाप सुनार के हथौड़े की चोट कर आपके शरीर और चक्रो को कम्पन देकर उन्हें ऊर्जा सहने लायक बनाता है।


समस्या वहाँ अधिक आती है जो निराकार विधियों से ध्यान करता है। क्योंकि निराकार आकार रहित होता है तो आपकी ऊर्जा जो ब्रह्म शक्ति का रुप है वह आपको किस रूप में किस प्रकार सहायता करेगी।

वही साकार मन्त्र जप और विधियाँ उस ब्रह्म शक्ति को उस मन्त्र के सगुण रूप में आने को विवश हो जाती है। सहायता करने के अतिरिक्त वह उस साकार और मन्त्र संकल्पना का रूप धारण कर दर्शन देकर अतिरिक्त ऊर्जा को शारीरिक ऊर्जा में समाहित कर देती है।

आप देखे माउंट आबू में मस्तिष्क रोगी अधिकतर पाए है। जो नही वह किसी हद तक झक्की हो जाते है।

कारण वहाँ जो है वह कुण्डलनी शक्ति मानते नहीं। गुरु मानते नही। लाल प्रकाश जो मूलाधार का रंग है उस प्रकाश पर निराकार त्राटक करवाते है।


लिखने को हर विधि पर हैं पर संक्षेप में आप कोई भी विधि यदि साकार सगुण करते है तो खतरा कम। दूसरे सबसे सरल सहज आसान है मन्त्र जप। नाम जप। आपको जो इष्ट अच्छा लगे उसका मन्त्र जप करे। सघन सतत निरन्तर। यह साकार मन्त्र आपको आपके गुरू से लेकर निराकार तक की यात्राओं के अतिरिक्त ब्रह्म ज्ञान भी दे जाएगा। बस अपने इष्ट को समर्पित होने का प्रयास करो।

सगुण ही पूर्ण ज्ञान दे सकता है। निर्गुण को सगुण का कोई ज्ञान नही पर सगुण को निर्गुण खुद मिल जाता है।

भाई आप दीक्षित है। आपके गुरु ही बता सकते है

प्रभु जी ये चितिशक्ति विलास पुस्तक जोकि स्वामी मुक्तानंद जी महाराज द्वारा लिखित है उसका एक भाग है, मुझे अच्छा लगा तो डाला, मुझे किसी प्रकार का कोई संसय नहीं है ना गुरु पर, ना गुरु मंत्र पर, अपितु ये सब मुझपर संसय कर सकते है जो जिम्मेवारी  गुरुदेव मुझसे आपेक्षित करते है वो हो सकती है या नहीं, प्रभु जी, मेरी कोई कामना नहीं बस चतुर को पूर्ण समर्पण करके अपना किरदार निभाना है

हाँ लेकिन कुछ मार्गदर्शन आप भी तो कर सकते हैं।

ठीक है भाई। आप प्रणायाम करे। ताकि आपकी अतिरिक्त ऊर्जा बाहर निकले।

प्राणायाम कर रहा हू

कौन से

श्वास अंदर खींचकर जितना हो सकता है उतनी देर तक अंदर रोंके रहता हू और ध्यान आज्ञा चक्र पर रहता है। जब तक श्वास रोंके रहता हूँ उसी बीच ध्यान के साथ गुरूमंत्र जप मन ही मन करता हू फिर श्वास बाहर निकाला  और बाहर ही रोके रखता हू । बाहर रोंके रहने के समय भी गुरूमंत्र जप व ध्यान आज्ञा चक्र पर। और फिर पुन: वैसे ही

इसके अलावा भस्तिका और कपाल भाति भी करो।

इससे ध्यान और बहुत गहरा होता जाता है। 5 प्राणायाम पर श्वास दम घुटने जैसे लगता है और 7 पर बेहोशी जैसी हालत और 11 पर पहुचते पहुचते बाहर के शब्द सुनायी देना बंद और गजब की शांति आने लगती है ,मन प्रफुल्लित होने लगता है । ऐसा मन करता है कि इससे बाहर ही न निकलू लेकिन निकलना पड़ता है

तुम वास्तव में क्रिया योग साधना ही करते हो।

इसके बारे मे मुझे नही मालूम । कृपया विस्तार से बतायें

यह क्रिया योग 15 से अधिक एक बार मे नही करते है।

मै 21 बार तक किया हू

21 बार मे मुझे खुद का लगभग न के बराबर पता था। गिनती गिन रहा था इसलिए सिर्फ गिनती याद थी

जैसा प्राणायाम से होता था वैसा गुरूमंत्र जप से सहज ही हो जाता था कभी कभी लेकिन ये सिर्फ कभी कभी होता था। महीने 3-4 दिन बस। अपने आप होता था। मै चाहता था कि प्रतिदिन ऐसा ध्यान लगे लेकिन नही लगता था सिर्फ कभी कभी

तुमको जो दीक्षा मिली वह छोड़कर यह कर रहेहो । यह उचित नही। गुरु आदेश मानो।

प्राणायाम मै अपने मन से करता था।

गुरू आदेश है कि अपना मंत्र किसी भी हालत मे न छोड़ो और सतत जप करते रहो

सरजी भस्तिका और कपालभाति के बारे मे बतायें कैसे करना है?

यहाँ जो बात बतायी जाती है या या जो आप बताते हैं काफी अच्छा होता है। समझाने का तरीका भी अच्छा होता है

नही यह उचित नही। मैने विधिवत नही सीखा है। मुझे सिर्फ प्रभु नाम लेना ही आता है। शरीर मोटा।

ऐसा करो सुबह रामदेव का प्रसारण देखो।

नही। मुझे बस जानकारी है।

तब बेहतर है नेट पर देख लो। लिखना मुश्किल है।

कट पेस्ट नही। सिर्फ अनुभव या जिज्ञासा। वह भी नही जो नेट से है।

मित्र किताबी ज्ञान बहुत भरा पड़ा है इससे बचो। बेहतर है न दो।

वैसे तो ये जरूरी नहीं है बताना। लेकिन मेरे लिए हर्ष का विषय है इसलिए ग्रुप में बता रहा हूँ।

आज गुरुदेव की कृपा से रायसेन आश्रम में पहुच गया।

इसे गुरुदेव की कृपा ही कहूँगा उन्होंने बुला लिया।


महाराज जी से मिला महाराज जी ने आशीर्वाद के रूप में पुस्तक प्रदान की।

हृदय से धन्यवाद् विपुलजी।

पहले बताओ। दीक्षा का क्या हुआ।

आप योग नही योगासन सिखाती है। अच्छा है लोग स्वस्थ्य रहेगे।

क्या बाबा रामदेवजी योगी हैं???

नहीं तो वह क्या हैं???

मित्र विवादास्पद प्रश्न न करे। मैं तो उनको एक सन्त महापुरुष से ऊपर नही मानता। क्योकि जब वह मुह खोलते हैं तो मालूम पड़ता है कि उन्हें योग नही है। क्षमा करें मित्र।

जिज्ञासा है,जानने की

मित्र निवेदन है। कई बार कितना लिखू। आप ब्लाग लिंक पर लेख देख ले। 343  लेख  कविताएं पोस्ट है।

Freedhyan.blogspot.com

श्री मन यह सब नेट पर गूगल गुरु के पास है।

अनुभव जनित लेख देखे।

यही देख ले।

क्यो क्या हुआ।

नहीं कुछ नहीं बस ऐसे ही पूछ लिया

बैद्धिक विलास के प्रश्न से कुछ न मिलता है। करो आरम्भ करो कुछ तो करो। सबसे सरल मन्त्र जप। सस्ता सुंदर टिकाऊ। जो अच्छा लगे। पहले एक वार mmstm कर लो फिर जुट जाओ मन्त्र जप में। जब ईश शक्ति का अनुभव होगा। तुम्हारी इच्छा होगी। समर्थ गुरु तक पहुचा दूंगा।

सर आपने गुरु जी के पास तो पंहुचा दिया लेकिन अभी दीक्षा नहीं मिली है   इसलिये मैंने प्रसन किया

समाधि खेल नही होता है।

http://freedhyan.blogspot.com/2018/03/normal-0-false-false-false-en-in-x-none_9.html?m=0

अभी महाराज जी से मिला। चर्चा हुयी महाराज जी बोले कुछ साहित्य आपको दे रहा हूँ। आपको समझ आ जायेगी कई बात। गुरुदेव की जैसी इक्षा होगी वैसा हो जाएगा समय आने पर। जब भी समय मिले आना। हमारे यहाँ नवरात्री में भी कार्यक्रम होगा आप आएं।

महाराज जी ने बताया अमलनेर में आपसे मिले थे। सन्यास दीक्षा के समय।

महाराज जी ने सोपान और चित्त लीला दी है।

बिल्कुल। यह मरने वाले की क्षमता पर निर्भर है।

ऐसा मेरे परिवार मे हो रहा है और परेशान कर रहा है एक वर्ष से अधिक हो गया।


इससे छुटकारा पाने का कोई उपाय बतायें

आप दुर्गा सप्तशती का पाठ करवाये। पूरे घर को देवी कवच कुंडल और कीलक का पाठ करने को बोले। बहन से सामने नवार्ण मन्त्र वैखरी में 11 माला करे। कोई दूसरा गायत्री मंत्र पढ़कर पूरे घर मे घूमता रहे।

आप घर मे महापुरूषो की सिद्ध सन्तो की फोटो लगवाए ।

फोटो नैय्यर जी दे देंगे  स्वामी शिवोम तीर्थ जी महाराज और स्वामी विष्णु तीर्थ जी महाराज की। हर कमरे में लगवा दे।

सर नवार्ण मंत्र क्या है प्लीज आप बताएंगे

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै*

मित्र यह निंदनीय और बेहद गलत दुष्टतापूरन कार्य है। पर ग्रुप में डालकर हम मन मे ग्रुप में कलुषता क्यो लाये। फिर इसमें राजनीति भी छुपी है। जिस प्रकार चिढ़ाने के लिए राजनीतिक उद्देश्य हेतु केरल में गौ हत्या और खाया गया। वहाँ की तबाही एक दण्ड है। उसी भांति यह भी भुगतेंगे।

पर ग्रुप में कोई जघन्य कृत न पोस्ट करे।

देखो यह कलियुग है और यकीन मानो कोई अन्य शक्तियां इंसान की रक्षा कर रही है। जब कलियुग पक जाएगा। तब नव युग आएगा। यह कलियुग का अंतिम चरण है। वर्ष 2262 में सृष्टि का विनाश होना है। यह उसकी तैयारी है।

सर मतलब 244 साल बचे है अभी तो फिर तो खुलकर जियो।

नही तुमको मना करने का पूरा अधिकार है।

कोई हमारी प्रशंसा करता है तो वह बहुत अच्छा है कोई हमारी बुराई करता है तो वह बहुत बुरा व्यक्ति है, लोगों द्वारा प्रशंसा सुनकर सुख बुराई सुनकर दुख व अच्छा और बुरा लगने लगता है। यानि अच्छे बुरे की डोर हमने ही लोगों के हाथ में दे रखी है। यही डोर यदि हमारे ही हाथ में है तो सुख ही सुख हमारे इर्दगिर्द रहेगा। जय बाबा महाकाल।

जब तक निंदा सुनकर भी बुरा लगना बन्द न होगा। तब तक तुम आधात्मिक मार्ग पर आगे नही बढ़ सकते। अपमान  सहने की क्षमता हमे पूर्ण योगी बनाती है।

कलियुग में यदि प्रभु न पा सके तो कभी न पा सकोगे। बस कुछ ठान लो। थाम लो। प्रभु प्राप्ति की ठानो। राम नाम को थामो। सबसे सुंदर सस्ता टिकाऊ। मन्त्र जप नाम जप। सतत निरन्तर निर्बाध। बिना लालच के और समर्पण की कोशिश।


*वैदिक रक्षा-सूत्र ( रक्षाबंधन)*

 *वैदिक रक्षाबंधन - प्रतिवर्ष श्रावणी-पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्यौहार होता है, इस बार 26 अगस्त 2018 रविवार के दिन है। इस दिन बहनें अपने भाई को रक्षा-सूत्र बांधती हैं । यह रक्षा सूत्र यदि वैदिक रीति से बनाई जाए तो शास्त्रों में उसका बड़ा महत्व है ।*

*वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि*

  *इसके लिए ५ वस्तुओं की आवश्यकता होती है -*

*(१) दूर्वा (घास) (२) अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने ।*

  *इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांध दें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकार वैदिक राखी तैयार हो जाएगी ।*

*इन पांच वस्तुओं का महत्त्व*

➡ *(१) दूर्वा - जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसी प्रकार मेरे भाई का वंश और उसमें  सदगुणों का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बढ़ता जाए । दूर्वा गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए ।*

➡ *(२) अक्षत - हमारी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत रहे ।*

➡ *(३) केसर - केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह तेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो ।*

➡ *(४) चन्दन - चन्दन की प्रकृति तेज होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकार उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो । साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे ।*

➡ *(५) सरसों के दाने - सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें ।*

 *इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम गुरुदेव के श्री-चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे ।*

 *महाभारत में यह रक्षा सूत्र माता कुंती ने अपने पोते अभिमन्यु को बाँधी थी । जब तक यह धागा अभिमन्यु के हाथ में था तब तक उसकी रक्षा हुई, धागा टूटने पर अभिमन्यु की मृत्यु हुई ।*

 *इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार बांधते हैं हम पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहित वर्ष भर सुखी रहते हैं ।*

 *रक्षा सूत्र बांधते समय ये श्लोक बोलें*

 *येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः ।*

*तेन त्वाम रक्ष बध्नामि, रक्षे माचल माचल: ।*

हर समय। मॉनसिक तो टॉयलेट में भी।

हथेली पर सरसो नही जमती।

पहला गुण सब्र है।

शुरुआत में दो को बताई। वह भयंकर क्रिया से ग्रस्त हो गए।

चलो मैसूर के चामुंडेश्वरी मन्दिर भी हो लिए। जय जगदम्बे।

यह मंदिर मैसूर स्टेशन से कुछ किमी दूर पहाड़ी पर है। म्हैसूर से बना मैसूर। यानी महिषासुर मर्दिनी का मंदिर है। कहते है महिषासुर मैसूर का राजा था।

अधिक पशु हत्याओं से आती है आपदाएं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के तीन वैज्ञानिकों प्रोफेसर मदन मोहन बजाज , प्रोफेसर विजयराज और डॉक्टर इब्राहिम ने मिलकर 1995 में रूस में एक रिसर्च present कि जिसमे उन्होंने Prove किया कि भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आने का कारण है , Einstein Pain waves | इसे bis theory नाम भी दिया गया है |

Bhukamp kyu ata h https://youtu.be/6oyurlLeUJY

ये Einstein Pain Waves तब emit होती है जब भी किसी पशु को मारा जाता है |

तब उसकी pain से भी एक wave निकलती है |


इन वैज्ञानिकों के अनुसार जब बहुत अधिक मात्रा में पशुओं को मारा जाता है तब ये waves और ज्यादा intensify हो जाती है |

जिसके कारण ही भूकंप आता है |

लेकिन इन waves का भूकंप आने के पीछे कारण क्या है इसे हम आगे देखेंगे |

सबसे पहले इस Einstein pain wave थ्योरी के बारे में कुछ facts देख लेते हैं –

इस Theory के अनुसार एक बूचड़खाने से निकलने वाली pain wave कि energy लगभग 1040 KW तक होती है |Einstein Pain wave ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचती है |Pro. मदन मोहन बजाज ने इस theory को mathematically भी prove किया है |इन्ही waves के कारण earth crust में radon गैस release होती है |

Einstein ने कभी pain waves के बारे में बात नहीं की लेकिन शायद इस विषय में वे कुछ कार्य करना चाहते थे , सम्भव है इसलिए उनके सम्मान में इसका नाम Einstein pain wave रखा गया हो |

जैसा कि हमने बताया कि भूकंप का कारण Convective Currents है |

इन वैज्ञानिकों के अनुसार Radon गैस रिलीज होने के कारण ही Tectonic Plates टराती हैं |

इसलिए शायद यह सम्भव है कि radon गैस के release होने से इन प्लेट में फिसलन कि गति बढ़ जाती हो , जिस से उनमे टक्कर भी बढ़ जाती है |

कुछ चीन और जापान के वैज्ञानिकों ने रेडॉन गैस के release होने के कारण भूकंप आने को Experimentally भी Verify किया है |

ऐसे में हम मान सकते हैं इन वैज्ञानिकों कि रिसर्च सही दिशा में हो सकती है |


माना जाता है कि ईसा से 2000 से 7000 वर्ष पहले सहारा रेगिस्तान में न सिर्फ पशु , पक्षी और जानवर रहते थे बल्कि वहां इंसानों कि बस्तियां भी थी , यहाँ के लोगो में शिकार खेलने कि प्रवृत्ति ज्यादा थी , और कहा जाता है कि उस समय वहां शिकार खेलना बहुत अधिक बढ़ गया था , सम्भव है कि इस कारण आज यह जगह एक रेगिस्तान में तब्दील हो गयी होयह बात सब जानते हैं कि नेपाल में आये भूकंप से पहले वहां पर एक बहुत बड़ा festival होता था जिसमे बहुत सरे भैसों कि बलि दी जाती थी , कुछ लोगों के द्वारा इसे दुनिया में सबसे बड़ा पशु बलि का festival भी कहा जाया है , , इसका नाम था गढ़ीमाई festival , सम्भव है कि इसके कारण ही नेपाल में भूकंप आया हो |कहा जाता है कि मुगलों के भारत में आने से पहले देश में कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा नहीं आयी , जबकि पिछले 300 सालों में ऐसी आपदाएं लगातार बढ़ी है |


इस रिसर्च के अनुसार यदि माना जाये तब भूकंप का कारण अत्यधिक मात्रा में पशुओं कि हत्या है जिस से भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आती है |

हमने आपको इस बारे में अपनी जानकारी के अनुसार बताया |

हालाँकि इस बारे में अभी और रिसर्च करने कि जरूरत है |


यहाँ पर एक प्रश्न भी उठ सकता है कि यदि भूकंप और प्राकृतिक आपदाएं जानवरो कि बेरहमी से हत्या करने के कारण आती है , यानि उनके दर्द से निकलने वाली pain wave के कारण आती है तब अनेकों मांसाहारी जानवर , हमेशा से शाकाहारी जानवरों को मारकर खाते आये हैं , तब इस हिसाब से पहले भी भूकंप इसी तरह आने चाहिए थे ? लेकिन पहले भूकंप आदि नहीं आते थे |


प्रकृति में हमेशा संतुलन बना रहता है , जैसे हमारे शरीर में कई कोशिकाएं नष्ट होती रहती है और कई कोशिकाएं नयी बनती रहती है , यदि नष्ट होने वाली अधिक बढ़ जाये तो हमारा शरीर पहले ही बूढ़ा दिखने लग जायेगा , इसी तरह जानवरों में यह होने वाला व्यवहार पहले भी होता था और होता रहेगा , लेकिन आज यह व्यवहार हम इंसानों ने भी अपनाकर इसे बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है जिस से संतुलन बिगड़ता है और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती है |


प्रोफेसर मदन मोहन बजाज ने अपनी रिसर्च से related चार पुस्तके लिखी hai.


सभी लोग इस पोस्ट को यदि फेसबुक इत्यादि पर शेयर कर दें तो लोगों को इस सत्य का पता चलेगा। ये सत्य लगभग न के बराबर लोगों को पता है।

अधिक पशु हत्याओं से आती है आपदाएं।

ये मुझे किसी ने भेजा था।

मैने भी अापका नाम लिखकर सभी जगह शेयर किया है

मुन्नी बदनाम हुई केवल इस कारण से। मैं अपना नाम खुद लिख देता हूँ।

चीन तो सबसे अधिक प्रभावित होता है। वहाँ तो अक्सर बाढ़ आ जाती है।


MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
ब्लाग :  https://freedhyan.blogspot.com/


इस ब्लाग पर प्रकाशित साम्रगी अधिकतर इंटरनेट के विभिन्न स्रोतों से साझा किये गये हैं। अथवा मेरे ग्रुप “आत्म अवलोकन और योग” से लिये गये हैं। जो सिर्फ़ सामाजिक बदलाव के चिन्तन हेतु ही हैं। कुलेखन साम्रगी लेखक के निजी अनुभव और विचार हैं। अतः किसी की व्यक्तिगत/धार्मिक भावना को आहत करना, विद्वेष फ़ैलाना हमारा उद्देश्य नहीं है। इसलिये किसी भी पाठक को कोई साम्रगी आपत्तिजनक लगे तो कृपया उसी लेख पर टिप्पणी करें। आपत्ति उचित होने पर साम्रगी सुधार/हटा दिया जायेगा।

Tuesday, September 18, 2018

समाधि का सम्पूर्ण विवरण



समाधि का सम्पूर्ण विवरण 


सनातन पुत्र देवीदास विपुल "खोजी" 


 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल वैज्ञनिक ISSN 2456-4818
 वेब:  vipkavi.info  
वेब चैनलvipkavi      फेस बुक:   vipul luckhnavi “bullet"




आजकल कई ग्रुप में में एक विषय को सनसनी अथवा रहस्य के तौर पर समाज में प्रसारित किया जाता है।  वह विषय है-समाधि! वास्तव में, समाधि कोई रहस्य नहीं, एक अत्यंत आलौकिक या पारलौकिक अवस्था है जो देहातीत है, मन-बुद्धि से अतीत है, जिसकी तुलना में मानव की विचार शक्ति और विज्ञान के संसाधन नितांत बौने हैं। वास्तव में समाधि एक आंतरिक अनूभुति है। इसके मापन का कोई यंत्र या स्केल तो है नहीं। अत: ज्ञानियों ने अपनी अपनी बुद्धि से तमाम बातें कई नाम के साथ बताई हैं। मेरे विचार से आम जगत के लिये यह कुछ ऐसे ही है जैसे बौरे गांव ऊंट आना। एक बौद्धिक प्रलाप और प्रमाद से अधिक कुछ नहीं। फिर भी चलिये कुछ बात करने का प्रयास किया जाये। 


योग शास्त्र में कुंडलनी अध्याय के अंतर्गत हम यही कह सकते हैं कि जब मूलाधार चक्र में सोई कुण्डलनी शक्ति जाग कर सहस्त्रसार में पहुंचती है तब समाधि लगती है। वास्तव में यही वास्तविक समाधि है। यहां कुण्डलनी पर मैं कोई चर्चा नही करता हूं। आप मेरे ब्लाग पर लेख पढ लें अथवा गूगल गुरू की शरण में चले जायें। 


ध्यान की सघन अवस्थाओं को अलग लोगों ने अलग अलग नाम दियें हैं। वैसे मेरे अनुभव और विचार से ध्यान की भी छह अवस्थायें या विमायें होती हैं। जिनमें आपको देहाभान रहता है। सातंवे स्तर से समाधि आरम्भ होती हैं। जहां पर देहाभान समाप्त हो जाता है। यह भी अन्य पांच विमाओं तक रहता है। यानी ध्यान और समाधि की कुल 11 विमायें। हर एक को अलग नाम भी दे सकते हैं। यहां विमायें वह हैं जहां समय की गति बदलती जाती है। मतलब आपका ध्यान अलग अलग समय की गतियों में विचरण करने लगता है। बिना गुरू की कृपा के आप अधिकतम 7 वें स्तर पर ही जा सकते हैं। हो सकता है आपके प्राण वहां फंस भी जायें। आप न मर सकें और न जी सकें।  


'समाधि' शब्द का संधि विच्छेद किया जाए, तो 'समाधि' = 'सम' + ''अधि' अर्थात् समान रूप से, पूरी निरंतरता से, परम चेतना में अधिष्ठित हो जाना- यही समाधि है। यह बात कई जगह लिखी मिल जायेगी। परंतु जो मैंनें समझा वह मैं बताना चाहूंगा। 


विज्ञान के अनुसार मेरे विचार से 'समाधि' = ' सम' + ''अधि' अर्थात् जहां समय का अधिष्ठातापन भी समाप्त हो जाये। एक उदाहरण देखें जो लोग ध्यान लगाते हैं तो बताते हैं “मुझे लगा कि मैं मुश्किल से 10 मिनट ही बैठा होऊंगा पर आंख खोली तो देखा दो घंटे हो गये थे”। चलिये आप जब सोते हैं तो आपका सपना मुश्किल से दस पंद्रह मिनट का होता है पर घडी मे चार घंटे बीत जाते हैं। क्यों?? कुछ इसी तरह समाधि को समझें। मेरे विचार से हर व्यक्ति के लिये समाधि हेतु समय की गति भिन्न ही होती है। क्यों?? 


कारण यह है जिस स्तर पर देहाभान समाप्त हो और आपके मन बुद्धि की गति, (जगत चेतना की नहीं, उस जगत के आयाम की बात है) समय की गति बराबर हो जाती है तो सापेक्षता के नियम के अनुसार स्थिर हो जाती है। वह समाधि की अवस्था होती है। समय की गति और मन बुद्धि की गति को बराबर होने हेतु घडी में नापनेवाला जो समय लगता है वह हर व्यक्ति के लिये अलग अलग होता है। अभ्यास के साथ यह समय कम होता जाता है और आप समाधि के निकट तुरन्त पहुंच सकते हैं। कुछ यूं समझे ध्यान की छह अवस्थायें आपको देहाभान रखती हैं। नये आदमी के लिये यहां तक पहुंचनें मे बहुत समय लगता है पर अभ्यास हो तो बैठते ही आप ध्यान के छठे स्तर को पार कर समाधि के पहले और कुल सांतवे स्तर पर पहुंच जाते हैं। अब इसके आगे आप किस अन्य सत्र तक पहुंचे वो बताना कठिन हो जाता है क्योकिं जब देहाभान समाप्त तो आपकी मन और बुद्धि स्थिर अर्थात इस जगत के लिये मर गई। तो उस जगत के अनुभव कैसे याद रहेंगे। उसको भी कुछ हद तक याद रखने का तरीका पातांजलि महाराज ने बताया कि धारणा के साथ ध्यान में जाओ। इस तरह से देहाभान समाप्त होने के बाद भी अपनी इस जगत की मन बुद्धि दृष्टा भाव से घटना से अलग होकर सक्रिय रहती है। सारे भ्रमण और अनुभव वो कर के मन की स्मृति में भेज कर समाप्त होकर समाधि के उस स्तर में विलीन हो जाती है। कुछ इसी विधि से मैंनें समाधि को जानना चाहा तो पाया कि आप ध्यान में बैठे तो छह स्तर यानि द्वार तक आपको देह का भान रहेगा। फिर सातवे द्वार से सुरंगो की तरह जैसे दीमक की मोटी बाम्बीनुमा सुरंगे जो क्रमश: सातवे द्वार से 11 द्वार तक जाती हैं। आपस में जुडी हैं। तो मुझे समझाया गया यह समाधि की अवस्थायें जो अलग अलग अनुभव देंगी। पर याद न रहेगा। इनमें सिर्फ गुरू शक्ति के सहारे ही जा सकते हैं या साकार देव की आराधना से। इनमें फंसने का भी डर रहता है। अत: मैं डर गया था सिर्फ सातवें द्वार से इनका द्वार देखा पर घुसने की हिम्मत न कर सका। उसके बाद यह अनुभव घटना दोबारा नहीं हुई। मतलब मैं सातवें द्वार तक ही जा पाता हूं शायद। इसके कभी गया भी होऊंगा तो याद नहीं। क्योकि बाद में धारणा के साथ ध्यान नहीं करता हूं।

अब विज्ञानी आइंसटाइन की समय की व्याख्या समझनी पडेगी। तब यह समझ में आयेगा। समय का समयकाल भी गति और गुरुत्वाकर्षण यानी बडा वाला जी और छोटावाला जी के अनुसार बदल जाता है। जैसे 24 घंटे की साधना के बराबर 1 सेकेंड की समाधि का अनुभव। इसी भांति समाधि के भी 11 द्वार यानी समय का काल और गति की विमाओं में समय की गति क्या होगी। (यह फिजिक्स वाली नही बल्कि प्याज की परतें समझो)  आप खुद गणना करे तो जो पुराणो में वर्णित है वही पायेगे। भौतिक शास्त्री इस पर कृपया गणना कर बताये।

ग्रंथों के अनुसार समाधि वह उत्कृष्‍टम या उच्चतम पड़ाव है, जहाँ चेतना स्वयं को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करती है; जहाँ व्यष्टि और समष्टि का भेद तिरोहित हो जाता है। यह विद्याओं की विद्या- 'राजविद्या' है। गोपनीय से भी गोपनीय- 'राजगुह्यं' अवस्था है।

समाधिस्थ देह की क्या स्थिति रहती है? जहाँ स्वरूप शून्यवत प्रतीत हो, उसे समाधि कहते हैं। समाधि की यह अवस्था एक मृत देह के समान ही दृष्टिगोचर होती है। ...इस स्थिति को जब वैज्ञानिक यंत्रों द्वारा मापने का प्रयास किया जाता है, तो सभी परिणाम शून्य ही निकालते हैं। धमनियों की गति शून्य! श्‍वास-क्रिया शून्यवत्! हृदय-क्रिया-सीधी रेखा! मस्तिषकीय क्रियायेँ सीधी रेखा! इन समस्त परिणामों के आधार पर आधुनिक विज्ञान एक 'समाधिस्थ देह' को 'मृत' तथा 'समाधि' को मृत्यु (clinical death) करार दे देता है।

अब आप यह सोंचे ध्यान वाली अवस्था इस जगत में हो जाये तो?? मतलब जो स्थिति आपकी मन बुद्धि की आंख बंद करके होती है वो ही आंख खोल कर हो जाये तो यह हो जायेगी जाग्रत समाधि। कोई कोई भाव समाधि बोलता है। यह कुछ समय से लेकर लम्बे समय तक हो सकती है। जैसे बन्दा बैरागी महाराज का सर का ऊपरी फलक औरंगजेब ने कटवा दिया था उस वक्त वह भाव समाधि मतलब आंख खोलकर भी देहाभान में न थे। यह समाधि की उच्चतम अवस्था कही जायेगी। यही परमानेंट समाधि है। सहज समाधि है। आंख  खुली पर देहाभान नहीं। यही स्थिति स्थितिप्रज्ञ कहलाती है। और उस वक्त बुद्धि यदि आत्मभाव में स्थिर होती है तो स्थिर बुद्धि कहलाती है। यही योगी के लक्षण हैं। जो भगवान श्री कृष्ण ने बतायी। 


समाधि निष्क्लेश होनी चाहिए और वह भी फिर निरंतर, उतरे नहीं उसका नाम समाधि और उतर जाए उसका नाम उपाधि! छाया में बैठने के बाद धूप में आए तब बेचैनी होती है, जब आधि, व्याधि और उपाधि में भी समाधि रहे, तब उसका नाम सहज समाधि है। 


भगवान श्री कृष्ण ने भी भागवत गीता में समाधि के बारे में विस्तार से बताया है। योग में समाधि के दो प्रकार बताए गए हैं- सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनंद और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है।
भक्ति सागर में समाधि के 3 प्रकार बताए गए है- 1.भक्ति समाधि, 2.योग समाधि, 3.ज्ञान समाधि।
पुराणों में समाधि के 6 प्रकार बताए गए हैं जिन्हें छह मुक्ति कहा गया है- 1. साष्ट्रि, (ऐश्वर्य), 2. सालोक्य (लोक की प्राप्ति), 3. सारूप (ब्रह्मस्वरूप), 4. सामीप्य, (ब्रह्म के पास), 5. साम्य (ब्रह्म जैसी समानता) 6. लीनता या सायुज्य (ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म हो जाना)।


देहाभिमाने गलिते विज्ञते परमात्मन । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधय: ॥
अर्थात जब साधक को शरीर का भी भान न रहे और परमात्मा का ज्ञान हो जाये ऐसी अवस्था में मन जहाँ जहाँ भी जाएगा वहीं वहीं समाधि है । 


तवेवार्थ मात्र निर्भासं स्वरूप शून्यमिव समाधि । न गंध न रसं रुपं न छ स्पर्श न नि:स्वनम ।
नात्मानं न परस्प छ योगी युक्त: समाधिना ॥
अर्थात जब साधक ध्यान करते करते ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जहां उसे खुद का ध्यान ही न रहे मात्र ध्येय ही शेष रह जाये तो ऐसी स्थिति को समाधि कहते हैं । इसमे ज्ञेय, ज्ञान तथा ज्ञाता का अंतर समाप्त हो जाता है । साधक अणु परमाणुओं की संरचना के पार मुक्त साक्षी आत्मा रह जाता है । यहाँ साधक परम स्थिर तथा परम जाग्रत हो जाता है ।

 
सलिलै सैंधवं यद्धत्साम्भजति योगत: । तथात्मन परस्यं छ योगी युक्त: समाधिना ॥
अर्थात जिस प्रकार यदि कोई नमक का टुकड़ा समुद्र में फेका जाये तो वह समुद्र की गहराई तक जाते जाते समुद्र में ही घुल जाता है तथा अपना अस्तित्व खो बैठता है । इसी प्रकार साधक भी समाधि के माध्यम से परम पिता परमेश्वर में समा जाता है ।

 
भगवान शंकराचार्य जी ने कहा है :
समाहिता ये प्रविलाप्य ब्रह्मं । श्रोतादि चेत: स्वयहं चिदात्मानि ॥
त एव मुक्ता भवपाशबंधे । नित्ये तु पारोक्ष्यकथामिध्यामिन: ॥
अर्थात जो साधक अपनी इंद्रियों के वाह्य प्रवाह को रोक कर, दुनयावी वस्तुओं का मोह छोड़ कर, मन से अहंकार त्याग कर, आत्मा में लीन होकर समाधि को धारण करता है वे साधक संसार के बंधनो से मुक्त होकर, जन्म मरण से मुक्त होकर स्थायी मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं । किन्तु जो केवल आध्यात्मिक बाते तो करते है लेकिन जो ध्यान समाधि का अभ्यास नहीं करते वे कभी भी दुनयावी बंधनो को तोड़कर मुक्ति नही पा सकते है ।

 
समाधि की स्थित को प्राप्त करने वाला साधक रस, गंध, स्पर्श, शब्द, अंधकार, प्रकाश, जन्म, मरण, रूप आदि विषयों के परे हो जाता है । साधक गर्मी - सर्दी, भूख – प्यास, यश – अपयश, सुख – दुख आदि की अनुभूति से परे हो जाता है । ऐसा साधक जन्म मरण से मुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है । समाधि में ध्याता भी नहीं रहता और ध्यान भी नहीं रहता है । ध्येय और ध्याता एकरूप हो जाते हैं I मन की चेतना समाप्त हो जाती है और मन ध्यान में निहित हो जाता है I प्रभु का ध्याता साधक प्रभू रूपी समुद्र में अपने आप को विसर्जित कर मुक्त पा लेता है I समाधि में शारीरिक एवं मानसिक चेतना का अभाव रहता है I आध्यात्मिक चेतना जाग्रत हो जाती है I साधक के वास्तविक स्वरूप का केवल अस्तित्व शेष रहता है I ऐसी अवस्था को तुरिया अवस्था कहते है जो परम चेतना की अवस्था है तथा अनिर्वचनीय है ।

 
कभी कभी साधक को अर्द्ध निंद्रा की स्थिति में ऐसा अनुभव भी हो सकता है जब साधक का मस्तिष्क जागृत अवस्था में हो लेकिन शरीर सोया हुआ हो । इसमे नींद के मुक़ाबले साधक को अधिक स्फूर्ति तथा आराम मिलता है । यह अवस्था लंबी साधना से ही संभव हो पाती है । कुछ लोग ऐसा मानते है कि समाधि पत्थर की तरह जड़ अवस्था है I जबकि साधक का ब्रह्मांडीय जीवन यहीं से शुरू होता है I आत्म-विकास शुरू होता है । साधक की कुंडलनी नाभि चक्र से जाग्रत होकर सुषमना के जरिये मस्तिष्क तक पहुँचती है जिससे सभी चक्र जाग्रत हो जाते हैं ।

 
आनन्दमय कोश में प्रवेश कर जाना भी समाधि की अवस्था कहलाता हैं । समाधि विभिन्न प्रकार की होती हैं। जैसे जड़- समाधि ( काष्ठ समाधि ), ध्यान समाधि, भाव समाधि, सहज समाधि, प्राण समाधि आदि । बेहोशी, नशा तथा क्लोरोफॉर्म इत्यादि सूंघने से प्राप्त समाधि को काष्ठ-समाधि कहा जाता हैं । किसी भावनावश भावनाओं में बहुत डूब जाने से शरीर चेष्टा शून्य हो जाना भाव समाधि है । किसी इष्ट देव आदि के ध्यान में इतना डूब जाए कि साधक को निराकार अद्भुद अदृश्य ताकते साक्षात दिखाई देने लगे, ऐसा प्रतीत होने लगे कि बंद आँखों से स्पष्ट प्रतिमा नज़र आ रही है इसे ध्यान समाधि कहते हैं । ब्रह्मरन्ध्र में प्राणों को एकाग्र करना प्राण-समाधि कहलाता है । साधक स्वयं को ब्रह्म में लीन होने जैसी अवस्था में बोध पाता है इसे ब्रह्म समाधि कहते हैं । सभी समाधियों में सबसे सहज, सुखकारी तथा सुलभ सहज समाधि” है 


संत कबीर जी ने कहा है –
साधो ! सहज समाधि भली। गुरु प्रताप भयो जा दिन ते सुरति न अनत चली ॥
आँख न मूँदूँ कान न रूँदूँ काया कष्ट न धारूँ।
खुले नयन से हँस- हँस देखूँ सुन्दर रूप निहारूँ ॥
कहूँ सोईनाम, सुनूँ सोई सुमिरन खाऊँ सोई पूजा।
गृह उद्यान एक सम लेखूँ भाव मिटाऊँ दूजा ॥
जहाँ- जहाँ जाऊँ सोई परिक्रमा जो कुछ करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दण्डवत पूँजू और न देवा ॥
शब्द निरन्तर मनुआ राता मलिन वासना त्यागी।
बैठत उठत कबहूँ ना विसरें, ऐसी ताड़ी लागी ॥
कहैं ‘कबीर’ वह अन्मनि रहती सोई प्रकट कर गाई।
दुख सुख के एक परे परम सुख, तेहि सुख रहा समाई ॥


असंख्य योग-साधनाओं में से सहज समाधि एक सर्वोत्त्म साधन है । इसका विशेष गुण यह है कि सांसारिक जीवन जीते हुए भी साधक का साधना अभ्यास चलता रहता है । साधक के जीवन से अहम भाव लगभग समाप्त हो जाता है । वह संसार का प्रत्येक कार्य प्रभु इच्छा मानकर करता रहता है । वह प्रभु के इस संसार को प्रभु की सुरम्य वाटिका के समान देखते हुए एक माली के समान कार्य करता है । संत कबीर जी भी उक्त पद में ऐसी ही समाधि की चर्चा कर रहे हैं और यह समाधि उन साधकों को ही प्राप्त हो सकती है जो मलिन वासनाओं को त्याग कर हर वक्त शब्द में लीन रहते हैं ।

 
समाधि घटित होने से साधक को मोक्ष मार्ग की यात्रा की और बढ़ते हुए विभिन्न सिद्धियाँ तथा रिद्धियाँ भी प्राप्त हो जाती है लेकिन साधक को परम मोक्ष प्राप्ति के लिए इनके प्रयोग से बचना चाहिए अन्यथा यात्रा और कठिन हो जाती है ।
ये सिद्धियाँ तथा रिद्धियाँ इस प्रकार है। 

हनुमान चालीसा में कहा है अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता............!! हनुमान चालीसा की ये पंक्तियां यह बताती हैं कि सीता माता की कृपा से पवनपुत्र हनुमान, अपने भक्तों को अष्ट सिद्धि और नव निधि यानि रिद्धियां प्रदान करते हैं। जो भी प्राणी उनकी सच्चे मन और श्रद्धा के साथ आराधना करता है,  हनुमान उसे अलौकिक सिद्धियां प्रदान करके कृतार्थ करते हैं।

पहली सिद्धि अणिमा हैं, जिसका अर्थ! अपने देह को एक अणु के समान सूक्ष्म करने की शक्ति से हैं। जिस प्रकार हम अपने नग्न आंखों एक अणु को नहीं देख सकते, उसी तरह अणिमा सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात दुसरा कोई व्यक्ति सिद्धि प्राप्त करने वाले को नहीं देख सकता हैं। साधक जब चाहे एक अणु के बराबर का सूक्ष्म देह धारण करने में सक्षम होता हैं। 


अणिमा के ठीक विपरीत प्रकार की सिद्धि हैं महिमा, साधक जब चाहे अपने शरीर को असीमित विशालता करने में सक्षम होता हैं, वह अपने शरीर को किसी भी सीमा तक फैला सकता हैं। 


गरिमा सिद्धि को प्राप्त करने के पश्चात साधक अपने शरीर के भार को असीमित तरीके से बढ़ा सकता हैं। साधक का आकार तो सीमित ही रहता हैं, परन्तु उसके शरीर का भार इतना बढ़ जाता हैं कि उसे कोई शक्ति हिला नहीं सकती हैं। 


लघिमा सिद्धि में साधक का शरीर इतना हल्का हो सकता है कि वह पवन से भी तेज गति से उड़ सकता हैं। उसके शरीर का भार ना के बराबर हो जाता हैं। 


प्राप्ति सिद्धि में बिना किसी रोक-टोक के किसी भी स्थान पर, कहीं भी जा सकता हैं। अपनी इच्छानुसार अन्य मनुष्यों के सनमुख अदृश्य होकर, साधक जहाँ जाना चाहें वही जा सकता हैं तथा उसे कोई देख नहीं सकता हैं। 


पराक्रम्य सिद्धि में किसी के मन की बात को बहुत सरलता से समझ सकता हैं, फिर सामने वाला व्यक्ति अपने मन की बात की अभिव्यक्ति करें या नहीं। 


इसित्व सिद्धि में भगवान की उपाधि हैं, यह सिद्धि प्राप्त करने से पश्चात साधक स्वयं ईश्वर स्वरूप हो जाता हैं, वह दुनिया पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता हैं। 


वसित्व सिद्धि में प्राप्त करने के पश्चात साधक किसी भी व्यक्ति को अपना दास बनाकर रख सकता हैं। वह जिसे चाहें अपने वश में कर सकता हैं या किसी की भी पराजय का कारण बन सकता हैं। 


किसी अन्य व्यक्ति के शरीर में अपनी आत्मा का प्रवेश करवाना परकाया प्रवेश कहलाता है। आप अपनी आत्मा को किसी मृत शरीर में प्रवेश करवाकर उसे पुन: जीवित भी कर सकते हैं। 


कई प्राचीन ग्रंथों में हादी विद्या का जिक्र किया गया है। इस विद्या को प्राप्त करने के बाद व्यक्ति को ना तो भूख लगती है और ना ही प्यास। वह अपनी इच्छानुसार बिना किसी परेशानी के कई दिनों तक बिना कुछ खाए-पीए रह सकता है।


हादी विद्या को प्राप्त करने के बाद जिस तरह व्यक्ति बिना कुछ खाए-पीए रह सकता है उसी प्रकार कादी विद्या की प्राप्ति के बाद व्यक्ति के शरीर और उसके मस्तिष्क पर बदलते मौसम का कोई प्रभाव नहीं होता। उसे ना तो ठंड लगती है ना गर्मी, ना बारिश का कोई असर होता है ना तूफान कुछ बिगाड़ पाता है। 


वायु गमन सिद्धि हासिल करने के बाद व्यक्ति हवा में तैर सकता है और कुछ ही पलों में किसी भी स्थान पर पहुंच सकता है। 


मदलसा सिद्धि प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अपने शरीर के आकार को अपनी इच्छानुसार कम या ज्यादा कर सकता है। लंका में प्रवेश करने के लिए पवनपुत्र हनुमान ने अपने शरीर को सूक्ष्म कर लिया था। 


कनकधर सिद्धि को प्राप्त करने वाला व्यक्ति असीमित धन का स्वामी बन जाता है, उसकी धन-संपदा का कोई सानी नहीं रह जाता। 


प्रक्य साधना में सफल होने के बाद साधक अपने शिष्य को यह आज्ञा दे सकता है कि किसी विशिष्ट महिला की गर्भ से जन्म ले। या फिर इस साधना के बल पर योगी अपने शिष्य को संतानहीन महिला की गर्भ से जन्म लेने के लिए निर्देशित कर सकता है। 


सूर्य विज्ञान भारत की प्राचीन और बेहद महत्वपूर्ण विद्याओं में से एक सूर्य विज्ञान पर सिर्फ और सिर्फ भारतीय योगियों का ही आधिपत्य है। इसकी सहायता से सूर्य की किरणों की सहायता से कोई भी तत्व किसी अन्य तत्व में तब्दील किया जा सकता है।
मृत संजीवनी विद्या की रचना असुरों के गुरु शुक्राचार्य द्वारा की गई थी। इस विद्या को प्राप्त करने के बाद किसी भी मृत व्यक्ति को दोबारा जीवित किया जा सकता है। 


इन सबके अतिरिक्त सर्वकामना सादिका दुरश्रवण र्वज्ञता वाक्य सिद्धि कल्पवृक्ष संहारशक्ति सृष्टि शक्ति सर्वाग्रगण्यता अमरत्व रिद्धियों का भी उल्लेख है। 


समाधि लगने पर साधक बिना आँखों के देख सकता है, बिना कानों के सुन सकता है, बिना मन मस्तिष्क के बोध कर सकता है, जन्म मरण से मुक्त स्थूल देह से बाहर निकल कर खुद को अभिव्यक्त कर सकता है, ब्रह्मांड से भी अलग होने की ताकत प्राप्त कर लेता है । 
इसके बारे में संत कबीर जी ने कहा है –
बिना चोलनै बिना केचुकी, बिनहीं संग संग होई । दास कबीर औसर भाल देखिया जानेगा जस कोई ॥
संत नानक देव जी उक्त संबंध में फरमाते हैं कि -
अखी बाझहु वेखणा, विणु कन्ना सुनणा । पैरा बाझहु चलणा, बिणु हथा करणा ।
जीभै बाझहु बोलणा, एउ जीवट मरणा । नानक हुकमु पछाणी कै तउ खसमै मिलणा ।
दादू दयाल जी कहते है कि –
बिन श्रवणौ सब कुछ सुनै, बिन नैना सब देखै । बिन रसना मुख सब कुछ बोलै, यह दादू अचरज पेखै ॥
रामायण में संत तुलसीदास जी लिखते है कि -
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ बिधि नाना ॥
आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ॥
तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ॥
असि सब भाँति अलौकिक करनी । महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ॥

ध्यान” तथा समाधि” में एक महत्वपूर्ण अंतर है कि साधक जब ध्यान कर रहा होता है तो उसको यह पूरा अहसास रहता है कि वह ध्याता” है तथा ध्येय” का ध्यान कर रहा है अर्थात यहाँ पर द्वैत भावना रही । लेकिन जब साधक का चित्त पूर्ण रूप से ध्येय” में परिवर्तित होने लगता है और स्वयं के अस्तित्व का अभाव हो जाता है अर्थात यहाँ केवल ध्येय” ही शेष रह जाता है, यहाँ पर अद्वैत ही शेष रह जाता है ।

योग के अनुसार समाधि के दो प्रकार बताए जाते हैं –
क) संप्रज्ञात समाधि
इस प्रकार की समाधि में साधक वैराग्य द्वारा अपने अंदर से सभी नकारात्मक विचार, दोष, लोभ, द्वेष, इच्छा आदि निकाल देता है । इस समाधि में आनंद तथा अस्मितानुगत की स्थिति हुआ करती है ।

ख) असंप्रज्ञात समाधि
इस प्रकार की समाधि में साधक को अपना भी भान नहीं रहता और वह केवल प्रभु के ध्यान में एकरत तल्लीन हो जाता है ।

संप्रज्ञात समाधि को भी चार भागों में बताया गया है :
अ)  वितर्कानुगत समाधि: विभिन्न देवी देवताओं की मूर्ति का ध्यान करते करते समाधिस्थ हो जाना।
समाधि के द्वारा जो ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है वह ब्रह्म ही बन जाता है। समाधि के आरम्भ में उस सिद्ध पुरुष का मन ब्रह्ममय हो जाता है और एक आनंद के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रहता तब उसे तदात्मा कहते हैं। इस प्रकार ब्रह्म का मनन करते करते जब मन ब्रह्म में विलीन हो जाता है तो ब्रह्म के विशेष स्वरुप का बुद्धि में अनुभव होता है। तब बुद्धि के द्वारा अनुभव किये हुए उस ब्रह्म के विशेष स्वरुप को लक्ष्य बनाकर जीवात्मा उस ब्रह्म का ध्यान करता है। उस समय ब्रह्म तो ध्येय होता है, ध्यान करने वाला ध्याता/साधक होता है और बुद्धि की वृत्ति ही ध्यान है। इस प्रकार ध्यान करते करते जब बुद्धि भी ब्रह्मरूप हो जाती है तब उसे तदबुद्धि कहते हैं। 

इसके बाद जब ध्याता, ध्यान और ध्येय यह त्रिपुटी न रहकर साधक की ब्रह्म के रूप में अभिन्न स्थिति हो जाती है तब उसे तन्निष्ठ कहते हैं। इसमें ब्रह्म का नाम, रूप और ज्ञान तीनों रहते हैं इसलिए यह समाधि की प्रारंभिक अवस्था सविकल्प समाधि कहलाती है। इसे ही सवितर्क समाधि भी कहते हैं।
तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पै:: संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः | पतंजलि योगसूत्र १.४२
ऋषि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में कहा कि वह समाधि जिसमें शब्द (नाम), अर्थ (रूप) और ज्ञान (बोध) तीनों विकल्प उपस्थित हों उसे सवितर्क समाधि कहते है. सामान्य भाषा में ईश्वर के सगुण स्वरुप का दर्शन सवितर्क समाधि का उदाहरण है। 

आ) विचारानुगत समाधि: स्थूल पदार्थो पर ध्यान टिका कर विचारों के साथ समाधिस्थ हो जाना ।

इ) आनंदानुगत समाधि: विचार शून्य होकर आनंदित हो कर समाधिस्थ हो जाना ।

 ई) अस्मितानुगत समाधि: इस समाधि में अहंकार, आनंद भी समाप्त हो जाता है ।

 अवस्थाओं के आधार पर समाधि को दो भागों में बांटा जा सकता है:-

 सविकल्प समाधि : 
यह समाधि की शुरुआत है । इसमे ध्येय, ध्याता एवं ध्यान तीनों ही होते हैं । यह समाधि द्वैत भाव युक्त है, इसमें साधक का अस्तित्व भी विद्यमान रहता है । इसको इस प्रकार से समझ सकते हैं जैसे लोहे का कोई बर्तन बनाया तो बर्तन में लोहे की भी अभिव्यक्ति मौजूद रहती है । समाधि की इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए साधक को किसी न किसी सहारे की आवश्यकता होती है । चित्त एकाग्र होने पर ही यह समाधि घटित होती है । ऐसी अवस्था में प्रज्ञा के संस्कार बाकी रह जाते हैं ।
निर्विकल्प समाधि : जब साधक ( ध्याता ) ध्यान करते करते ध्येय में इस प्रकार समाहित हो जाता है कि उसका अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता है तथा केवल “ध्येय” ही शेष रह जाता है अर्थात अद्वैत अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो इसे निर्विकल्प समाधि कहते हैं । समाधि की इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए साधक को किसी भी प्रकार के सहारे की आवश्यकता नहीं होती है । इस समाधि के उपरांत सभी दुखों की निवृत्ति होकर पूर्ण सुख की प्राप्ति हो जाती है ।

इसके बाद साधक की अपने-आप निर्विकल्प समाधि हो जाती है। इस समाधि में ब्रह्म का नाम, रूप व ज्ञान ये तीनों विकल्प भिन्न-भिन्न नहीं रहते बल्कि एक अर्थ रूप वस्तु - ब्रह्म ही रह जाता है। इसी को निर्वितर्क समाधि भी कहते हैं। 

स्मृति परिशुद्धौ स्वरुपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का | पतंजलि योगसूत्र १.४३
स्मृति के सब प्रकार से शुद्ध हो जाने पर जब वह स्मृति अपने मूल स्वरुप शून्य के अर्थ में परिणत हो जाती है तो उस अवस्था में नाम, रूप, ज्ञान तीनो ही नहीं रहते, इसे ही निवितर्क समाधि कहते है। इसमें साधक स्वयं ब्रह्मरूप ही बन जाता है अतः उसे तत्परायण कहते हैं। इस निर्विकल्प समाधि का फल, जो कि निर्बीज समाधि है वाही वास्तव में ब्रह्म की प्राप्ति है। इसे समापत्ति कहते हैं। इस अवस्था में पहुंचे हुए पुरुष को ब्रह्मवेत्ता कहते हैं। ऐसे महात्मा के अंतःकरण में यह सारा संसार स्वप्नवत भासित होता है.
उपरोक्त दोनों अवस्थाएँ समाधि की शुरुआती तथा आखरी अवस्थाएँ हैं । समाधि को प्राप्त करने के विभिन्न साधनों के आधार पर समाधि के कई प्रकार हैं ।


 जैसे-
ध्यान योग समाधि : समाधि की यह आरंभिक स्थिति है । ध्यान पक्का होने पर ही समाधि लगती है अत: साधक “ध्येय” का ध्यान कर ध्यान की सिद्धि प्राप्त करता है । ध्यान की सिद्धि के लिए साधक का मन पवित्र तथा पाप रहित रहना चाहिए । घेरण्ड संहिता में उल्लखित है कि-
शांभावी मुद्रिकामं कृत्वा आत्मप्रत्यक्षमानयेत । बिन्दुब्रह्म सकृद्दृष्ट्वा मनस्तत्रनियोजयेत ॥
खमध्ये कुरुचात्मानं आत्ममध्ये च खं कुरु । आतमानं खमयं दृष्ट्वा न किंचदपि बाध्यते ॥
सदानंदमयों भूत्वा समाधिस्थों भवेन्नर: ।
अर्थात शांभावी मुद्रा द्वारा आत्मा को साक्षात करें और बिन्दु समान ब्रह्म का साक्षात्कार करें। उसके बाद मस्तिष्क में मौजूद ब्रह्म में आत्मा का प्रवेश कराएं। अब आत्मा को आकाश में लय कर दें। अब आत्मा को परमात्मा के मार्ग की और प्रवेश कराये इससे साधक हमेशा के आनंद तथा समाधि को प्राप्त कर लेता है।

नाद योग समाधि : साधक इस प्रकार की समाधि में अपने मन को पूर्णरुपेण अनाहत नाद में लगा देता है । इससे नि:शब्द समाधि की प्राप्ति होती है । इसमें मन नाद रूपी नि:अक्षर शक्ति में समाने लगता है । इसको महाबोध समाधि भी कहते हैं ।
मंत्र योग समाधि : इसमें साधक अपने मन को श्वास प्रश्वास की क्रिया में लय करता है। श्वास लेते तथा छोड़ते हुए उत्पन्न आवाज पर साधक ध्यान रखता है और एकाग्रचित होकर समाधिस्थ हो जाता है। अभ्यास पक्का हो जाने पर श्वास उलट जाती हैं। इसी उल्टे जाप का उच्चारण महाऋषि बाल्मीकि जी ने किया था ।

लय योग समाधि: हमारे शरीर में “कुंडलनी” सुषमना नाड़ी का रास्ता बंद कर साढ़े तीन चक्कर ( कुण्डल ) मार कर सुषुप्त अवस्था में पड़ी रहती है। कुंडलनी को शक्ति का द्योतक माना जाता है। ध्यान साधना द्वारा समाधि की स्थिति को प्राप्त करने के लिए कुंडलनी को जाग्रत करते हुए छ चक्रों को भेदना होता है। इसमे साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उसमे परमात्मा की शक्ति लय होती जा रही है। इसे “महालय समाधि” भी कहा जाता है।


भक्ति योग समाधि : जब साधक अपने मन को अपने इष्ट में इस प्रकार समा देता है कि उस अपने शरीर का भी भान नही रहता है । वह बाहरी सभी प्रकरणों से अपने आप को संज्ञाशून्य समझने लगता है । शरीर प्रसन्नता से भर जाता है आनंद में आँसू निकालने लगते है तो इसे भक्ति योग समाधि कहा जाता है । इससे मन में एकाग्रता आ जाती तथा ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है ।
राज योग समाधि : मन को बाहरी सभी प्रपंचों से हटाकर आत्मा में तथा आत्मा को परमात्मा में लगा देना ही राज योग समाधि है । इसमे साधक की प्राथमिकता यही रहती है कि मन की सभी वृत्तियों को रोककर प्रभु में लगा दिया जाये ।

समाधि के अभ्यास से ऐसा समाधिस्थ पुरुष जब समाधि में रहता है तो उसे सुषुप्ति अवस्था की भांति संसार का बिलकुल भान नहीं रहता और जब वह समाधि से उठकर कार्यरत होता है तो बिना कामना, संकल्प, कर्तापन के अभिमान के ही सारे कर्म होते रहते हैं और उसके वे सभी कर्म शास्त्रविहित होते हैं। उसकी कभी समाधि अवस्था रहती है और कभी जाग्रत अवस्था रहती है। वह बिना किसी दूसरे के प्रयत्न के स्वयं ही समाधि से जाग जाता है, लेकिन संसार के अभाव का निश्चय होने के कारण वह जगा हुआ भी समाधि में ही रहता है। इस अवस्था में उस महात्मा का शरीर व संसार से अत्यंत सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है इसलिए इसे समाधि की असंसक्ति अवस्था कहते हैं। इस समाधि के और अधिक अभ्यास से उसकी नित्य समाधि रहती है। इसके कारण उसके द्वारा कोई क्रिया नहीं होती। उसके अंतःकरण में शरीर और संसार के सम्पूर्ण पदार्थों का अत्यंत अभाव सा हो जाता है। उसे संसार और शारीर के बाहर और भीतर का बिलकुल भी ज्ञान नहीं रहता, केवल श्वास आते-जाते रहते हैं, इसलिए समाधि कि इस अवस्था को "पदार्थाभावना" कहते हैं।  जैसे गहरी नींद में स्थित पुरुष को बाहर-भीतर के पदार्थों का बिलकुल भी ज्ञान नहीं रहता, वैसे ही समाधि की इस अवस्था में भी होता है। ऐसा समाधिस्थ पुरुष दूसरों के बारम्बार जगाने पर ही जागता है, अपने-आप नहीं। जागने पर वह ब्रह्म-विषयक तत्त्व-रहस्य बता सकता है इसलिए ऐसे पुरुष को "ब्रह्मविद्वरीयान" केते हैं।
इसके अभ्यास से समाधि की तुर्यगा अवस्था शीघ्र ही स्वतः सिद्ध हो जाती है। उस ब्रह्मवेत्ता के हृदय में संसार और शारीर के बाहर-भीतर के लौकिक ज्ञान का अत्यंत अभाव हो जाता है. ऐसा महात्मा पुरुष समाधि से न तो स्वयं जागता है और न दूसरों के द्वारा, बस यह शास लेता रहता है। ऐसे पुरुष का जीवन निर्वाह दूसरों के द्वारा केवल उसके प्रारब्ध संस्कारों के कारण ही होता रहता है।  वह प्रकृति और उसके कार्य सत्व, रज, तम तीनो गुणों से और जाग्रत-स्वप्न- सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे होकर ब्रह्म में विलीन रहता है, इसलिए समाधि की इस अवस्था को तुर्यगा अवस्था कहते हैं। 

इस प्रकार समाधि के साथ योग का क्रम पूर्ण होता है। 

योग साधन में समाधि की अवस्था को परमानंद-मयी माना गया है। चित्त जब जिस स्थान पर रुकने लगता है तो उस किसी भी विषय में आनंद आने लगता है। यदि चित्त वृत्तियों का निरोध होने के पश्चात वे निरुद्ध वृत्तियाँ आत्मा परमात्मा में लगती हैं तब तो और भी अधिक आनन्द का अनुभव होता है। इसे ही परमानंद कहते हैं। योग की सफलता इस समाधि रूपी परमानंद से आँकी जाती है। मोटे तौर से समझा जाता है कि बेहोश हो जाने जैसी दशा को समाधि कहते हैं। यदि ऐसा ही होता तो क्लोरोफार्म सूँघ कर या शराब आदि नशीली चीजों को पीकर आसानी से बेहोश हुआ जा सकता था और समाधि सुख भोगा जा सक
समाधि के अभ्यास से ऐसा समाधिस्थ पुरुष जब समाधि में रहता है तो उसे सुषुप्ति अवस्था की भांति संसार का बिलकुल भान नहीं रहता और जब वह समाधि से उठकर कार्यरत होता है तो बिना कामना, संकल्प, कर्तापन के अभिमान के ही सारे कर्म होते रहते हैं और उसके वे सभी कर्म शास्त्रविहित होते हैं। उसकी कभी समाधि अवस्था रहती है और कभी जाग्रत अवस्था रहती है। वह बिना किसी दूसरे के प्रयत्न के स्वयं ही समाधि से जाग जाता है, लेकिन संसार के अभाव का निश्चय होने के कारण वह जगा हुआ भी समाधि में ही रहता है। इस अवस्था में उस महात्मा का शरीर व संसार से अत्यंत सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है इसलिए इसे समाधि की असंसक्ति अवस्था कहते हैं। इस समाधि के और अधिक अभ्यास से उसकी नित्य समाधि रहती है। इसके कारण उसके द्वारा कोई क्रिया नहीं होती। उसके अंतःकरण में शरीर और संसार के सम्पूर्ण पदार्थों का अत्यंत अभाव सा हो जाता है। उसे संसार और शारीर के बाहर और भीतर का बिलकुल भी ज्ञान नहीं रहता, केवल श्वास आते-जाते रहते हैं, इसलिए समाधि कि इस अवस्था को "पदार्थाभावना" कहते हैं।  जैसे गहरी नींद में स्थित पुरुष को बाहर-भीतर के पदार्थों का बिलकुल भी ज्ञान नहीं रहता, वैसे ही समाधि की इस अवस्था में भी होता है। ऐसा समाधिस्थ पुरुष दूसरों के बारम्बार जगाने पर ही जागता है, अपने-आप नहीं। जागने पर वह ब्रह्म-विषयक तत्त्व-रहस्य बता सकता है इसलिए ऐसे पुरुष को "ब्रह्मविद्वरीयान" केते हैं।
ता था। पर वास्तविक बात ऐसी नहीं है। शरीर भाव का होश छोड़कर आत्म भाव में जागृत हो जाना ही समाधि है। जैसे दिन में दिन का कामकाज सत्य मालूम पड़ता है और रात को सपने सच्चे लगते हैं। दिन में सपने झूठे हैं और स्वप्न में दिन का जीवन निष्प्रयोजन है। इसी प्रकार साँसारिक आदमियों की दृष्टि में समाधि एक प्रकार की बेहोशी है। समाधि अवस्था में गया हुआ आत्मज्ञानी दुनिया वालों को मोह मदिरा पीकर उन्मत्त विचरता हुआ देखता है। यह दृष्टिकोण की विपरीतता ही ‘बेहोशी’ है। अन्यथा बेहोशी का और कोई कारण नहीं। गीता में इसी तथ्य को इस प्रकार कहा है कि ‘जो साधारण प्राणियों के लिए रात है संयमी के लिए दिन है। उसमें वह जागता है और जिसमें जीव जगा करते हैं उनमें मुनि सोया करता है।” तात्पर्य यह कि आत्मज्ञानी के लिए साधारण लोग बेहोश हैं और साधारण लोगों के लिए आत्मज्ञानी बेहोश है। ध्यान की तन्मयता के कारण शरीराभ्यास का ध्यान न रहना यह दूसरी बात है और बेहोश या मूर्च्छित हो जाना बिल्कुल पृथक बात है।

महर्षि पतंजलि ने अपने लोग दर्शन में चित्त वृत्तियों के निरोध को योग कहा है और बताया है कि यह निरोध बलवान होने से समाधि अवस्था प्राप्त होती है। “तस्यापि निरोधे सर्वनिधन्निर्वीज समाधिः” अर्थात् उसके (चित्त के) निरोध से निर्बीज समाधि होती है। इस चित्त निरोध के लिए प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आदि उपाय हैं। जिनके द्वारा चित्त को अमुक कल्पनाओं से हटाकर अमुक कल्पनाओं में लगाया जाता है। योगी लोग स्थिर होकर एकान्त में एक आसन से बैठते हैं और आंखें मूँद कर ध्यान लगाते या किन्हीं भावनाओं पर चित्त जमाते हैं। यह कल्पना योग हुआ। उस मार्ग में अनेकों प्रकार की साधनाएं होती हैं।
केवल कल्पना योग की साधनाओं द्वारा समाधि प्राप्त होती हो सो बात नहीं है। क्रिया योग में भी ऐसी साधनाएं मौजूद हैं जिन्हें करते हुए काम काजी मनुष्य भी चित्त को एकाग्र कर सकता है और समाधि का आनंद पा सकता है। योगदर्शन के साधन पाद में महर्षि पातंजलि ने तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को क्रियायोग बताया है। (तपस्स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योगः) और इस क्रिया योग का फल लिखते हुए उन्होंने कहा है कि इस क्रियायोग से क्लेश तथा व्यथाएं दूर होकर समाधि प्राप्त होती है। (समाधि भावनार्थः केश तनूकरणार्थंच) इस प्रकार प्रकट है कि क्रियायोग से भी समाधि की सिद्धि हो सकती है।

 सत्कार्य के लिए कष्ट सहन करना तप कहलाता है। आत्मोन्नति के लिए लोक कल्याण के लिए, परमार्थ के लिए जो परिश्रम किया जाता है, कष्ट सहन किया जाता है वह तपश्चर्या का प्रतीक है। शुभ कर्म के मार्ग में कठिनाइयों को न गिनना तपस्या का तत्व है। यह तपश्चर्या मनुष्य को समाधि की ओर ले जाती है।

स्वाध्याय का अर्थ है- स्व+अध्याय, अध्ययन। अपने आपको पढ़ना। आत्म चिन्तन, आत्म निरीक्षण, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण यह स्वाध्याय के चार अंग है। इन चारों की पूर्ति के लिए सद्ग्रन्थों का पठन, श्रवण तथा सत्पुरुषों का सत्संग भी उपयोगी है। वैसे तो स्वाध्याय बिना पढ़े मनुष्य भी, बिलकुल अकेले रहकर भी कर सकते हैं। मेरी आत्मा वस्तुतः क्या है? इस जीवन का सच्चा प्रयोजन क्या है? मेरे विचार एवं कार्य में उचित तथा अनुचित का कितना अंश है? किन दोषों को छोड़ना और किन गुणों को बढ़ाना मेरे लिए आवश्यक है? अपनी भीतरी तथा बाहरी दुनिया को सुव्यवस्थित किन उपायों से बनाया जाय? अपने सत् निश्चयों को कार्य रूप में परिणत किस प्रकार किया जाय? इन प्रश्नों पर निष्पक्षता, गंभीरता, दृढ़ता एवं सच्चाई से विचार करना और उन विचारों को चरितार्थ करने के लिए कार्यक्रम बनाना यही स्वाध्याय है। स्वाध्यायी मनुष्य को आत्मा का दर्शन होकर रहता है और वह समाधि सुख का रसास्वादन करता है।

 
ईश्वर प्रणिधान-ईश्वर परायणता को कहते हैं। विश्वात्मा, समस्त प्राणियों की सम्मिलित आत्मा, परमात्मा का आराधन ग्रह है कि अपने स्वार्थ को परमार्थ में मिला दिया जाय। जिसका स्वार्थ, परमार्थ मय है अथवा जिसे परमार्थ में ही स्वार्थ दीखता है वह सच्चा ईश्वर प्रणिधानी है। प्राणि मात्र चर अचर में प्रभु के दर्शन करना, साकार पूजा है। प्रकृति से परे, अजर, अमर, अविनाशी, निष्पाप आत्मा में स्थित होना, पाँच भूतों की संवेदना से ऊपर उठना निराकार पूजा है। चाहे जिस प्रकार भी कीजिए आत्मा को उन्नत, विकसित, महान बना देना, परम बना देना, परम आत्मा, परमात्मा की प्राप्ति है। वह प्रत्यक्ष समाधि ही तो है। इस प्रकार महर्षि पातंजलि के अनुसार हर व्यक्ति साधारण जीवन व्यतीत करते हुए भी समाधिस्थ हो सकता है।

महत्वपूर्ण नोट: समाधि में प्रवेश की विद्या का अभ्यास किसी भी साधक को किसी पूर्ण संत सद्गुरु/ समर्थ / कौल गुरू / शक्तिपात गुरू के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए क्योंकि इसमे कई प्रकार की जटिलताएँ आने की संभावना रहती है। इसमे साधक को समय समय पर सद्गुरु की मदद की आवश्यकता पड़ती है जिसमे सद्गुरु द्वारा शिष्य को दी जाने वाली आध्यात्मिक शक्ति भी शामिल है। आप माने न माने लाखों में एक को यह भी हो सक्ता है कि प्राण किसी अवस्था मे न नीचे न ऊपर। मत्लब न जीवन न मौत्। आजकल व्हाटप फेस बुक पर गुजरात के एक संत की फोटो लगाकर जय जयकार हो रही है। लेकिन कब्र का हाल मुर्दा ही जानता है। 
अत: हठ योग सम्बंधी मार्ग पर ध्यान दे। 
हा साकार मंत्र जप में कभी भी कोई कठिनाई नहीं आती है।  


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