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Friday, March 9, 2018

अहंकार का अहंकार कवि विपुल लखनवी के उल्टे दोहे



अहंकार का अहंकार 


कवि विपुल लखनवी के उल्टे दोहे   

अहंकार को जानिये, अहंकार है मंत्र। 
अहंकार को जान लो, झूठ भये सब तंत्र॥

अहंकार ही मूल है अहंकार आकार।
अहंकार जो लिप्त हैं, वे उतरेंगे पार॥

अहंकार जो गल गया, अहंकार ही पाय। 
अहंकार बिन जीव न, ग्यानीजन समझाय॥ 

अहंकार जो पा लिया, विपुलन जीवन पार। 
तुलसी मीरा आ मिले, अहंकार अवतार॥

जग बोले अहंकार हैं, मैं बोलू अहंकार। 
सोंच सोंच का फेर है, अपना अपना यार॥

अहंकार में ढूंढकर, अहंकार को पाय। 
मूरख समझे अहंकार, अहंकार बिसराय॥

ब्रह्म भरम उपजात है, भरम ब्रह्म की भूल। 
जो बैठा जंजाल में, उसको मिलते शूल॥


यह कैसी बात है कि अहंकार को जानो इसको मानो। ये तो गलत है। मित्रों अहंकार ईगो नहीं बल्कि स्वयं की जगत हेतु पहचान है। नश्वर शरीर के साथ अपनी आत्मा की परमात्मा की पहिचान है। मन में घमंड की दूसरी विमा को भी अहंकार कहा जाता है। इसका अर्थ उस पहचान से है, जो आपके स्थूल शरीर ने धारण कर रखी है। आमतौर पर आंगल भाषा में लोग अहंकार यानी ‘ईगो’ यानी घमंड समझ लेते हैं। यह ईगो नहीं है, यह आपके स्थूल शरीर के अस्तित्व की पहचान है। 

आपकी बुद्धि तो हमेशा आपकी पहचान की ही गुलाम होती है। आप जिस चीज के साथ भी अपनी पहचान बना लेते हैं, यह उसी के इर्द-गिर्द काम करती है। लोग अपनी पहचान ऐसी चीजों के साथ स्थापित कर लेते हैं, जिन्हें उन्होंने कभी देखा भी नहीं है जैसे धन का, नाम का, शरीर की सुंदरता का गर्व , और उनके भाव इन्हीं चीज़ों से जुड़ जाते हैं। यही चीजें उनके जीवन की दिशा तय करती हैं।



हम देश के साथ भावनात्मक रूप से पहचान बनाते हैं पर जब देश न था तब मैं इस देश का हूं तो देश का झंडा, राष्ट्रीय चिह्न, राष्ट्र गान हमारे भीतर एक भाव जगाते हैं। इसमें कोई दिखावा नहीं यह वास्तविक है, क्योंकि लोग इसके लिए जान देने को भी तैयार हैंलेकिन ये सब बस एक पहचान ही तो है। आप इसे कभी भी बदल सकते हैं। आप किसी दूसरे देश के नागरिक हो गये फिर वह आपका बन सकता है। 

जैसे भारतवर्ष के सभी रहनेवाले कुछ सौ साल पहले हिंदू ही थे। पर डर और धन के लालच में अन्य धर्म स्वीकार किये तो आज हिंदू धर्म को ही भूलने और नष्ट करने की बात करने लगे। यानी जिस पल आप अपनी पहचान किसी चीज के साथ स्थापित कर लेते हैं, हमारी बुद्धि पूरी तरह से और हमेशा इस पहचान की रक्षा करती है और इसी के इर्द-गिर्द काम करती है।


अहंकार को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक पहचान आपकी बुद्धि से आती है जो आत्म तत्व को जानकर बात करती है दूसरी हमारी भावनाओं से जुड़ी होती है जो श्रीमदभगवद्गीता में हे अर्जुन जो मुझे जिस रुप में भजता है मैं उसी रुप में प्राप्त होता हूं। तुलसीदास कहते हैं “जाकि रहि भावना जैसी, प्रभु देखी तिन मूरत वैसी। आपको अपनी पहचान एक ढीले कपड़े की तरह रखनी चाहिए। ताकि जब आप इसे उतारना चाहें, आप इसे आसानी से उतार सकें।  अगर हम अपनी सोंच की रक्षा के लिए अपने आसपास काल्पनिक कवच तैयार कर लेते हैं, तो कुछ समय बाद यही काल्पनिक दीवार हमको कैद कर लेगी हम हर बात को गलत मानकर अपनी बुद्दी से बिना जाने अहंकार कह देंगे क्योकिं सामनेवाले ने हमारी सोंच के विपरीत बात की है।


जरा सोंचे जगत में आप अपना परिचय कैसे देंगे। समपत्ति की रजिस्ट्री कैसे करायेगे। बेटे बेटे की शादी में क्या आप अहंकार लिख रहे है। फिर तो भगवान श्री कृष्ण का मानव रुप में आपके लिये अहंकार बोल रहा था। लेकिन मेरे लिये उनका अहंकार ही बोल रहा था। आपकी मेरी सोंच अलग हो सकती है पर शब्द एक ही। अब बात अहम के आकार की यानी अहंकार की। जब गुरु अपने शिष्य को टीचर जो गुरु है बोलता है तुम गलत हो तो यह उसका अहंकार हो गया क्या। मां अपने बेटे को बाप अपने बेटे को बोले बेवकूफ तू मूर्ख है। यह तो मां बाप का भी अहंकार कहलायेगा क्या। 


अब दूसरा वाक्य जगत से मैं धनवान हूं। मैं 1000 लोगों का पेट पाल रहा हूं मैंने 1 लाख गायत्री जप किये। अब सुनो मैं भगवान हूं। मै ओशो हूं। मुझे ही निराकार की अनूभूति है। मंदिर गलत मस्जिद गलत है। यहां भगवान देखो क्योकि मैंने देखा। मैं कहता हूं सम्भोग से समाधि इत्यादि। यह कुछ को सही लगते है जबकिं यह नादानी पूर्ण मूर्खतापूर्ण अनजाना अहंकार है। क्योकिं यह उसने कहा जो हमें पसंद है। उसने मेरे पसंद की किताबें छपी उसके करोडो अनुयायी और तुम तो गुरु भी नहीं। मैं कहूं कि देखो आध्यात्म में शक्ति जागरण के पश्चात जो अनूभूति होती है वह अहमब्रम्हास्मि यानी मैं ही ब्रह्म हूं। एकोअहम द्व्तियोनास्ति यानी मैं एक और दूसरा कोई नहीं। सोअहम यानी वो मैं ही इस जगत में। यहां ईश्वर केवल आपको मैं क्यों बोल रहा है। यह अनुभव मैं के द्वारा क्यों करा रहा है। ज्ब मैं बोल रहा हूं कि योग में जब कुंडलनी जागकर कर सह्स्त्रसार में जाकर ब्रह्म शक्ति से मिलती है तो “अहमब्रम्हास्मि यानी मैं ही ब्रह्म हूं। एकोअहम द्व्तियोनास्ति यानी मैं एक और दूसरा कोई नहीं। सोअहम यानी वो मैं ही इस जगत में” इस भाव की अनुभूति होती है जहां जाकर साकार सगुण द्वैत वाला प्रभु कृपा मान कर और झुक जाता है भक्ति में लीन हो जाता है वहीं निराकार उपासक क्योकि कुछ मानता नहीं और बिना गुरुवाला जानता नहीं अपने को भगवान या ओशो समझने लगता है जो एक भूल है। चूंकि इस अनुभव के लोग दूसरों को भी कुछ अनुभुति करा सकते हैं तो वे लोग उसको भगवान ही मानकर घमन्ड को अंजाने में बढाते रहते हैं। पर सब यह भूल जाते है ईश वो जिसके अधीन माया। मानव हमेशा माया के अधीन। यहां तक इस अनुभुति को हमेशा अनुभव करनेवाले भी माया के अधीन रहते है। तो मेरा यानी विपुल सेन का अहंकार बोल रहा है। जब मैं अंतर्मुखी होने की किसी भी पद्दति के साधक को समझा सकता हूं साकार या निराकार, तंत्र या मंत्र जबकि अपने को भगवान कहनेवाले मूर्ख जो जापानी भाषा में ओशो जिनको साकार का योगमार्ग का धेला अनुभव नही चक्रो का पता ही नही अनुभव तो दूर की बात। अपने कार्यालय में बुद्द को पढते पढ्ते विपशना करते करते एकोअहम द्व्तियोनास्ति का अनुभव हुआ तो बन बैठे भगवान जबकि बुद्दा ने अपने को कभी भगवान नहीं कहा। यह बात न देखी न सीखी। पर वह महान क्योकि उन्होने दुकान खोली जो मेरी तनिक इच्चा नहीं।  


यदि यह बात है तो मैं जानता हूं अहंकार क्या है और मैं अहंकारी हूं। अब आप सोंचे मतलब क्या उल्टे या सीधे। मैं जानता हूं मानव योनि 8 कला की यानी 50 प्रतिशत भगवान और जानवर 25 प्रतिशत भगवान होते हैं पर कोई मानव जो खुद अपने 50 प्रतिशत को पूरा भगवान बोले उसे तो मैं पागल और मानसिक रुप से विकृत समाज को भ्रमित करनेवाला ही कहूंगा। तभी प्रभु दंड से जेल में सडकर मर गये और प्रेतयोनी में पडकर एक कमरा वो भी वातानुकूलित भी बुक करा गये। चेले षडयंत्र का या कुछ भी तर्क दे। तो कृष्न ने कभी अपने को भगवान न बोला पर हर षडयंत्र का पर्दाफाश किया। मैं तो अपने को भगवान कहनेवाले मूर्ख जो जापानी भाषा में ओशो होते हैं उनकी बखिया उधेडता ही रहूंगा। लेकिन मैं बिना गुरु बने, बिना धन लिये, किसी भी मार्ग से चाहे वह त्राटक, नाद योग, लय  योग, विपश्यना, प्रेक्षाध्यान, तंत्र मंत्र जप वाले, हठयोग मार्गी पर जागृत शक्तिवाले बिना गुरु के अनुभवी लोगों का वाचमैन बनकर मार्गदर्शन करता रहूँगा। अपने को जगद्गुरु जगतमाता कहलानेवाले भक्तों को उनकी भूल का अहसास कराने का भी प्रयास करुंगा। वैसे मेरे व्हाटअप ग्रुप “आत्म अवलोकन और योग” में लगभग सभी जाति यहां तक ईश अनुभववाले मुस्लिम, सभी परमपराओं के, जागृत कुंडलनी वाले, दिव्य अनुभववाल्र बिना गुरु के कई लोग सदस्य हैं और लाभ उठाकर अपनी साधना में लीन हैं। कलियुग की विशेषता के कारण तनिक प्रयास से मनुष्य अंतर्मुखी होकर अपने को भगवान न समझ बैठे, अपने गुरु से मिलाना। यह समझाना मेरा काम हैं।  



नोट: सिर्फ किताबी ज्ञान वाले, रट्टू शास्त्र ज्ञानियों और महापंडितो से मैं बहस होने के पहले ही अपनी हार स्वीकार करता हूं। 


ओम हरि ओम्।

विपुल सेन। नवी मुम्बई।  वेब: vipkavi.info   

"MMSTM सवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  देवीदास विपुल  

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