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Wednesday, June 27, 2018

मानो मत जानो। पढो मत करो। कुछ उत्तर



मानो मत जानो। पढो मत करो।
कुछ उत्तर

सनातनपुत्र देवीदास विपुल"खोजी"




विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल वैज्ञनिक ISSN 2456-4818
वेब:   vipkavi.info , वेब चैनल:  vipkavi
 ब्लाग : https://freedhyan.blogspot.com/

सवाल यह है हम बहुत कुछ मानते है। पर मानना सत्य नही भी हो सकता है। प्रश्न यह है कि हम जाने कैसे। क्योकि जानना ही श्रेष्ठ है। एक बार हम जान ले तो मानना तो अपने आप हो जाएगा।

जानने हेतु हमे प्रयत्न करना पड़ता है।
सही दिशा में किया गया प्रयत्न ही हमे सही गन्तव्य तक ले जाता है।
जहाँ पहुचकर हम जान लेते है। हम क्या है। यही ज्ञान हमे बन्धनों से मुक्त करता है।
जानने के मार्गो में सबसे सहज सुंदर टिकाऊ और सस्ता मार्ग है नाम जप और समर्पण।
नाम जप से मरा शब्द भी डाकू रत्नाकर को बाल्मीकि ऋषि बना गया।

अतः शब्दो के भंवर में पुस्तकीय ज्ञान के महासागर में मत उतराओ। यहाँ डूबकर कुछ न मिलेगा।

भक्ति के और प्रभु स्मरण यानी नाम जप के सागर में बार बार गोते लगाओ। यही कल्याण का श्रेष्ठ मार्ग है।

प्रायः मनुष्य आध्यात्म में तनिक भी अनुभव करता है कि वह अपने को ज्ञानी और श्रेष्ठ समझ कर उपदेश आरम्भ कर देता है कोई कोई तो गुरु बनने के प्रति इतना लालायित होता है कि वह लोगो को चेला बनने के लिए सांकेतिक रूप में कहने लगता है। 
खुदा न खास्ता यदि किसी को कुछ अन्य अनुभूतिया जैसे योग का अहम ब्रम्हास्मि या दर्शन का अनुभव हो तो कहने ही क्या। नाम पद लालसा अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने की इच्छा बलवती हो जाती है।

चलो यह भी ठीक है कम से कम सनातन का प्रचार ही सही।
किंतु दुःख तब होता है या यूं कहो हंसी तब आती है जब बिना गुरू परम्परा के गुरू बन बैठते है । अपने नाम के आगे बिना विधि विधान से मिले नाम या पट्ट जैसे स्वामी योगीराज परमहंस ज्ञानदेव सिध्द गुरू इत्यादि लगाने लगते है।

एक तो अपने ग्रुप के सदस्य तो कह ही शिवोहम योगी पता नही क्या क्या खुद ही लगा बैठे। लोग उनको जानते है।
इसे कहते है छुद्र नदी भर चल उतराई। 
इन चक्करों में पड़ कर मनुष्य अपने वास्तविक उत्थान खो देता है। इनमे लिप्त होकर पतन की ओर अग्रसर होता है और फिर समाज मे निंदा का कारण बन जाता है।
अतः समाज मे मूर्खो की भांति रहो यह तुम्हारी निजी संपत्ति है। जब तक गुरू का प्रभु का आदेश न हो अपने को जग जाहिर मत करो। अपनी साधना और मन्त्र जप में लगे रहो। वो ही तुम्हे ईश के निराकार स्वरूप के स्वतः दर्शन करवा देगा। यह मेरा विश्वास है।

मजा तो तब आता है कल के बच्चे ज्ञानियों वाले पोस्ट गुड़ मार्निग और गुड इवनिंग के बिना अर्थ जाने पोस्ट कर देते है। मेरे इंजेनियरिंग कालेज के बच्चे जो मेरी बेटी से भी छोटे होंगे। उनके उपदेशात्मक पोस्ट रोज मिलते है। कम से कम मेरे लिए तो यह किसी काम के नही। कोई समझता नही अपनी फोटो या इतनी बिट्स के पोस्ट कर कितना अधिक योगदान पर्यावरण प्रदूषण में दे रहा है।


नवधा भक्ति में तुलसीदास जी ने एक मनुष्य के साधारण मानव से योगी होने तक के चरण बताये है।
किसमे कहां ठहरेंगे कितना समय लगेगा हमें न मालूम। यह तो हमारे कर्मो और भक्तिभाव पर निर्भर है।
किसी भी यन्त्र द्वारा हम इसे न माप सकते और न हमारे वश में है। 
बस मन्त्र जप और समर्पण का प्रयास हमारे हाथ मे है।

सनातन धर्म जिसे हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहा जाता है, का १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं। भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था।

प्राचीन काल में भारतीय सनातन धर्म में गाणपत्य, शैवदेव:कोटी वैष्णव,शाक्त और सौर नाम के पाँच सम्प्रदाय होते थे।गाणपत्य गणेशकी, वैष्णव विष्णु की, शैवदेव:कोटी शिव की, शाक्त शक्ति की और सौर सूर्य की पूजा आराधना किया करते थे। पर यह मान्यता थी कि सब एक ही सत्य की व्याख्या हैं। यह न केवल ऋग्वेद परन्तु रामायण और महाभारत जैसे लोकप्रिय ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है। प्रत्येक सम्प्रदाय के समर्थक अपने देवता को दूसरे सम्प्रदायों के देवता से बड़ा समझते थे और इस कारण से उनमें वैमनस्य बना रहता था। एकता बनाए रखने के उद्देश्य से धर्मगुरुओं ने लोगों को यह शिक्षा देना आरम्भ किया कि सभी देवता समान हैं, विष्णु, शिव और शक्ति आदि देवी-देवता परस्पर एक दूसरे के भी भक्त हैं। उनकी इन शिक्षाओं से तीनों सम्प्रदायों में मेल हुआ और सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई। सनातन धर्म में विष्णु, शिव और शक्ति को समान माना गया और तीनों ही सम्प्रदाय के समर्थक इस धर्म को मानने लगे। सनातन धर्म का सारा साहित्य वेद, पुराण, श्रुति, स्मृतियाँ,उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि संस्कृत भाषा में रचा गया है।

कालान्तर में भारतवर्ष में मुसलमान शासन हो जाने के कारण देवभाषा संस्कृत का ह्रास हो गया तथा सनातन धर्म की अवनति होने लगी। इस स्थिति को सुधारने के लिये विद्वान संत तुलसीदास ने प्रचलित भाषा में धार्मिक साहित्य की रचना करके सनातन धर्म की रक्षा की।

जब औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन को ईसाई, मुस्लिम आदि धर्मों के मानने वालों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये जनगणना करने की आवश्यकता पड़ी तो सनातन शब्द से अपरिचित होने के कारण उन्होंने यहाँ के धर्म का नाम सनातन धर्म के स्थान पर हिंदू धर्म रख दिया।

'सनातन धर्म', हिन्दू धर्म का वास्तविक नाम है।
सत्य दो धातुओं से मिलकर बना है सत् और तत्। सत का अर्थ यह और तत का अर्थ वह। दोनों ही सत्य है। अहं ब्रह्मास्मी और तत्वमसि। अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ और तुम ही ब्रह्म हो। यह संपूर्ण जगत ब्रह्ममय है। ब्रह्म पूर्ण है। यह जगत् भी पूर्ण है। पूर्ण जगत् की उत्पत्ति पूर्ण ब्रह्म से हुई है। पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण जगत् की उत्पत्ति होने पर भी ब्रह्म की पूर्णता में कोई न्यूनता नहीं आती। वह शेष रूप में भी पूर्ण ही रहता है। यही सनातन सत्य है|
कुछ इसी प्रकार जैन धर्म पुराना और सनातन का अभिन्न अंग है।


दोनों धर्मों की गुत्थियों को देखते हुए कई बार इसे कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है। हालांकि, सच्चाई तो ऐसी नहीं है, फिर भी इसके इतने आयाम, इतने पहलू हैं कि लोगबाग कई बार इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं। सबसे बड़ा कारण इसका यह कि सनातन धर्म किसी एक दार्शनिक, मनीषा या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है, न ही यह किसी ख़ास समय पैदा हुआ। यह तो अनादि काल से प्रवाहमान और विकासमान रहा। साथ ही यह केवल एक दृष्टा, सिद्धांत या तर्क को भी वरीयता नहीं देता

विज्ञान जब प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्व का मूल्यांकन करता है तो इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदांत में उल्लेखित जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन किया गया है विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर 'मोक्ष' की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था। मोक्ष के बगैर आत्मा  की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन मार्ग माना है।

आपके अनुभव को मैं पूर्णतयः सत्य मानता हूँ। क्योकि यह अनुभव मुझे 25 साल पहले हुए थे। यब गुरु महाराज में मुझे मरने से बचाया।
किन्तु इस ग्रुप में कुछ लोग जो जगत के विद्दान है वह अभी भी मनोविज्ञान या मस्तिष्क की बीमारी हालत समझ रहे है। घायल की गति घायल जाने। और न जाने कोय। हैरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरी दर्द न जाने कोय।

मित्रो यह पागलो की बस्ती है। सौभाग्य या दुर्भाग्य से कुछ जगत के जानकार सदस्य बने हुए है। 

आध्यात्म का अर्थ जबरिया हल्के होने के लिए स्वस्थ्य होने के लिए ध्यान में कुछ सफेद। पीला नीला। रंग। एक लंबी सुरंग। देखना ही नही। जरा सा रोमांच या कम्पन को बड़ी उपलब्धि मान लेना नही है। हाँ यह भी लक्षण है पर बेहद आरम्भिक। अनुभव है शरीर से बाहर निकलना। आसन का उठ जाना। नेत्रो से प्रकाश निकलना। साफ साफ इष्ट के दर्शन होना। इत्यादि और भी भयंकर। परन्तु हर अनुभव हेतु मॉनव का एक लेवल या स्तर होना चाहिए। शरीर मजबूत। जो आपको मन्त्र जप के साथ ध्यान की साकार पध्दतियों से मिलता है। भई करके तो देखो। केवल पढ़ने से संशय करने से कुछ न मिलेगा। एक दिन इसी भाँति संशयग्रस्त होकर मर जाना। फिर पछताना।
बड़े भाग्य मानुष तन पावा। सुर नर मुनि सब यही गावा।
इस शरीर का जो असीमित शक्तियों से भरा हुआ है उसको पहिचानो।

इन शक्तियों का उपयोग यदि अपने की जानने के लिए न किया तो फिर किसके लिये करोगे। मुझे एक शेर याद आता है।

मैं फकीरी को ग़ज़ल में आशिक़ी कहता रहा।
कतरा कतरा खुदकशी को जिंदगी कहता रहा।।

यह हाल है आज के मॉनव का। भागता जा रहा है बिना जाने भौतिक लक्ष्यों के लिए। पैसा शार्ट फैक्टी लगाकर यदि सफलता मिली तो ईश को भूल गए। अहंकार आ गया मैं आ गया। ऐसे ही मेरे एक मित्र जो इस ग्रुप के सदस्य भी है। पैसे और सफलता के मद में ईश को मानते तक न थे। मेरा अक्सर उसी बात तर्क वितर्क होता था। वो हमेशा नास्तिकता की वात कर तर्क देते थे। अब आयु में बड़े। पद में बड़े तो मैं चुप हो जाता था। लेकिन मैं कहता था सर एक दिन आपको मनाना पड़ेगा हमारा बाप कौन है। आज समय की मार ने जब सब छीन लिया तो दूसरों को भी भौतिकता से दूर रहने का उपदेस देते है।
अब बात है जो यह दोहा कहता है।

सुख में सुमिरन न किया, दुख में किया याद।
कह कबीरता दास की, कौन सुने फरियाद।

हम जब सुखी होते है अपने बाप के अस्तित्व तक को नकारते है। परन्तु संकट में उसी बाप से फरियाद करते है। वह बाप परम् दयालु है। बच्चों की सभी गलतियों को माफ कर फिर सहायता करता है। पर याद रखो उससे धूर्तता न चलेगी जो तुमने दुनिया से दिखाई।

इस मामले में राजस्थानी और गुजराती व्यापार में आगे है। लगभग सभी धार्मिक होते है और व्यापार के पहले दिन से अपने बाप ईश को गुरु को स्मरण कर बेईमानी तक करते है। पर अन्य बाप को सिर्फ सङ्कट में ही याद करते है।

इस सब पूरी बात का निचोड़ है। मित्र कुछ भी करो अपने बाप को मत भूलो। गलत करोगे गलत फल पाओगे। सही करोगे सही। परन्तु ईश का स्मरण हर समय करो। मन्त्र जप सघन और सतत करो यह तुम्हे पापो को भुगतने के बाद भी सहायता करता रहेगा। यदि सतमार्गी हो तो कहने की क्या। अपना पता तक बता देगा।

कुछ कन गूगल से साभार 

"MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  देवीदास विपुल 
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Sunday, June 24, 2018

सनातन ही सर्व श्रेष्ठ मार्ग है कुछ उत्तर



सनातन ही सर्व श्रेष्ठ मार्ग है
कुछ उत्तर 
खोजी देवीदास विपुल

विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल वैज्ञनिक ISSN 2456-4818
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जी यही महानता है सनातन की। सनातन ही श्रेष्ठ मार्ग है  । गीता ही ज्ञान। वेद ही सत्य वाणी।
सनातन इसलिए विशाल है
क्योकि यह प्रत्येक मनुष्य की बुद्धी खुलने के आयाम और स्वतन्त्रा देती है।
अनेको पुस्तको और ज्ञान के भंडार को खुद समझ कर अपनी गीता खुद लिखने की छूट देती है। चार्वाक ने भगवान नहीं माना उनको भी ऋषि होने का सम्मान दिया। इस्लाम तो गला काटते हैं। ईश निंदा पर सजाये मौत।
वही अन्य किताब बाइबिल या कुरान या एंजिल अपने से बाहर सोंचने देखने की अनुमति नही देते है।

ईश तक पहुचने के मार्ग तुम खुद सोंच सकते हो पसन्द कर सकते हो, यह कहता है सनातन। यह मात्र सनातन ही छूट देता है।
सनातन दोष नहीं अपूर्णता बताता है। हमारे द्वारा अपूर्णता देखना दोष नही होता है।
पूर्ण सिर्फ सनातन जो साकार से निराकार सगुन से निर्गुण तक का भी ज्ञान देती है।
बाइबिल साकार जीसस की बात करते हैं  मुस्लिम निराकार अल्लह की। कहते हैं कि सिर्फ यही सही, बाकी गलत जो इनको संकुचित कर छोटा बना देता है। यह क्या है कि यहाँ तक दूसरी पद्दति के प्रसाद तक को खाने को मना।

सनातन तो कहता है mmst में विधि दी है। आप अपनी पूजा करके भी ईश को प्राप्त कर सकते हो।
इनके नही मुक्ती नही स्वर्ग मिलता है। मुक्ति सिर्फ सनातन मानता है। बाकी के लिये स्वर्ग से ऊपर कुछ नही।
इसी लिए भोजन शुध्द बताया है  शरीर की ऊर्जा सहन नही होती है और क्रोध में निकलती है।
निर्भर करता है मनुष्य की शारीरिक और तासीर पर।
मनुष्य की धारणा और सोंच बहुत बड़ी सहयोगी और बाधक है। यदि आप बचपन से मुक्ति की नही सोंचेंगे आप मुक्त नही हो सकते।   आप स्वर्ग नरक में फंसे तो नही फंसेंगे। इसी कारण मुस्लिम में और ईसाई में पीर इत्यादि बहुत होते है। क्योंकि वे सन्त होते हुए भी मुक्ति को नही सोंच पाते तो यही तो यहीं भटकते है। स्वर्ग नही मिला तो धरती पर भटके।

इसी लिए मेरा मानना है कि प्रत्येक मनुष्य अपने मरने के प्रकार की तैयारी करता है। 
गंगा जी का तट हो सावरा निकट हो जब प्राण तन से निकले।
यह क्या है मौत का रिहर्सल।
नही उसका बिलकुल नही। बिना हमारी इच्छा के।
नही यह बात समझने की नही अनुभव की है। जैसे ईश ने कहा मुक्त हो तुमने कहा नही तो मुक्ति नही।
मित्रो यह चर्चा है ज्ञान हेतु पर इसको हर व्यक्ति  समझ नही सकता जब तक अनुभव न हो।
अतः मित्रो यह मात्र बौध्दिक विलास और व्यर्थ की ही है।
बाते बड़ी बड़ी करनी कुछ नही। दिन भर मोबाइल पर रहो साधन साधना मत करो। बाते ज्ञान की करना मात्र बकवास की श्रेणी में आता है।

गूगल पर जाए सब वाक्य दिए है। समझो या न समझो।
मैं तो कहता हूँ करो सिर्फ करो। सब स्पष्ट हो जाएगा।
जो अभी पश्यंती तक मे गया नही उसे स्थित प्रज्ञ स्थिर बुद्दी समझ मे आएगी।
कृष्ण को केवल कुछ लोग समझे थे। बाकी तो ग्वाला अहीर समझते थे।
इनको जो बोला गया था। कुछ भी नही किया होगा। जो व्यक्ति खुद समर्थ नही होना चाहता सब दूसरों से उम्मीद करता हो वह जीवन मे सफल नही हो सकता।

विगत तीन वर्षों में कितने लोगो ने जो कुछ भी बताया वह कुछ नही किया उल्टे उन्हें बुराई मिली। अब यह बताओ ऐसे व्यक्ति की सहायता तो भगवान भी नही कर सकते।जो सबको गलत माने कुछ समझे नही कुछ करे नही। जो स्त्री शक्ति शापित हो उसे कोई क्या कर सकता है।मुझे भी सुनने के लिए तैयार होना चाहिए।मेरी बातों को इस ग्रुप में कुछ लोगो ने माना बिना तर्क आरम्भ किया। उन सबको फायदा हुआ।उन्होंने बिना प्रश्न किये बताये गए मार्ग और पूजा को किया और कर रहे है वह सफल हो रहे है।जो सन्देह करे। अपने को विद्धान माने। भक्त समझे। बतानेवाले को मूर्ख समझे। उसका भला मन्त्र कैसे करेगा। विश्वास श्रध्दा और समर्पण से धरती तक हिल सकती है। पर हो तो।
रिपोस्ट करता हूँ। ध्यान से पढो और समझो।

।।  गुप्त मन्त्र साधना रहस्य ।।
एक मनुष्य ने सुन रखा था कि आध्यात्मिक जगत में कुछ ऐसे गुप्त मंत्र हैं जो यदि किसी को सिद्ध हो जावें तो उसे बहुत सिद्धियाँ मिल सकती हैं। मन्त्रों की अद्भुत शक्तियों के बारे में उसने बहुत कुछ सुन रक्खा था और बहुत कुछ देखा था इसलिए उसे बड़ी प्रबल उत्कंठा थी कि किसी प्रकार कोई मन्त्र सिद्ध कर लें, तो आराम से जिन्दगी बीते और गुणवान तथा यशस्वी बन जावें।

गुप्त मन्त्र की दीक्षा लेने के विचार से गुरुओं को तलाश करता हुआ, वह दूर-दूर मारा फिरने लगा। एक दिन एक सुयोग्य गुरु का उसे पता चला और वह उनके पास जा पहुँचा। वह महानुभाव दीक्षा देने के लिये तैयार न होते थे। पर जब उस मनुष्य ने बहुत प्रार्थना की और चरणों पर गिरा तो उन महानुभाव ने उसे शिष्य बना लिया। कुछ दिन के उपरान्त उसे गुप्त मंत्र बताने की तिथि नियत की गई। उस दिन उसे गायत्री मंत्र की दीक्षा दे दी और आदेश कर दिया कि इस मंत्र को गुप्त रखना, यह अलभ्य मंत्र औरों को मालूम नहीं है, तू इसका निष्ठापूर्वक जप कर ले तो बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त हो जावेंगी।

शिष्य उस मंत्र का जप करने लगा। एक दिन वह नदी किनारे गया तो देखा कि कुछ लोग गायत्री मंत्र को जोर-जोर से उच्चारण करके गा रहे थे। शिष्य को सन्देह हुआ कि इसे तो और लोग भी जानते हैं, इसमें गुप्त बात क्या है। इसी सोच विचार में वह आगे नगर में गया तो दिखा कि कितनी ही दीवारों पर गायत्री मंत्र लिखा हुआ है। वह और आगे चला तो एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर गायत्री सम्बन्धी कई पुस्तकें देखीं, जिनमें वह मंत्र छपा हुआ था। अब उसका सन्देह दृढ़ होने लगा। वह सोचने लगा यह तो मामूली मंत्र है और सब पर प्रकट है। गुरुजी ने मुझे योंही बहका दिया है। भला इससे क्या लाभ हो सकता है?

इन सन्देहों के साथ वह गुरुजी के पास पहुँचा और क्रोध पूर्वक उनसे कहने लगा कि आप ने व्यर्थ ही मुझे उलझा रखा है और एक मामूली मंत्र को गुप्त एवं रहस्यपूर्ण बताया है।

गुरु जी बड़े उदार और क्षमाशील थे। उतावले शिष्य को क्रोधपूर्वक वैसी ही उतावली का उत्तर देने की अपेक्षा उसे समझा कर सन्तोष करा देना ही उचित समझा। उन्होंने उस समय उससे कुछ न कहा और चुप हो गये। दूसरे दिन उन्होंने उस शिष्य को बुलाकर एक हीरा दिया और कहा इसे क्रमशः कुँजड़े, पंसारी, सुनार, महाजन और जौहरी के पास ले जाओ और वे जो इसका मूल्य बतावें उसे आकर मुझे बताओ। शिष्य गुरु जी की आज्ञानुसार चल दिया। पहले वह कुँजड़े के पास पहुँचा और उसे दिखाते हुए कहा इस वस्तु का क्या मूल्य दे सकते हो? कुँजड़े ने उसे देखा और कहा-काँच की गोली है, पड़ी रहेगी, बच्चे खेलते रहेंगे, इसके बदले में पाव भर साग ले जाओ। इसके बाद वह उसे पंसारी के यहाँ ले गया। पंसारी ने देखा काँच चमकदार है, तोलने के लिए बाँट अच्छा रहेगा। उसने कहा भाई, इसके बदले में एक सेर नमक ले सकते हो। शिष्य फिर आगे बढ़ा और एक सुनार के पास पहुँचा। सुनार ने देखा कोई अच्छा पत्थर है। जेवरों में नग लगाने के लिए अच्छा रहेगा। उसने कहा-इसकी कीमत 50 दे सकता हूँ। इसके बाद वह महाजन के पास पहुँचा। महाजन पहचान गया कि यह हीरा है पर यह न समझ सका किस जाति का है, तब भी उसने अपनी बुद्धि के अनुसार उसका मूल्य एक हजार रुपया लगा दिया। अन्त में शिष्य जब जौहरी के पास पहुँचा तो उसने दस हजार रुपया दाम लगाया। इन सब के उत्तरों को लेकर वह गुरु जी के पास पहुँचा और जिसने जो कीमत लगाई थी वह उन्हें कह सुनाई।

गुरु ने कहा-यही तुम्हारी संदेहों का उत्तर है। एक वस्तु को देखा तो सब ने, पर मूल्य अपनी बुद्धि के अनुसार आँका। मंत्र साधारण मालूम पड़ता है और उसे सब कोई जानते हैं, पर उसका असली मूल्य जान लेना सब के लिए संभव नहीं है। जो उसके गुप्त तत्व को जान लेता है, वही अपनी श्रद्धा के अनुसार लाभ उठा लेता है।

यथार्थ में मंत्रानुष्ठान और आध्यात्मिक क्रियाओं को स्थूल दृष्टि से देखा जाये, तो वे वैसी ही मामूली और तुच्छ प्रतीत होती हैं जैसी कि कुँजड़े को वह काँच की गोली प्रतीत हुई थी, किन्तु श्रद्धा और निष्ठा के द्वारा जिसने अपना मन जौहरी बना लिया है, उसके लिये वह साधनाएं बड़ा महत्व रखती हैं और इच्छानुसार फल भी देती है। सारा महत्व श्रद्धा और विश्वास में है। विश्वास के साथ की गई एक छोटी सी क्रिया भी विचित्र फल दिखाती है, किन्तु अविश्वास और अश्रद्धा के साथ किया हुआ अश्वमेध भी निष्फल है। यही गुप्त साधनाओं का रहस्य है।


यह शिष्य के समर्पण, उसकी आस्था श्रध्दा और स्वयं की पूर्व आराधना शक्ति पर निर्भर होता है।  



"MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  देवीदास विपुल 
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 गुरु की क्या पहचान है? आर्य टीवी से साभार गुरु कैसा हो ! गुरु की क्या पहचान है? यह प्रश्न हर धार्मिक मनुष्य के दिमाग में घूमता रहता है। क...