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Friday, August 23, 2019

श्रीमद्भग्वद्गीता में योग

श्रीमद्भग्वद्गीता में योग

 सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"


 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
  - मेल: vipkavi@gmail.com  वेब:  vipkavi.info वेब चैनलvipkavi
ब्लाग: freedhyan.blogspot.com,  फेस बुक:   vipul luckhnavi “bullet

अपनी आत्मा को पहचानना शब्दो मे नही अनुभूति कर जिसे आत्म साक्षात्कार कहते है। अब आत्मा ही परमात्मा है। यानि योग की अनुभूति। वेदान्त महावाक्य है आत्मा में परमात्मा की सायुज्यता का अनुभव ही योग है। यह योग हमे परमसत्ता का अंश है आत्मा,  यह अनुभूति देता है। जब अहम्ब्रह्मास्मि की अनुभूति होती है तो हमे अद्वैत का अनुभव होता है। कुल मिलाकर यह अनुभव कर लेना कि मैं उस परमसत्ता का अंश हूँ। उससे अलग नही। यह शरीर यह आत्मा अलग है। सुख दुख शरीर भोग रहा है मैं नही। मैं उस परमसत्ता के अनुसार ही चल रहा हूँ। वो ही सब करता है। मैं कुछ नही। यह अनुभूतिया हमे ज्ञान देती है। यही ज्ञान और अनुभव होना योग है।

श्रीमद्भग्वद्गीता में योग से सम्बधित तीन श्लोक मिलते हैं जो विधि को समझाते हैं जिनको क्रिया योग में सम्मिलित करा गया है और कुछ सीमा तक रामदेव बाबा भी इसी का अभ्यास स्वस्थ्य रहने हेतु कर रहे हैं। किंतु वह पूरा श्लोक का अनुसरण नहीं कर रहे हैं।


भगवद् गीता अध्याय 4 श्लोक 29

अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।


।।4.29।। दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।


हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी


 4.29। व्याख्या   अपाने जुह्वति ৷৷. प्राणायामपरायणाः (टिप्पणी प0 258.1) प्राणका स्थान हृदय (ऊपर) तथा अपानका स्थान गुदा (नीचे) है (टिप्पणी प0 258.2)। श्वासको बाहर निकालते समय वायुकी गति ऊपरकी ओर तथा श्वासको भीतर ले जाते समय वायुकी गति नीचेकी ओर होती है। इसलिये श्वासको बाहर निकालना प्राण का कार्य और श्वासको भीतर ले जाना अपान का कार्य है। योगीलोग पहले बाहरकी वायुको बायीं नासिका(चन्द्रनाड़ी) के द्वारा भीतर ले जाते हैं। वह वायु हृदयमें स्थित प्राणवायुको साथ लेकर नाभिसे होती हुई स्वाभाविक ही अपानमें लीन हो जाती है। इसको पूरक कहते हैं। फिर वे प्राणवायु और अपानवायु दोनोंकी गति रोक देते हैं। न तो श्वास बाहर जाता है और न श्वास भीतर ही आता है। इसको कुम्भक कहते हैं। इसके बाद वे भीतरकी वायुको दायीं नासिका(सूर्यनाड़ी) के द्वारा बाहर निकालते हैं। वह वायु स्वाभाविक ही प्राणवायुको तथा उसके पीछेपीछे अपानवायुको साथ लेकर बाहर निकलती है। यही प्राणवायुमें अपानवायुका हवन करना है। इसको रेचक कहते हैं। चार भगवन्नामसे पूरक सोलह भगवन्नामसे कुम्भक और आठ भगवन्नामसे रेचक किया जाता है।

इस प्रकार योगीलोग पहले चन्द्रनाड़ीसे पूरक फिर कुम्भक और फिर सूर्यनाड़ीसे रेचक करते हैं। इसके बाद सूर्यनाड़ीसे पूरक फिर कुम्भक और फिर चन्द्रनाड़ीसे रेचक करते हैं। इस तरह बारबार पूरककुम्भकरेचक करना प्राणायामरूप यज्ञ है।


परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे निष्कामभावपूर्वक प्राणायामके परायण होनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 258.3)।अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति नियमित आहारविहार करनेवाले साधक ही प्राणोंका प्राणोंमें हवन कर सकते हैं।

अधिक या बहुत कम भोजन करनेवाला अथवा बिलकुल भोजन न करनेवाला यह प्राणायाम नहीं कर सकता (गीता 6। 16 17)।

प्राणोंका प्राणोंमें हवन करनेका तात्पर्य है प्राणका प्राणमें और अपानका अपानमें हवन करना अर्थात् प्राण और अपानको अपनेअपने स्थानोंपर रोक देना। न श्वास बाहर निकालना और न श्वास भीतर लेना। इसे स्तम्भवृत्ति प्राणायाम भी कहते हैं। इस प्राणायामसे स्वाभाविक ही वृत्तियाँ शान्त होती हैं और पापोंका नाश हो जाता है। केवल परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्राणायाम करनेसे अन्तःकरण निर्मल हो जाता है और परमात्मप्राप्ति हो जाती है।

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है उनका अनुष्ठान करनेवाले साधकोंके लिये यहाँ सर्वेऽप्येते पद आया है। उन यज्ञोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और अविनाशी परमात्माका प्राप्ति हो जाती है।वास्तवमें सम्पूर्ण यज्ञ केवल कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये ही हैं ऐसा जाननेवाले ही यज्ञवित् अर्थात् यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले हैं। कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर परमात्माका अनुभव हो जाता है। जो लोग अविनाशी परमात्माका अनुभव करनेके लिये यज्ञ नहीं करते प्रत्युत इस लोक और परलोक (स्वर्गादि) के विनाशी भोगोंकी प्राप्तिके लिये ही यज्ञ करते हैं वे यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले नहीं हैं। कारण कि विनाशी पदार्थोंकी कामना ही बन्धनका कारण है गतागतं कामकामा लभन्ते (गीता 9। 21)।

अतः मनमें कामनावासना रखकर परिश्रमपूर्वक बड़ेबड़े यज्ञ करनेपर भी जन्ममरणका बन्धन बना रहता है मिटी न मनकी वासना नौ तत भये न नास।तुलसी केते पच मुये दे दे तन को त्रास।।विशेष बात यज्ञ करते समय अग्निमें आहुति दी जाती है। आहुति दी जानेवाली वस्तुओंके रूप पहले अलगअलग होते हैं परन्तु अग्निमें आहुति देनेके बाद उनके रूप अलगअलग नहीं रहते अपितु सभी वस्तुएँ अग्निरूप हो जाती हैं। इसी प्रकार परमात्मप्राप्तिके लिये जिन साधनोंका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है उनमें आहुति देनेका तात्पर्य यही है कि आहुति दी जानेवाली वस्तुओँकी अलग सत्ता रहे ही नहीं सब स्वाहा हो जायँ। जबतक उनकी अलग सत्ता बनी हुई है तबतक वास्तवमें उनकी आहुति दी ही नहीं गयी अर्थात् यज्ञका अनुष्ठान हुआ ही नहीं।इसी अध्यायके सोलहवें श्लोकसे भगवान् कर्मोंके तत्त्व (कर्ममें अकर्म) का वर्णन कर रहे हैं। कर्मोंका तत्त्व है कर्म करते हुए भी उनसे नहीं बँधना। कर्मोंसे न बँधनेका ही एक साधन है यज्ञ। जैसे अग्निमें डालनेपर सब वस्तुएँ स्वाहा हो जाती हैं ऐसे ही केवल लोकहितके लिये किये जानेवाले सब कर्म स्वाहा हो जाते हैं।

यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते (गीता 4। 23)।निष्कामभावपूर्वक केवल लोकहितार्थ किये गये साधारणसेसाधारण कर्म भी परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले हो जाते हैं। परन्तु सकामभावपूर्वक किये गये बड़ेसेबड़े कर्मोंसे भी परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती। कारण कि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी कामना ही बाँधनेवाली है। पदार्थ और क्रियारूप संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण मनुष्यमात्रमें पदार्थ पाने और कर्म करनेका राग रहता है कि मुझे कुछनकुछ मिलता रहे और मैं कुछनकुछ करता रहूँ। इसीको पानेकी कामना तथा करनेका वेग कहते हैं।मनुष्यमें जो पानेकी कामना रहती है वह वास्तवमें अपने अंशी परमात्माको ही पानेकी भूख है परन्तु परमात्मासे विमुख और संसारके सम्मुख होनेके कारण मनुष्य इस भूखको सांसारिक पदार्थोंसे ही मिटाना चाहता है।


सांसारिक पदार्थ विनाशी हैं और जीव अविनाशी है। अविनाशीकी भूख विनाशी पदार्थोंसे मिट ही कैसे सकती है परन्तु जबतक संसारकी सम्मुखता रहती है तबतक पानेकी कामना बनी रहती है। जबतक मनुष्यमें पानेकी कामना रहती है तबतक उसमें करनेका वेग बना रहता है। इस प्रकार जबतक पानेकी कामना और करनेका वेग बना हुआ है अर्थात् पदार्थ और क्रियासे सम्बन्ध बना हुआ है तबतक जन्ममरण नहीं छूटता। इससे छूटनेका उपाय है कुछ भी पानेकी कामना न रखकर केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको लोकसंग्रह यज्ञार्थ कर्म लोकहितार्थ कर्म आदि नामोंसे कहा गया है।केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे संसारसे सम्बन्ध छूट जाता है और असङ्गता आ जाती है। अगर केवल भगवान्के लिये कर्म किये जायँ तो संसारसे सम्बन्ध छूटकर असङ्गता तो आ ही जाती है इसके साथ एक और विलक्षण बात यह होती है कि भगवान्का प्रेम प्राप्त हो जाता है सम्बन्ध   चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक भगवान्ने कुल बारह प्रकारके यज्ञोंका वर्णन किया और तीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा की। अब भगवान् आगेके श्लोकमें यज्ञ करनेसे होनेवाले लाभ और न करनेसे होनेवाली हानि बताते हैं।

 भक्तिपाद प्रभु पाद द्वारा व्याख्या:


श्लोक 4 . 29

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेSपानं तथापरे |

प्राणापानगति रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः |

अपाने – निम्नगामी वायु में; जुह्वति – अर्पित करते हैं; प्राणम् – प्राण को; प्राणे – प्राण में; अपानम् – निम्नगामी वायु को; तथा – ऐसे ही; अपरे – अन्य; प्राण – प्राण का; अपान – निम्नगामी वायु; गती – गति को; रुद्ध्वा – रोककर; प्राण-आयाम – श्र्वास रोक कर समाधि में; परायणाः – प्रवृत्त; अपरे – अन्य; नियत – संयमित, अल्प; आहाराः – खाकर; प्राणान् – प्राणों को; प्राणेषु – प्राणों में; जुह्वति – हवन करते हैं, अर्पित करते हैं |

अन्य लोग भी हैं जो समाधि में रहने के लिए श्र्वास को रोके रहते हैं (प्राणायाम) | वे अपान में प्राण को और प्राण में अपान को रोकने का अभ्यास करते हैं और अन्त में प्राण-अपान को रोककर समाधि में रहते हैं | अन्य योगी कम भोजन करके प्राण की प्राण में ही आहुति देते हैं |

 

 तात्पर्य


श्र्वास को रोकने की योगविधि प्राणायाम कहलाती है | प्रारम्भ में हठयोग के विविध आसनों की सहायता से इसका अभ्यास किया जाता है | ये सारी विधियाँ इन्द्रियों को वश में करने तथा आत्म-साक्षात्कार की प्रगति के लिए संस्तुत की जाती हैं | इस विधि में शरीर के भीतर वायु को रोका जाता है जिससे वायु की दिशा उलट सके | अपान वायु निम्नगामी (अधोमुखी) है और प्राणवायु उर्ध्वगामी है | प्राणायाम में योगी विपरीत दिशा में श्र्वास लेने का तब तक अभ्यास करता है जब तक दोनों वायु उदासीन होकर पूरक अर्थात् सम नहीं हो जातीं | जब अपान वायु को प्राणवायु में अर्पित कर दिया जाता है तो इसे रेचक कहते हैं | जब प्राण तथा अपां वायुओं को पूर्णतया रोक दिया जाया है तो इसे कुम्भक योग कहते हैं | कुम्भक योगाभ्यास द्वारा मनुष्य आत्म-सिद्धि के लिए जीवन अवधि बढ़ा सकता है | बुद्धिमान योगी एक ही जीवनकाल में सिद्धि प्राप्त करने का इच्छुक रहता है, वह दूसरे जीवन की प्रतीक्षा नहीं करता | कुम्भक योग के अभ्यास से योगी जीवन अवधि को अनेक वर्षों के लिए बढ़ा सकता है | किन्तु भगवान् की दिव्य प्रेमभक्ति में स्थित रहने के कारण कृष्णभावनाभावित मनुष्य स्वतः इन्द्रियों का नियंता (जितेन्द्रिय) बन जाता है | उसकी इन्द्रियाँ कृष्ण की सेवा में तत्पर रहने के कारण अन्य किसी कार्य में प्रवृत्त होने का अवसर ही नहीं पातीं | फलतः जीवन के अन्त में उसे स्वतः भगवान् कृष्ण के दिव्य पद पर स्थानान्तरित कर दिया जाता है, अतः वह दीर्घजीवी बनने का प्रयत्न नहीं करता |


वह तुरंत मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है, जैसा कि भगवद्गीता में (१४.२६) कहा गया है –


मां च योSव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते |

स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ||


“जो व्यक्ति भगवान् की निश्छल भक्ति में प्रवृत्त होता है वह प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और तुरन्त आध्यात्मिक पद को प्राप्त होता है |”


कृष्णभावनाभावित व्यक्ति दिव्य अवस्था से प्रारम्भ करता है और निरन्तर उसी चेतना में रहता है | अतः उसका पतन नहीं होता और अन्ततः वह भगवद्धाम को जाता है | कृष्ण प्रसादम् को खाते रहने में स्वतः कम खाने की आदत पड़ जताई है | इन्द्रियनिग्रह के मामले में कम भोजन करना (अल्पाहार) अत्यन्त लाभप्रद होता है और इन्द्रियनिग्रह के बिना भाव-बन्धन से निकल पाना सम्भव नहीं है |


भगवद् गीता अध्याय 5 श्लोक 27

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः| प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ|

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी (भगवद् गीता 5.27)


।।5.27।।बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने वशमें हैं जो मोक्षपरायण है तथा जो इच्छा भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है वह मुनि सदा मुक्त ही है। हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद


।।5.27।। बाह्य विषयों को बाहर ही रखकर नेत्रों की दृष्टि को भृकुटि के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी


 5.27।। व्याख्या   स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान् परमात्माके सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़ देनेका तात्पर्य है कि मनसे बाह्य विषयोंका चिन्तन न करे।बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धका त्याग कर्मयोगमें सेवाके द्वारा और ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा किया जाता है। यहाँ भगवान् ध्यानयोगके द्वारा बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेदकी बात कह रहे हैं। ध्यानयोगमें एकमात्र परमात्माका ही चिन्तन होनेसे बाह्य पदार्थोंसे विमुखता हो जाती है।वास्तवमें बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं। बाधक है इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध। इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें ही उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है।चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः यहाँ भ्रुवोः अन्तरे पदोंसे दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीचमें रखना अथवा दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखना (गीता 6। 13) ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।ध्यानकालमें नेत्रोंको सर्वथा बंद रखनेसे लयदोष अर्थात् निद्रा आनेकी सम्भावना रहती है और नेत्रोंको सर्वथा खुला रखनेसे (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आनेकी सम्भावना रहती है। इन दोनों प्रकारके दोषोंको दूर करनेके लिये आधे मुँदे हुए नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीच स्थापित करनेके लिये कहा गया है।प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ नासिकासे बाहर निकलनेवाली वायुको प्राण और नासिकाके भीतर जानेवाली वायुको अपान कहते हैं।प्राणवायुकी गति दीर्घ और अपानवायुकी गति लघु होती है। इन दोनोंको सम करनेके लिये पहले बायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर दायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। फिर दायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर बायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। इन सब क्रियाओंमें बराबर समय लगना चाहिये। इस प्रकार लगातार अभ्यास करते रहनेसे प्राण और अपानवायुकी गति सम शान्त और सूक्ष्म हो जाती है। जब नासिकाके बाहर और भीतर तथा कण्ठादि देशमें वायुके स्पर्शका ज्ञान न हो तब समझना चाहिये कि प्राणअपानकी गति सम हो गयी है। इन दोनोंकी गति सम होनेपर (लक्ष्य परमात्मा रहनेसे) मनसे स्वाभाविक ही परमात्माका चिन्तन होने लगता है। ध्यानयोगमें इस प्राणायामकी आवश्यकता होनेसे ही इसका उपर्युक्त पदोंमें उल्लेख किया गया है।यतेन्द्रियमनोबुद्धिः प्रत्येक मनुष्यमें एक तो इन्द्रियोंका ज्ञान रहता है और एक बुद्धिका ज्ञान। इन्द्रियाँ और बुद्धि दोनोंके बीचमें मनका निवास है। मनुष्यको देखना यह है कि उसके मनपर इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है या बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है अथवा आंशिकरूपसे दोनोंके ज्ञानका प्रभाव है। इन्द्रियोंके ज्ञानमें संयोग का प्रभाव पड़ता है और बुद्धिके ज्ञानमें परिणाम का। जिन मनुष्योंके मनपर केवल इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है वे संयोगजन्य सुखभोगमें ही लगे रहते हैं और जिनके मनपर बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है वे (परिणामकी ओर दृष्टि रहनेसे) सुखभोगका त्याग करनेमें समर्थ हो जाते हैं न तेषु रमते बुधः (गीता 5। 22)।प्रायः साधकोंके मनपर आंशिकरूपसे इन्द्रियों और बुद्धि दोनोंके ज्ञानका प्रभाव रहता है। उनके मनमें इन्द्रियों तथा बुद्धिके ज्ञानका द्वन्द्व चलता रहता है। इसलिये वे अपने विवेकको महत्त्व नहीं दे पाते और जो करना चाहते हैं उसे कर भी नहीं पाते। यह द्वन्द्व ही ध्यानमें बाधक है। अतः यहाँ मन बुद्धि तथा इन्द्रियोंको वशमें करनेका तात्पर्य है कि मनपर केवल बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव रह जाय इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव सर्वथा मिट जाय।मुनिर्मोक्षपरायणः परमात्मप्राप्ति करना ही जिनका लक्ष्य है ऐसे परमात्मस्वरूपका मनन करनेवाले साधकको यहाँ मोक्षपरायणः कहा गया है। परमात्मतत्त्व सब देश काल आदिमें परिपूर्ण होनेके कारण सदासर्वदा सबको प्राप्त ही है। परन्तु दृढ़ उद्देश्य न होनेके कारण ऐसे नित्यप्राप्त तत्त्वकी अनुभूतिमें देरी हो रही है। यदि एक दृढ़ उद्देश्य बन जाय तो तत्त्वकी अनुभूतिमें देरीका काम नहीं है। वास्तवमें उद्देश्य पहलेसे ही बनाबनाया है क्योंकि परमात्मप्राप्तिके लिये ही यह मनुष्यशरीर मिला है। केवल इस उद्देश्यको पहचानना है। जब साधक इस उद्देश्यको पहचान लेता है तब उसमें परमात्मप्राप्तिकी लालसा उत्पन्न हो जाती है। यह लालसा संसारकी सब कामनाओंको मिटाकर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव करा देती है। अतः परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको पहचाननेके लिये ही यहाँ मोक्षपरायणः पदका प्रयोग हुआ है।कर्मयोग सांख्ययोग ध्यानयोग भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्यकी बड़ी आवश्यकता है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा तो साधनसे सिद्धि कैसे मिलेगी इसलिये यहाँ मोक्षपरायणः पदसे ध्यानयोगमें दृढ़ निश्चयकी आवश्यकता बतायी गयी है।विगतेच्छाभयक्रोधो यः अपनी इच्छाकी पूर्तिमें बाधा देनेवाले प्राणीको अपनेसे सबल माननेपर उससे भय होता है कि निर्बल माननेसे उसपर क्रोध आता है। ऐसे ही जीनेकी इच्छा रहनेपर मृत्युसे भय होता है और दूसरोंसे अपनी इच्छापूर्ति करवाने तथा दूसरोंपर अपना अधिकार जमानेकी इच्छासे क्रोध होता है। अतः भय और क्रोध होनेमें इच्छा ही मुख्य है। यदि मनुष्यमें इच्छापूर्तिका उद्देश्य न रहे प्रत्युत एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रह जाय तो भयक्रोधसहित इच्छाका सर्वथा अभाव हो जाता है। इच्छाका सर्वथा अभाव होनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। कारण कि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छासे ही मनुष्य जन्ममरणरूप बन्धनमें पड़ताहै। साधकको गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि क्या वस्तुओंकी इच्छासे वस्तुएँ मिल जाती हैं और क्या जीनेकी इच्छासे मृत्युसे बच जाते हैं वास्तविकता तो यह है कि न तो वस्तुओंकी इच्छा पूरी कर सकते हैं और न मृत्युसे बच सकते हैं। इसलिये यदि साधकका यह दृढ़ निश्चय हो जाय कि मुझे एक परमात्मप्राप्तिके सिवाय कुछ नहीं चाहिये तो वह वर्तमानमें ही मुक्त हो सकता है। परन्तु यदि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छा रहेगी तो इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और मृत्युके भयसे भी बचाव नहीं होगा तथा क्रोधसे भी छुटकारा नहीं होगा। इसलिये मुक्त होनेके लिये इच्छारहित होना आवश्यक है।यदि वस्तु मिलनेवाली है तो इच्छा किये बिना भी मिलेगी और यदि वस्तु नहीं मिलनेवाली है तो इच्छा करनेपर भी नहीं मिलेगी। अतः वस्तुका मिलना या न मिलना इच्छाके अधीन नहीं है प्रत्युत किसी विधानके अधीन है। जो वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है उसकी इच्छाको छोड़नेमें क्या कठिनाई है यदि वस्तुकी इच्छा पूरी होती हो तो उसे पूरी करनेका प्रयत्न करते और यदि जीनेकी इच्छा पूरी होती हो तो मृत्युसे बचनेका प्रयत्न करते। परन्तु इच्छाके अनुसार न तो सब वस्तुएँ मिलती हैं और न मृत्युसे बचाव ही होता है। यदि वस्तुओंकी इच्छा न रहे तो जीवन आनन्दमय हो जाता है और यदि जीनेकी इच्छा न रहे तो मृत्यु भी आनन्दमयी हो जाती है। जीवन तभी कष्टमय होता है जब वस्तुओंकी इच्छा करते हैं और मृत्यु तभी कष्टमयी होती है जब जीनेकी इच्छा करते हैं। इसलिये जिसने वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दिया है वह जीतेजी मुक्त हो जाता है अमर हो जाता है।सदा मुक्त एव सः उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही बन्धन है। इस माने हुए सम्बन्धका सर्वथा त्याग करना ही मुक्ति है। जो मुक्त हो गया है उसपर किसी भी घटना परिस्थिति निन्दास्तुति अनुकूलताप्रतिकूलता जीवनमरण आदिका किञ्चिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता।सदा मुक्त एव पदोंका तात्पर्य है कि वास्तवमें साधक स्वरूपसे सदा मुक्त ही है। केवल उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण उसे अपने मुक्त स्वरूपका अनुभव नहीं हो रहा है। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिटते ही स्वतःसिद्ध मुक्तिका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   भगवान्ने योगनिष्ठा और सांख्यनिष्ठाका वर्णन करके दोनोंके लिये उपयोगी ध्यानयोगका वर्णन किया। अब सुगमतापूर्वक कल्याण करनेवाली भगवन्निष्ठाका वर्णन करते हैं।

भगवद् गीता अध्याय 5 श्लोक 28

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 5.28)


।।5.27।।बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने वशमें हैं जो मोक्षपरायण है तथा जो इच्छा भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है वह मुनि सदा मुक्त ही है। हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।5.28।। जिस पुरुष की इन्द्रियाँ मन और बुद्धि संयत हैं ऐसा मोक्ष परायण मुनि इच्छा भय और क्रोध से रहित है वह सदा मुक्त ही है।।


हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी


 5.28।। व्याख्या   स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान् परमात्माके सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़ देनेका तात्पर्य है कि मनसे बाह्य विषयोंका चिन्तन न करे।बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धका त्याग कर्मयोगमें सेवाके द्वारा और ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा किया जाता है। यहाँ भगवान् ध्यानयोगके द्वारा बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेदकी बात कह रहे हैं। ध्यानयोगमें एकमात्र परमात्माका ही चिन्तन होनेसे बाह्य पदार्थोंसे विमुखता हो जाती है।वास्तवमें बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं। बाधक है इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध। इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें ही उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है।

चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः यहाँ भ्रुवोः अन्तरे पदोंसे दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीचमें रखना अथवा दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखना (गीता 6। 13) ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।ध्यानकालमें नेत्रोंको सर्वथा बंद रखनेसे लयदोष अर्थात् निद्रा आनेकी सम्भावना रहती है और नेत्रोंको सर्वथा खुला रखनेसे (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आनेकी सम्भावना रहती है। इन दोनों प्रकारके दोषोंको दूर करनेके लिये आधे मुँदे हुए नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीच स्थापित करनेके लिये कहा गया है।प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ नासिकासे बाहर निकलनेवाली वायुको प्राण और नासिकाके भीतर जानेवाली वायुको अपान कहते हैं।प्राणवायुकी गति दीर्घ और अपानवायुकी गति लघु होती है। इन दोनोंको सम करनेके लिये पहले बायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर दायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। फिर दायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर बायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। इन सब क्रियाओंमें बराबर समय लगना चाहिये। इस प्रकार लगातार अभ्यास करते रहनेसे प्राण और अपानवायुकी गति सम शान्त और सूक्ष्म हो जाती है। जब नासिकाके बाहर और भीतर तथा कण्ठादि देशमें वायुके स्पर्शका ज्ञान न हो तब समझना चाहिये कि प्राणअपानकी गति सम हो गयी है। इन दोनोंकी गति सम होनेपर (लक्ष्य परमात्मा रहनेसे) मनसे स्वाभाविक ही परमात्माका चिन्तन होने लगता है। ध्यानयोगमें इस प्राणायामकी आवश्यकता होनेसे ही इसका उपर्युक्त पदोंमें उल्लेख किया गया है।यतेन्द्रियमनोबुद्धिः प्रत्येक मनुष्यमें एक तो इन्द्रियोंका ज्ञान रहता है और एक बुद्धिका ज्ञान। इन्द्रियाँ और बुद्धि दोनोंके बीचमें मनका निवास है। मनुष्यको देखना यह है कि उसके मनपर इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है या बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है अथवा आंशिकरूपसे दोनोंके ज्ञानका प्रभाव है। इन्द्रियोंके ज्ञानमें संयोग का प्रभाव पड़ता है और बुद्धिके ज्ञानमें परिणाम का। जिन मनुष्योंके मनपर केवल इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है वे संयोगजन्य सुखभोगमें ही लगे रहते हैं और जिनके मनपर बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है वे (परिणामकी ओर दृष्टि रहनेसे) सुखभोगका त्याग करनेमें समर्थ हो जाते हैं।

न तेषु रमते बुधः (गीता 5। 22)।प्रायः साधकोंके मनपर आंशिकरूपसे इन्द्रियों और बुद्धि दोनोंके ज्ञानका प्रभाव रहता है। उनके मनमें इन्द्रियों तथा बुद्धिके ज्ञानका द्वन्द्व चलता रहता है। इसलिये वे अपने विवेकको महत्त्व नहीं दे पाते और जो करना चाहते हैं उसे कर भी नहीं पाते। यह द्वन्द्व ही ध्यानमें बाधक है। अतः यहाँ मन बुद्धि तथा इन्द्रियोंको वशमें करनेका तात्पर्य है कि मनपर केवल बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव रह जाय इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव सर्वथा मिट जाय।


मुनिर्मोक्षपरायणः परमात्मप्राप्ति करना ही जिनका लक्ष्य है ऐसे परमात्मस्वरूपका मनन करनेवाले साधकको यहाँ मोक्षपरायणः कहा गया है। परमात्मतत्त्व सब देश काल आदिमें परिपूर्ण होनेके कारण सदासर्वदा सबको प्राप्त ही है। परन्तु दृढ़ उद्देश्य न होनेके कारण ऐसे नित्यप्राप्त तत्त्वकी अनुभूतिमें देरी हो रही है। यदि एक दृढ़ उद्देश्य बन जाय तो तत्त्वकी अनुभूतिमें देरीका काम नहीं है। वास्तवमें उद्देश्य पहलेसे ही बनाबनाया है क्योंकि परमात्मप्राप्तिके लिये ही यह मनुष्यशरीर मिला है। केवल इस उद्देश्यको पहचानना है। जब साधक इस उद्देश्यको पहचान लेता है तब उसमें परमात्मप्राप्तिकी लालसा उत्पन्न हो जाती है। यह लालसा संसारकी सब कामनाओंको मिटाकर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव करा देती है। अतः परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको पहचाननेके लिये ही यहाँ मोक्षपरायणः पदका प्रयोग हुआ है।कर्मयोग सांख्ययोग ध्यानयोग भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्यकी बड़ी आवश्यकता है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा तो साधनसे सिद्धि कैसे मिलेगी इसलिये यहाँ मोक्षपरायणः पदसे ध्यानयोगमें दृढ़ निश्चयकी आवश्यकता बतायी गयी है।विगतेच्छाभयक्रोधो यः अपनी इच्छाकी पूर्तिमें बाधा देनेवाले प्राणीको अपनेसे सबल माननेपर उससे भय होता है कि निर्बल माननेसे उसपर क्रोध आता है। ऐसे ही जीनेकी इच्छा रहनेपर मृत्युसे भय होता है और दूसरोंसे अपनी इच्छापूर्ति करवाने तथा दूसरोंपर अपना अधिकार जमानेकी इच्छासे क्रोध होता है।

अतः भय और क्रोध होनेमें इच्छा ही मुख्य है। यदि मनुष्यमें इच्छापूर्तिका उद्देश्य न रहे प्रत्युत एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रह जाय तो भयक्रोधसहित इच्छाका सर्वथा अभाव हो जाता है। इच्छाका सर्वथा अभाव होनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। कारण कि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छासे ही मनुष्य जन्ममरणरूप बन्धनमें पड़ताहै। साधकको गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि क्या वस्तुओंकी इच्छासे वस्तुएँ मिल जाती हैं और क्या जीनेकी इच्छासे मृत्युसे बच जाते हैं वास्तविकता तो यह है कि न तो वस्तुओंकी इच्छा पूरी कर सकते हैं और न मृत्युसे बच सकते हैं। इसलिये यदि साधकका यह दृढ़ निश्चय हो जाय कि मुझे एक परमात्मप्राप्तिके सिवाय कुछ नहीं चाहिये तो वह वर्तमानमें ही मुक्त हो सकता है। परन्तु यदि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छा रहेगी तो इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और मृत्युके भयसे भी बचाव नहीं होगा तथा क्रोधसे भी छुटकारा नहीं होगा। इसलिये मुक्त होनेके लिये इच्छारहित होना आवश्यक है।यदि वस्तु मिलनेवाली है तो इच्छा किये बिना भी मिलेगी और यदि वस्तु नहीं मिलनेवाली है तो इच्छा करनेपर भी नहीं मिलेगी।

अतः वस्तुका मिलना या न मिलना इच्छाके अधीन नहीं है प्रत्युत किसी विधानके अधीन है। जो वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है उसकी इच्छाको छोड़नेमें क्या कठिनाई है यदि वस्तुकी इच्छा पूरी होती हो तो उसे पूरी करनेका प्रयत्न करते और यदि जीनेकी इच्छा पूरी होती हो तो मृत्युसे बचनेका प्रयत्न करते। परन्तु इच्छाके अनुसार न तो सब वस्तुएँ मिलती हैं और न मृत्युसे बचाव ही होता है। यदि वस्तुओंकी इच्छा न रहे तो जीवन आनन्दमय हो जाता है और यदि जीनेकी इच्छा न रहे तो मृत्यु भी आनन्दमयी हो जाती है। जीवन तभी कष्टमय होता है जब वस्तुओंकी इच्छा करते हैं और मृत्यु तभी कष्टमयी होती है जब जीनेकी इच्छा करते हैं। इसलिये जिसने वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दिया है वह जीतेजी मुक्त हो जाता है अमर हो जाता है।सदा मुक्त एव सः उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही बन्धन है। इस माने हुए सम्बन्धका सर्वथा त्याग करना ही मुक्ति है। जो मुक्त हो गया है उसपर किसी भी घटना परिस्थिति निन्दास्तुति अनुकूलता प्रतिकूलता जीवनमरण आदिका किञ्चिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता।सदा मुक्त एव पदोंका तात्पर्य है कि वास्तवमें साधक स्वरूपसे सदा मुक्त ही है। केवल उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण उसे अपने मुक्त स्वरूपका अनुभव नहीं हो रहा है। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिटते ही स्वतःसिद्ध मुक्तिका अनुभव हो जाता है।

MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
ब्लाग :  https://freedhyan.blogspot.com/


इस ब्लाग पर प्रकाशित साम्रगी अधिकतर इंटरनेट के विभिन्न स्रोतों से साझा किये गये हैं। जो सिर्फ़ सामाजिक बदलाव के चिन्तन हेतु ही हैं। कुलेखन साम्रगी लेखक के निजी अनुभव और विचार हैं। अतः किसी की व्यक्तिगत/धार्मिक भावना को आहत करना, विद्वेष फ़ैलाना हमारा उद्देश्य नहीं है। इसलिये किसी भी पाठक को कोई साम्रगी आपत्तिजनक लगे तो कृपया उसी लेख पर टिप्पणी करें। आपत्ति उचित होने पर साम्रगी सुधार/हटा दिया जायेगा।

शक्तिपात बनाम क्रिया योग (संशोधित लेख)

शक्तिपात बनाम क्रिया योग (संशोधित लेख)

 सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"


 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
मो.  09969680093
  - मेल: vipkavi@gmail.com  वेब:  vipkavi.info वेब चैनलvipkavi
ब्लाग: freedhyan.blogspot.com,  फेस बुक:   vipul luckhnavi “bullet

यदि योग को क्रमवार समझा जाये। तो सबसे पहले वेदांत ने साधारण रूप में समझाया। जब किसी भी अंतर्मुखी विधि* को करते करते " (तुम्हारी) आत्मा में परमात्मा की एकात्मकता का अनुभव हो" तो समझो योग हुआ। मेरे विचार से जब "द्वैत से अद्वैत का अनुभव हो तो समझो योग" हुआ।


अपनी आत्मा को पहचानना शब्दो मे नही अनुभूति कर जिसे आत्म साक्षात्कार कहते है। अब आत्मा ही परमात्मा है। यानि योग की अनुभूति। वेदान्त महावाक्य है आत्मा में परमात्मा की सायुज्यता का अनुभव ही योग है। यह योग हमे परमसत्ता का अंश है आत्मा,  यह अनुभूति देता है। जब अहम्ब्रह्मास्मि की अनुभूति होती है तो हमे अद्वैत का अनुभव होता है। कुल मिलाकर यह अनुभव कर लेना कि मैं उस परमसत्ता का अंश हूँ। उससे अलग नही। यह शरीर यह आत्मा अलग है। सुख दुख शरीर भोग रहा है मैं नही। मैं उस परमसत्ता के अनुसार ही चल रहा हूँ। वो ही सब करता है। मैं कुछ नही। यह अनुभूतिया हमे ज्ञान देती है। यही ज्ञान और अनुभव होना योग है।


अपने व्यक्तिगत अनुभवों, जो मैंनें ब्लाग पर समय समय पर लिखें हैं। विभिन्न दीक्षा विधियों का अध्ययन किया तो मुझे अपनी “शक्तिपात दीक्षा परम्परा”  के अतिरिक्त महाअवतार बाबा के शिष्य लाहिडी महाशय द्वारा प्रणित “क्रिया योग” ही प्रमुख लगे। यद्यपि कलियुग में भक्ति योग ही सबसे आसान सस्ता सुंदर और टिकाऊ है किंतु इसमें समय अधिक लग सक्ता है। यदि पूर्व जन्म की साधनायें हों तो यह जल्दी भी घटित  हो जाता है। अत: मात्र शक्तिपात  और क्रिया योग पर ही चर्चा करूंगा।


उनके अनुसार मैंनें कुछ निष्कर्ष निकाले हैं।


1.    शक्तिपात अंतिम दीक्षा है किंतु इसे सोच समझ कर ही प्रदान करना चाहिये। कारण यह साधक को आलसी बना सकती है। क्योकिं जिसके लिये आदमी युगों तक तमाम साधनायें करता है वह सहज ही फलित हो जाती हैं। क्योकिं इसमें गुरू अपने तप से संचित साधना संचित शक्ति से शिष्य की कुंडलनी ही जागृत कर देता है। जिसमें शिष्य को मात्र अपनी दीक्षा में लिये गये कम्बल आसन पर मात्र बैठना होता है बाकी काम गुरू शक्ति द्वारा जागृत कुंडलनी करती है। जो स्वत: क्रिया के माध्यम से पूर्व संचित संस्कारों को भीतर से निकाल कर क्रिया के माध्यम से बाहर फेंकती है। यानि पातांजलि के दिवतीय सूत्र “चित्त वृत्ति निरोध:” चित्त में वृत्ति का निरोध करने की दिशा में कदम बढाती है। 

 

आप यह जानें कि जब इस परम्परा को आगे बढाने हेतु, आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व स्वामी गंगाधर तीर्थ जी महाराज ने अपने एक मात्र शिष्य स्वामी नरायणदेव तीर्थ जी महाराज को शक्तिपात किया तो उन्होने बताया कि उस समय मात्र चार ही ऋषि पूरे विश्व में हैं जो शक्तिपात कर सकते हैं। आज यह संख्या अधिक से अधिक पचास के लगभग ही होगी। अब आप इसका महत्व समझ लें।
यहां तक इसकी गुरू आरती की कुछ पंक्तियों से भी स्पष्ट होता है।
दृष्टिपात संकल्प मात्र से जगती कुण्डलनी।

षट् चक्रों को वेध उर्ध्व गति प्राणों की होती।

ब्रह्म ज्ञान कर प्राप्त छूट भव बंधन से जावे।

 

बात सही भी है मेरे वाट्सप ग्रुप “आत्म अवलोकन और योग” के माध्यम से जिन किसी को भी शक्तिपात दीक्षा हुई है वे आश्चर्य चकित एवं अचम्भित हैं। स्वत: क्रिया रूप में किसी का आसन उठ गया यह अनुभुति हुई तो किसी का सूक्ष्म शरीर बाहर निकल कर अंतरिक्ष में घूमने लगा तो किसी को अन्य भाषायें स्वत: निकलने लगीं। किसी को देव दर्शन सहित अनेकों विचित्र करनेवाले अनुभव होने लगे।
मैंने शक्तिपात पर व स्वत: क्रिया पर कई लेख ब्लाग पर दिये हैं। जो आप पाठक देख सकते हैं।

2.    वहीं क्रिया योग में शिष्य को स्वयं परिश्रम करके कई अवस्थाओं से गुजरना होता है। लाहिडी महाशय ने चार चर्ण बना दिये। मार्शल गोवोंदन ने तीन सोपान बना दिये। वास्तव में यह पूरा का पूरा पातांजलि का अष्टांग योग से भरा है जिसमें प्राणायाम और आसनों की भरमार रहती है। कोई एक ही इन सभी चरणों को पार कर पाता है।


आधुनिक समय में महावतार बाबाजी के शिष्य लाहिरी महाशय के द्वारा 1861 के आसपास पुनर्जीवित किया गया और परमहंस योगानन्द की पुस्तक ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी (एक योगी की आत्मकथा) के माध्यम से जन सामान्य में प्रसारित हुआ।  उनके वंशज शिवेंदू लाहिडी भी क्रिया योग के शिक्षक हैं।


नवीनतम इतिहास में  हिमालय पर्वत पर स्थित बद्रीनाथ में सन् 1954 और 1955 में महावतार बाबाजी ने महान योगी एस. ए. ए. रमय्या को इस तकनीक की दीक्षा दी। 1983 में योगी रमय्या ने अपने शिष्य मार्शल गोविन्दन को 144 क्रियाओं के अधिकृत शिक्षक बनने से पहले उन्हें अनेक कठोर नियमों का पालन करने को कहा। 1988 में मार्शल गोविन्दन लोगों को क्रिया योग में दीक्षा देना शुरू करें। एम. गोविंदन सत्चिदानन्द को सन् 2014 में सम्मानित "पतंजलि पुरस्कार" दिया गया है।

3.    क्रिया योग दीक्षा में शरीर को युवा और पूर्ण रुपेण स्वस्थ्य होना चाहिये। शक्तिपात में यह बंधन नहीं है।

4.    शक्तिपात दीक्षा में शिष्य सीधे सीधे क्रिया योग के तीसरे चरण (लाहिडी महाशय) या एम. गोविंदन के दूसरे सोपान में सीधे ही पहुंच जाता है। लाहिडी महाराज ने चार चरण अर्चना, जप, ध्यान और प्राणायाम बताये हैं। वहीं मार्शल जी ने छह बतायें हैं।

वैसे मैंनें यह जाना कि मैं शक्तिपात दीक्षा के पहले मंत्र जप करता था तो क्रिया योग के चरण भी करता था। मतलब प्राणायाम के साथ मंत्र जप करता हुआ ध्यान लगाता था। उसी का परिणाम हुआ कि मुझे देव दर्शन के साथ मां काली द्वारा दीक्षा अनुभुति हुई और मुझे शक्तिपात दीक्षा में वर्णित भयंकर क्रियायें आरम्भ हुई किंतु मेरा पापी शरीर उसको सम्भाल न सका और मैं मरणासन्न स्थित में गुरू के लिये भटकता हुआ मां की कृपा से स्वप्न और ध्यान के माध्यम से अपनी शक्तिपात परम्परा में पहुंचा जहां मुझे सम्भाला गया।

इससे यह स्पष्ट होता है कि क्रिया योग को शक्तिपात ही नियंत्रित कर सकता है। मतलब साफ है कि शक्तिपात परम्परा ही सर्वश्रेष्ठ और अंतिम है। क्रिया योग का शिष्य भी क्रिया करते करते स्वत: क्रिया योग यानि शक्तिपात में पहुंचता है।


MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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Thursday, August 22, 2019

क्या, कब और कैसे है जन्माष्टमी 2019

 

क्या, कब और कैसे है जन्माष्टमी 2019

 सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"


 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,

 

हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस साल भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कब मनाई जाए, व्रत कब किया जाए, इसे लेकर पंचांग भेद हैं। कुछ पंचांग में 23 अगस्त को और कुछ में 24 अगस्त को जन्माष्टमी की तिथि बताई गई है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था और 23 अगस्त को ये दोनों योग रहेंगे। जबकि श्रीकृष्ण की जन्म स्थली मथुरा में 24 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जाएगी।


स्मार्त संप्रदाय के मंदिरों में, साधु-संन्यासी, शैव संप्रदाय शुक्रवार यानी 23 अगस्त को, जबकि वैष्णव संप्रदाय के मंदिरों में शनिवार यानी 24 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। स्मार्त संप्रदाय यानी जो लोग पंचदेवों की पूजा करते हैं। शैव संप्रदाय वाले शिवजी को प्रमुख मानते हैं। विष्णु के उपासक या विष्णु के अवतारों को मानने वाले वैष्णव कहलाते हैं। जन्माष्टमी को लेकर पंचांग भेद है, क्योंकि 23 अगस्त को उदया तिथि में रोहिणी नक्षत्र नहीं रहेगा, 24 अगस्त को अष्टमी तिथि नहीं है। श्रीकृष्ण का जन्म इन्हीं दोनों योग में हुआ था।

 

23 अगस्त को जन्माष्टमी मनाने के तर्क


भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के योग में हुआ था। शुक्रवार, 23 अगस्त को अष्टमी तिथि रहेगी और इसी तारीख की रात में 11.56 बजे से रोहिणी नक्षत्र शुरू हो जाएगा, इस वजह से 23 अगस्त की रात जन्माष्टमी मनाना ज्यादा शुभ रहेगा। भक्तों को 23 अगस्त को ही श्रीकृष्ण के लिए व्रत-उपवास और पूजा-पाठ करना चाहिए। अष्टमी तिथि 24 अगस्त को सूर्योदय काल में रहेगी, लेकिन दिन में तिथि बदल जाएगी। ये दिन अष्टमी-नवमी तिथि से युक्त रहेगा। इसलिए 24 अगस्त को जन्माष्टमी मनाना उचित नहीं होगा।

 

उज्जैन के गोपाल मंदिर में 23 अगस्त की रात मनेगा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव


उज्जैन के प्राचीन गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी पर्व 23 अगस्त की रात 12 बजे मनाया जाएगा। पुजारी अर्पित जोशी के अनुसार 24 अगस्त को नंद उत्सव मनेगा। पूरे दिन भजन-कीर्तन और अन्य कार्यक्रम होंगे।

 

मथुरा में 24 अगस्त को मनाई जाएगी जन्माष्टमी


श्रीकृष्ण की जन्म स्थली मथुरा में इस साल 24 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। 24 तारीख को ही यहां के सभी मंदिरों में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनेगा। इस संबंध में मथुरा के ज्योतिषियों का मानना है कि 24 अगस्त को सूर्योदय के समय अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग रहेगा। इस वजह से 24 अगस्त को जन्माष्टमी मनाना शुभ रहेगा।

 

जन्माष्टमी पर क्या करें

व्रत-पूजन कैसे करें 
1. उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।

2. उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएंं।
3. पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें।

4. इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें-


ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥


5. अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें।

6. तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
7. मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो।

8. इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें।

पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः लेना चाहिए।

9. फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें-


'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।'
 

10. अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रतजगा करें।


नहीं तो इस दिन सुबह जल्दी उठें और स्नान के बाद में श्रीकृष्ण के मंदिर जाएं और मोर पंख चढ़ाएं। भगवान श्रीकृष्ण को पीले वस्त्र चढ़ाएं। मंत्र कृं कृष्णाय नम: का जाप 108 बार करें। दक्षिणावर्ती शंख से लड्डू गोपाल का अभिषेक करें। गौमाता की सेवा करें। किसी गौशाला में धन का और हरी घास का दान करें।

 

MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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Monday, August 19, 2019

राम नाम की प्यास

 राम नाम की प्यास


विपुल लखनवी। नवी मुंबई। 

9969680093

  कुछ समय न तेरे पास।

तुझे न राम नाम की  प्यास।।   

बहुत पछतायेगा।

अंत जब आयेगा॥ 


तू कितना मचा ले शोर।

हुई न तेरी अभी भोर।। 

बहुत पछतायेगा।।

अंत जब आयेगा॥ 


तू क्या है यह न जाने।  

न अपने को ही पहिचाने॥

हाथ क्या पायेगा।

अंत जब आयेगा॥ 


तुझे न मॉनव रूप ज्ञान।

मिथ्य माया का अभिमान।।

व्यर्थ रह जायेगा॥

अंत जब आयेगा॥ 


कर डाली  इकठ्ठा भीड़। 

सोंच ये कभी न होंगे क्षीण।।

कुछ न कर पायेगा।।

अंत जब आयेगा॥ 


बस पकड़ राम नाम डोर।

मिले तुझे वहीं चितचोर।।

ज्ञान दे जायेगा॥

अंत जब आयेगा॥ 


गई देख जवानी बीत। 

बुढापा न सकते हो जीत।।

मौत संग जायेगा।।

अंत जब आयेगा॥ 


अब तो सम्भल तू आज। 

प्रभु को करे समर्पित काज।।

सत्य सुख पायेगा।।

अंत जब आयेगा॥ 


है दास विपुल यह  बात।

सोंच न गलत तुझे आघात।।

चला यूं जायेगा।।

अंत जब आयेगा॥ 


कर माँ जगदम्बिके ध्यान। 

गुरूवर धरे यदि सम्मान।।

वो ही तर जायेगा॥

अंत जब आयेगा॥ 


कर शिवओम नित्यबोध। 

जस हो बालक एक अबोध।।

मारग  बतलायेगा॥

अंत जब आयेगा॥ 


लिखे दास विपुल सम्वाद। 

पकड ले चरण गुरू के आज॥

समझ कुछ पायेगा।।

अंत जब आयेगा॥  

पृष्ठ पर जाने हेतु लिंक दबायें: मां जग्दम्बे के नव रूप, दश विद्या, पूजन, स्तुति, भजन सहित पूर्ण साहित्य व अन्य  

 

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"MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ़ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  देवीदास विपुल 
ब्लाग :  https://freedhyan.blogspot.com/2018/04/blog-post_45.html

 

 

Friday, August 16, 2019

श्री दुर्गा नाम महात्म्य

श्री दुर्गा नाम महात्म्य

 

 ( ब्रह्मलीन परमपूज्य राष्ट्रगुरू श्री अनंतश्री स्वामी जी महराज पीताम्बरापीठ दतिया, मप्र के लेख संग्रह से साभार )

 

मनुष्य शक्तिशाली होने की महत्वाकांक्षा रखता है’ इसी सिद्धांत के अनुसार अपनी-अपनी अभिरुचि को लक्ष्य करके सभी प्रयत्न कर रहे हैं। जगत के जितने भी विचार प्रधान प्राणी  हैं, उनमें यह अभिकांक्षा स्वाभाविक रूप से दृष्टिगोचर होती है। इसी के अनुसार इस विषय के तत्वज्ञ, ऋषि, मुनि, आचार्य, गुरु आदि महापुरुषों ने भिन्न-भिन्न पथ निर्दिष्ट करके जगत को उक्त आकांक्षा की सिद्धि के लिए अग्रसर किया है। चाहे वे सारे मार्ग ‘शाक्त’ नाम से अभिहित न हो तथा उस मार्ग के अनुयायी ऐसा करने में आनाकानी करें तथापि तत्वदृष्टि से वे सभी शाक्त ही हैं, क्योंकि वे अपनी अभिलषित वस्तु ‘शक्ति’ को चाहते हैं। ‘महत्ता’ पदार्थ और शक्ति दोनों अभिनाभाव सिद्ध हैं। अर्थात इन दोनों में अटूट एवं पूर्व संबंध हैं। यद्यपि जगत के सारे मार्ग तथा मनुष्य शाक्त ही हैं तथापि हमारे इस भारतवर्ष में यह शब्द एक विशिष्ट साधना पद्धित का वाचक है और उस पद्धति के अनुसार चलने वाले साधक को ही शाक्त कहते हैं। यह सनातन मार्ग अनादि काल से हमारे देश में प्रचिलित है। गुप्त प्रकट रूप में सभी जगह इसका अस्तित्व आज भी विद्यमान है। समय के हेरफेर से इसके मूल स्वरूप में अवश्य ही विकृति हो गई है तथापि इसकी सत्ता में काई शंका नहीं हो सकती। सारे जगत के योग क्षेम की अधिष्ठात्री जगन्माता ही एक तत्व स्वरूप है। उसी की उपासना से जीव अपनी त्रुटियों को हटाकर पूर्णता लाभ कर सकता है, ऐसा सिद्धांत है। उसके अनेक नाम रूप निर्दिष्ट हैं तथापि दुर्गा नाम सर्व प्रधान और भक्तों का अति प्रिय लगता है।


    नामार्थ: दकार, उकार, रेफ, गकार और आकार इन वर्णों के योग से मंत्र स्वरूप इस ‘दुर्गा’ नाम की निष्पति होती है। इसका अर्थ इस प्रकार है-

दैत्यनाशार्थवचनो दकार: परिकीर्तित:।

उकारो विघ्ननाशस्य वाचको वेदसम्मत:।।

रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापध्न वाचक:। 

भय शत्रुघ्नवचनश्चाकार: परिकीर्तित।।

अर्थात-दैत्यों के नाश के अर्थ को दकार बतलाता है, उकार विघ्न का नाशक वेद सम्मत है। रकार रोग का नाशक, गकार पाप का नाशक और अकार भय का तथा शत्रु का विनाशक है। इस प्रकार ‘दुर्गा’ नाम अपने अर्थ का यथार्थ बोधक है। इसी के अनुसार देव्युपनिषद में कहा गया है-

तामग्निवर्णा तपसा ज्वलंतीं, वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् ।

       दुर्गा देवीं शरणं प्रपद्यामहे सुरान्नाशयित्र्यै ते नम:।।

अर्थ-अग्नितत्व के समानवर्ण (रंग) वाली अर्थात् लाल वर्णवाली तपसा अपने ज्ञानमय रूप से प्रदीप्त, कर्म फलार्थियों द्वारा वैरोचिनी अग्नितत्व की शक्ति, विशेष रूप से सेवनीय अथवा विरोचन द्वारा उपास्य श्री छिन्नमस्ता स्वरूप वाली श्री दुर्गा देवी की शरण को हम प्राप्त करें, जो असुरों का नाश करती है, उसे हमारा नमस्कार हो। अथवा ‘दु र गा्’ ये तीनों वर्ण अग्नि वर्ण के नाम से प्रसिद्ध हैं, दकार को अत्रिनेत्रज या अत्रीश कहते हैं। अत: बीजाभिधान के मत से यह वर्ण आग्नेय है। रेफ अग्निबीज प्रसिद्ध है। गकार की संज्ञा ‘पज्चान्तक’ है। महा प्रलयाग्नि का बोधक होने से इसकी (गकार) यह संज्ञा है। इस प्रकार (अग्निवर्णा) यह ‘दुर्गा’ नाम उक्त मन्त्र से उद्धृत होता है। नाम तथा देवता के अभेद रूप से दोनों ही पक्षों में यह मंत्र अपना स्वरूप बता रहा है। सर्वतोभावेन देवताओं के शरणभाव प्राप्त होने पर दुर्ग नामक असुर को मारने से श्री दुर्गा का नाम प्रसिद्ध हुआ है। यह सप्शती में भी कहा गया है-

तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यां महासुरम्।

दुर्गादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति।।

अविमुक्तक काशी क्षेत्र में जीवों के मरने पर भगवान शंकर इसी पावन नाम का उपदेश देकर मुक्ति प्रदान करते हैं, यह प्रसंग महाभागवत में नारद-शंकर संवाद में कहा गया है। इन उक्त प्रमाणों से दुर्गा नाम की महत्ता सार्थक रूप से अवगत होती है। इन्हीं अर्थों को लक्ष्य करके इस नाम की महिमा रुदयामल तंत्र से भगवान शिव ने बताई है, जिसमें इसके जपने की संख्या एवं महत्व बताया गया है-

दुर्गा नाम जपो यस्य किं तस्य कथयामि ते।

अहं पज्चानन: कान्ते तज्जपादेव सुव्रते।। 1।।

हे देवि! इस दुर्गा नाम की महिमा मैं क्या कहूं। इसी के जप की वजह से मैं पज्चानन कहा जाता हूं।

धनी पुत्री तथा ज्ञानी चिरंजीवी भवेद्भवी।

प्रत्यहं यो जपेद् भक्त्या शतमष्टोत्तंर शुचि।। 2।।

प्रतिदिन पवित्र होकर भक्तिपूर्वक अष्टोत्तर शत (एक सौ आठ बार जो कोई इसे जपता है वह धनी, पुत्रवान, ज्ञानी तथा चिरंजीवी होता है।)

अष्टोत्तरसहस्त्रं तु यो जपेद् भक्ति संयुक्त।

प्रत्यहं परमेशानि तस्य पुण्यफलं श्रृणु ।। 3।।

धनार्थी धनमाप्नोति ज्ञानार्थी ज्ञानमेव च।

रोगार्तो मुच्यते रोगात् बद्धो मुच्येत् बन्धनात् ।। 4।।

भीतो भयात्मुच्येत पापान्मुच्येत पातकी।

पुत्रार्थी लभते पुत्रं देवि सत्यं न संशय: ।। 5।।

हे देवि! अष्टोत्तर सहस्त्र (1008) जो कोई भक्ति से प्रतिदिन जपता है, उसके पुण्यफल को सुनो। धनार्थी धन, ज्ञानार्थी ज्ञान प्राप्त करते हैं, रोगात्र्त रोग से मुक्त होता है, कैदी बंधन से मुक्त होता है, डरा हुआ भय से, प्राणी पाप से मुक्त होता है एवं पुत्रार्थी पुत्र प्राप्त करते हैं।

एवं सत्य विजानीहि समर्थ: सर्व कर्मसु।

अयुतं यो जपेत् भक्त्या प्रत्यहं परमेश्वरि ।। 6।।

निग्रहापुग्रहे शक्त: स भपेद् कल्पपादप:।

तस्य क्रोधे भवेन्मृत्यु प्रसादे परिपूर्णता।। 7।।

हे परमेश्वरी! दस हजार जो प्रतिदिन जप करते हैं, वे निग्रहानुग्रह करने में समर्थ हो जाते हैं तथा दूसरे कल्पवृक्ष हो जाते हैं। उसके क्रोध में मृत्यु तथा प्रसन्नता में परिपूर्णता होती है। इसी प्रकार सभी कर्म में वह समर्थ होता है, इसे सत्य ही समझो।

मासि मासि च यो लक्षं जपं कुर्याद् वरानने।

न तस्य ग्रहपीडा स्यात् कदाचिदपि शांकरि।।

न चैश्वर्यक्षयं याति नच सर्पभयं भवेत्।

नाग्नि चौरभयं वापि न चारण्ये जले भयम्।।

पर्वतारोहणे नापि सिंह व्याघ्रभयं तथा-।

भूतप्रेतपिशाचानां भयं नापि भवेत कदचित्।।

 न च वैरिभयं कान्ते नापि दुष्टभयं भवेत्।

परलोके भवेत् स्वर्गी सत्यं वै वीरवन्दित।।

चन्द्रसूर्यसमोभूत्वा वसेत् कल्पायुतं दिवि।

वाजपेय सहस्त्रस्य यत् फलं वरानने।।

तत्फलं समवाप्नोति दुर्गा नाम जपात् प्रिये।

न दुर्गा नाम सदृशं नामास्ति जगती तले।

तस्मात् सर्व प्रयत्नेन स्मर्तव्यं साधकोत्तमै:।

यस्य स्मरण मात्रेण पलायन्ते महापद:।।

अर्थात हे देवि! प्रत्येक मास में जो लक्ष संख्या में जप करता है, उसे ग्रहपीड़ा नहीं होती, न उसका ऐश्वर्य ही नष्ट होता है, न उसे सर्प का भय होता है। अग्नि, चोर, अरण्य, जल आदि का भी भय नहीं होता, पर्वतारोहण में सिंह, व्याघ्र, भूत, प्रेत, पिचाश आदि का भय तो उसे होता ही नहीं। शत्रुभय तथा दुष्टभय नहीं होता और वह जातक स्वर्ग का भागी होता है। चन्द्र सूर्य के समान कल्प पर्यन्त वह द्यौलोक में रहता है। एक सहस्त्र वाजपेय यज्ञ करने का फल ‘दुर्गा’ नाम जप के प्रभाव से उसे मिलता है। दुर्गा नाम के सदृश इस संसार में और कोई नाम नहीं है। इसलिए प्रयत्नपूर्वक साधकों को यह नाम जपना चाहिए। इसके स्मरण मात्र से सभी आपत्तियां भाग जाती हैं। इन उक्त श्लोकों में जो अर्थ दुर्गा नाम के विषय में कहे गए हैं, वे केवल अर्थवाद या प्रशंसा ही नहीं है, प्रत्युत सर्वथा सत्य एवं अनुभवगम्य है। पुराणों में भी दुर्गा नाम के विषय में ऐसा ही कहा गया है। पद्य्म पुराण पुष्कर खंण्ड में लिखा है-

मेरुपर्वतमात्रोपि राशि: पापस्य कर्मण:।

कात्यायनीं समासद्य नश्यति क्षणमात्रत:।।

दुर्गार्चनरतो नित्यं महापातक सम्भवै:।

दोषैर्न लिप्यते वीर: पद्य्पत्रमिवाम्भसा।।

मेरु के समान पापराशि भी श्री दुर्गा भगवती के शरण में आने पर नष्ट हो जाती है। दुर्गार्चनरत पुरुष पाप से इस प्रकार निर्लिप्त रहता है जैसे जल में कमल। इस कलिकाल में नाम जप का बड़ा माहात्म्य है, अन्य साधन कठिन, दुरूह तथा सर्वसामान्य के लिए कष्टसाध्य हैं, उनमें नियामदि की कठिनता होने से सिद्ध सुलभ नहीं है। यह दुर्गा नाम सर्वथा सुलभ और महान फल इेने वाला है, इसलिए इसका स्मरण सर्वदा करना चाहिए।

भूतानि दुर्गा भुवनानि दुर्गा, स्त्रियो नरश्चापि पशुश्च दुर्गा।

यद्यद्धि दृश्यं खलु सैव दुर्गा, दुर्गास्वरूपादपरं न किंचित्।।

इस संसार के समस्त स्थानों, समस्त प्राणियों, सभी स्त्रियों, सभी प्रकार के पशु वर्गों और संपूर्ण वांग्यमय में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, वह बस दुर्गा ही है। और दुर्गा स्वरूप के सिवा कुछ भी नहीं है। 


।। ऊं शम्।।


Thursday, August 15, 2019

विवातित जीसस और संतो द्वारा उल्लेख

विवातित जीसस और संतो द्वारा उल्लेख

 सनातनपुत्र देवीदास विपुल "अन्वेषक"


 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
मो.  09969680093
  Vipkavi.info


आप नेट पर कोई भी आध्यात्मिक लेख पढें तो आप पायेंगे कि अंत में जीसस का लिंक दिया होगा और उनका प्रचार दिया होगा। एक सनातन हिंदू होने कारण श्रीमद्भग्वद्गीता को समझने के कारण मैं इसमें कोई बुराई नहीं समझता किंतु दुख इस बात का होता है कि आज की तारीख में कोई भी जीसस को माननेवाला उनके रास्ते पर नहीं चल रहा है। फादर तो इस लिये बन जाते हैं ताकि जिंदगी में सेक्स के दारू के मजे उड़ा सके।  दान में मिले पैसों से लोगों का धर्म परिवर्तन करवा सकें। जो चर्च जितना अधिक धर्म परिवर्तन करवाता है उसे उतना ही ऊंचा सम्मान और ओहदा मिलता है। हलांकि यह सभी धर्मों में कम ज्यादा है। किंतु यह लेख जीसस पर है अत: ईसाइत की बात ही करूंगा।


जीसस ने कभी नहीं कहा कि किसी गरीब की मजबूरी का फायदा लेकर उसे इसाई बनाओ। जीसस को मैं भी उतना ही सम्मान देता हूं जितना कोई और। कारण स्पष्ट है जीसस पर महाऋषि अमर ने और योगदा संस्थान के महाअवतार और संत श्यामाचरण लाहिड़ी परम्परा के स्वामी योगानंद ने अपने अनुभव बतायें हैं। महाऋषि अमर तो सप्तऋषि ही थे और उनके अनुभव उनके शिष्य महाऋषि कृष्णानंद ने लिखे हैं। जिनको मनसा फाउडेशन चिक्कीगुबी बंगलोर ने अभी हाल में ही छापा है। सन 2006 के आस पास।


विश्वभर में ना जाने कितने ही धर्मों और संप्रदायों को मानने वाले लोग रहते हैं। सभी की अपनी-अपनी मान्यता और अपने-अपने रिवाज हैं। लेकिन शायद ही कभी किसी ने एक बात पर गौर किया हो कि एक-दूसरे से पूरी तरह अलग ना होकर इन सबके बीच कुछ ना कुछ समानता या फिर किसी प्रकार का संबंध अवश्य होता है।


हालांकि यह बात एक बहुत बड़ा विवादित मसला है लेकिन बहुत से लोगों का मानना है कि सनातन धर्म, जो दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म माना गया है, से ही अन्य किसी भी धर्म का उद्भव हुआ है। दूसरे शब्दों में आप ये कह सकते हैं कि सनातन धर्म एक सागर है जिससे धर्म रूपी विभिन्न नदियां निकली हैं। अब ये बात कितनी सच है या कितना फसाना, इस बात पर बहस करने से पूरी तरह बचते हुए मैं आपका ध्यान एक ऐसी रिपोर्ट पर लेकर जाना चाहती हूं जिसमें कहा गया है कि ईसा मसीह को जब सूली पर लटकाया गया था तब उनकी मृत्यु नहीं हुई थी।


इतना ही नहीं यह भी कहा गया है कि मौत के बाद जब ईसा मसीह वापस आ गए थे, जिस दिन को हम ईस्टर के तौर पर मनाते हैं, तब वह येरुसलम से सीधे भारत की ओर आए थे। भारत आकर वे कश्मीर में बसे थे और यहीं उनकी मृत्यु भी हुई थी। कश्मीर में आज भी जीसस क्राइस्ट की कब्र मौजूद है।


बहुत से लोगों के लिए यह कॉंसेप्ट नया है, शायद मेरे लिए भी। दस्तावेजों के अनुसार जीसस क्राइस्ट 33 वर्ष की उम्र तक जीवित रहे थे, 33 वर्ष की उम्र में उन्हें सूली पर लटकाया गया था। लेकिन 13 वर्ष से लेकर 29 वर्ष तक उन्होंने क्या किया, इस बात से पर्दा उठाने की कोशिश भी शुरू हुई है।
शोधकर्ताओं के अनुसार 13 वर्ष से लेकर 29 वर्ष तक जीसस क्राइस्ट भारत में रहे थे। इस दौरान उन्होंने भारत में ही रहते हुए शिक्षा ग्रहण की थी। 30 वर्ष की उम्र में वे येरुसलम गए और यहां आकर योहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली। दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात वे स्वयं शिक्षा का प्रसार-प्रचार करने लगे। अधिकांश विद्वानों का कहना है कि इस 29वीं ईसवीं में गधे पर चढ़कर येरुसलम आए और तभी से उनकी जान लेने का षड़यंत्र रचा जाने लगा। आखिरकार 33 वर्ष की आयु में उनके विरोधियों ने उन्हें सूली पर लटका ही दिया। लेकिन क्या वाकई सूली पर लटकाए जाने के बाद यीशू की मृत्यु हो गई थी?


वैज्ञानिकों की मानें तो “नहीं”। यीशू ने रविवार के दिन येरुसलम में प्रवेश किया था जिसे ‘पाम संडे’ कहा जाता है। शुक्रवार के दिन उन्हें सूली पर लटकाया गया जो ‘गुड फ्राइडे’ के नाम से मनाया जाता है। कहा जाता है अगले रविवार को एक स्त्री, मैरी मैग्डेलन, ने जीसस को अपनी ही कब्र के पास जीवित अवस्था में देखा था।  उस दिन के बाद जीसस को कभी किसी ने नहीं देखा, क्योंकि शोध में ये बात सामने आई है कि उस दिन के पश्चात जीसस पुन: भारत लौट आए थे। भारत लौटकर उन्होंने कश्मीर के बौद्ध और नाथ संप्रदाय के लोगों के साथ समय बिताया और गहन तपस्या की।  मठ में उन्होंने 13 से 29 वर्ष तक रहकर शिक्षा ग्रहण की थी, दोबारा वे उसी मठ में रहने लगे और आजीवन वहीं रहे, वहीं उनकी मृत्यु भी हुई। बहुत से लोग तो यह भी कहते हैं सन् 80 ई. में श्रीनगर में हुए प्रसिद्ध बौद्ध सम्मेलन में ईसा मसीह ने भी भाग लिया था। श्रीनगर के उत्तर दिशा में स्थित पहाड़ों पर बौद्ध विहार का एक खंडहर है, जहां सम्मेलन हुआ था।


हाल ही में एक खोजी टी.वी. चैनल द्वारा कश्मीर स्थित उनकी कब्र को भी अपने चैनल पर दिखाया था। रिपोर्ट की मानें तो श्रीनगर के पुराने शहर में 'रौजाबल' नाम से मशहूर इमारत स्थित है। पत्थर से बनी यह इमारत एक गली के नुक्कड़ पर है। कहा जा रहा है कि इस इमारत में एक मकबरा है, जिसमें जीसस क्राइस्ट का शव रखा हुआ है। वैसे आधिकारिक तौर पर तो यह मकबरा मध्यकालीन युग के मुस्लिम उपदेशक यूजा आसफ का कहा जाता है, लेकिन बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि इस मकबरे में यूजा आसफ की नहीं जीसस क्राइस्ट की कब्र है। कश्मीर आने पर जीसस क्राइस्ट का पहला पड़ाव पहलगाम था। मान्यता तो यह भी है कि पहलगाम में ही ईसा मसीह ने अपने प्राण भी त्यागे थे। ओशो रजनीश की एक किताब 'गोल्डन चाइल्डहुड' के अनुसार यहूदी धर्म के पैंगबर (मोज़ेज) ने भी इसी स्थान पर अपनी देह छोड़ी थी। ईसा और मोजेस, दोनों की ही कब्र यहीं है।


अपनी किताब में ओशो ने लिखा था “यह बहुत अच्छा हुआ कि जीसस और मोजेज दोनों की मृत्यु भारत में ही हुई। भारत न तो ईसाई है और न ही यहूदी। परंतु जो आदमी या जो परिवार इन कब्रों की देखभाल करते हैं वह यहूदी हैं। दोनों कब्रें भी यहूदी ढंग से बनी हैं। हिंदू कब्र नहीं बनाते। मुसलमान बनाते हैं किन्तुक दूसरे ढंग की। मुसलमान की कब्र का सिर मक्काह की ओर होता है। केवल वे दोनों कब्रें ही कश्मीमर में ऐसी हैं जो मुस्लिम नियमों के अनुसार नहीं बनाई गईं।“ हालांकि ईसा मसीह की मृत्यु और मृत्यु के बाद भारत आकर उनके रहने जैसी बातें अत्याधिक विवादित मसला है। विभिन्न भाषा में, विभिन्न काल खंडों में ईसा के रहस्यमय जीवन और फिर मृत्यु के बाद के जीवन पर न जाने कितनी बातें लिखी गई हैं, कई शोध भी किए गए हैं। लेकिन किसी एक तथ्य पर मुहर लगना ना आज संभव है, ना था और ना होगा।


ये दुनिया दो तरह के लोगों के बीच बंटी हुई है। एक वो जो ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं और दूसरे वो जो ऐसी किसी भी धारणा को मनगढ़ंत मानते हैं। जो लोग ईश्वर पर आस्था रखते हैं उनके लिए यह समस्त ब्रह्मांड सर्वोच्च सत्ता के हाथ में है, इन्हें आस्तिक कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर वे लोग जिनके लिए ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है, जिनके लिए दैवीय सत्ता कोई महत्व नहीं रखती, उनका मानना है कि ईश्वर के अस्तित्व की खोज उन लोगों ने की है जो अपनी परेशानियां खुद नहीं सुलझा सकते और हर बात पर ईश्वर से सहारा मांगते हैं या ईश्वर को दोष देते हैं। आस्तिकों  और नास्तिकों की अवधारणाओं में बहुत से मौलिक अंतर हैं, जिसकी वजह से दोनों ही किसी भी बिन्दु पर एकमत होना नहीं चाहते। इसकी वजह से हर मसला एक बहस का मुद्दा बन जाता है।


ऐसा ही एक बहस का मुद्दा है जीसस, ईशू, या ईसा मसीह के अस्तित्व से जुड़ा। हालिया एक शोध के अनुसार यह बात सामने आई है कि ईसा मसीह का जन्म कभी हुआ ही नहीं था। अर्थात जिस व्यक्ति को ईसाई धर्म के संस्थापक के रूप में देखा जाता है असल में वह कभी था ही नहीं। ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास ना करने वाले प्रसिद्ध नास्तिक लेखक डेविड फिट्जगेराल्ड का कहना है कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है जिसके आधार पर यह कहा जाए कि ईसा मसीह का धरती पर जन्म हुआ था। डेविडका कहना है कि जीसस क्राइस्ट कोई वास्तविक इंसान नहीं थे, बल्कि बहुत सी कहानियों, व्यक्तित्वों और घटनाओं को एक-दूसरे से जोड़कर जीसस के जन्म की कहानी गढ़ी गई है। लेखक का यह भी दावा है कि उनके द्वारा किए गए शोध में यह बात पुख्ता हुई है कि जिस काल को जीसस के जन्म से जोड़ा जाता है, उस काल से जुड़े दस्तावेजों से कहीं भी ईसा मसीह का जुड़ाव प्रदर्शित नहीं होता। जबकि यहूदी धर्म के अन्य धर्म प्रचारक और संस्थापकों का जिक्र फिर भी मिल जाता है।


डेविड फिट्जगेराल्ड की स्थापनाएं पूर्व में मार्क, मैथ्यू और ल्यूक की स्थापनाओं से अंतर रखती हैं। इन सभी लेखकों ने जीसस के होने का सबूत पेश किया था लेकिन इनसे असहमति दिखाते हुए डेविड का कहना है कि ये सभी सिद्धांत जीसस के कथित समय के बहुत बाद में लिखे गए हैं। अपनी किताब में डेविड ने लिखा है कि जीसस का स्वरूप असल में उस कुछ मूर्तिपूजा करने वाले लोगों के धर्म और अन्य कुछ कहानियों के आधार पर व्यवस्थित किया गया है। इतना ही नहीं डेविड के अनुसार जीसस के चमत्कारी जीवन से जुड़ी कहानियां या उनके द्वारा किए गए चमत्कार सिर्फ उनके आसपास के लोगों के अलावा ना किसी ने देखे और ना ही उनके जाने के करीब 100 सालों तक किसी ने सुने। इसका अर्थ स्पष्ट है कि जीसस ने ऐसा कुछ किया ही नहीं था।


ईसाई धर्म के सिद्धांत, एक साहित्यिक कहानी जैसी हैं, जिन्हें गठित भी कथित समय के बहुत बाद में किया गया है। ऐसा लगता है ईसाई पंथ, यहूदी धर्म का कोई रहस्यमय धर्म है। फिट्जगेराल्ड के अनुसार जीसस का जन्म इस धरती पर कभी नहीं हुआ था और अगर हुआ भी था तो वह कोई एक नहीं बल्कि बहुत से अलग-अलग व्यक्तित्वों से मिलकर बना एक स्वरूप है। लेखक का दावा है कि ईसाई धर्म के लाखों अनुयायी, जीसस द्वारा हुए चमत्कारों का सिर्फ दावा करते हैं जबकि ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं है जो इन दावों को सच साबित करे। अपने दावों को पुख्ता करने के लिए डेविड का कहना है कि ऐसा माना कि तथाकथित जीसस को यहूदियों ने सूली पर लटका दिया था। लेकिन उस समय यहूदियों की यह परंपरा थी कि वह अपने बंधकों या अपराधियों को पत्थर से मारते थे। फिर जीसस को पत्थर से क्यों नहीं मारा गया?


वहीं दूसरी ओर एक अन्य शोध और कुछ ऐतिहासिक प्रमाण हाथ लगने के बाद भूवैज्ञानिक डॉ. आर्ये शिमरॉन का कहना है कि जीसस का ना सिर्फ अस्तित्व मौजूद था बल्कि वे विवाहित होने के साथ-साथ एक बच्चे के पिता भी थे। आर्ये के अनुसार उन्होंने जेरूसेलम में जीसस के उस मकबरे को खोजा है जिसमें उनकी पत्नी मैरी और भाई जेम्स को दफनाया गया था। बहुत से रसायन परीक्षणों को करने के बाद आइरिश भूवैज्ञानिक ने अपनी खोज में चूना पत्थर के उस बक्से की खोज की है जिसमें जीसस, उनकी पत्नी और उनके भाई की अस्थियां रखी गई थीं। आर्ये शिमरॉन के अनुसार जीसस को नौ अन्य लोगों के साथ दफनाया गया था जिनमें उनके भाई, उनकी पत्नी और उनका बेटा जुडा शामिल था। शिमरॉन की इस खोज ने वर्षों से चली आ रहे उस विवाद को फिर से हवा दे दी है, जो तलपायत मकबरे के मिलने बाद शुरू हुई थी। यह मकबरा वर्ष 1980 में सर्वप्रथम खोजा गया था।


शरीर से मांस के गलने के बाद अस्थियों को एक बक्से में बंद कर दिया जाता है, जिसे ओशरी कहा जाता है। इस मकबरे से मिले ओशरी के ऊपर लिखा था, ‘जीसस, सन ऑफ गॉड’ अर्थात ईश्वर का बेटा। उसके अलावा अन्य नामों में मारिया, मैरी, जोसफ, योस, मैथ्यू और सबसे विवादित, जॉन, जिसे जीसस का पुत्र कहा जा रहा है। बहुत से लोग यह भी कह रहे हैं कि उस समय, जोसफ, मैरी, मैथ्यू आदि जैसे नाम बहुत कॉमन थे। लगभग 8 प्रतिशत ईसाई आबादी इन्हीं नामों से जानी जाती थी इसलिए पुख्ता तौर पर यह कहना कि यह वाकई ईसा मसीह और उनके परिवार के ही अवशेष हैं, जल्दबाजी है। तब से लेकर अब तक ओशरी एक विवाद का विषय ही बनी हुई है कि क्या वाकई इसमें ईसा मसीह के अवशेष हैं या नहीं। क्योंकि ऐसा बहुत कम ही होता है जब कथित ईसा मसीह के परिवार के सदस्यों के नाम किसी अन्य परिवार के सदस्य के भी हों।


खैर जो भी हो, धर्म, ईश्वर और उसका अस्तित्व ये पूर्णत: व्यक्ति की आस्था के ही मसले हैं। अगर आस्था है तो पत्थर भी भगवान है और अगर नहीं तो बड़े से बड़ा चमत्कार भी इत्तेफाक सा लगता है।


ये दुनिया बहुत रहस्यमयी है. कब, कैसे और क्या हो जाए इस रहस्य से ना तो कभी पर्दा उठ पाया है और जहां तक उम्मीद है कभी उठेगा भी नहीं. क्योंकि आए दिन हमारे सामने कोई ना कोई ऐसा रहस्य उठ खड़ा होता है जिसे देखने और जानने के बाद यह लगता है कि शायद इस रहस्यमयी दुनिया की रहस्यमयी दास्तां का कोई अंत नहीं है.


ताजा मामला जीसस क्राइस्ट से जुड़ा है, जिनकी पत्नी का उल्लेख कागज के एक बहुत पुराने टुकड़े के जरिए सामने आया है. प्राचीन काल से जुड़े इस पत्र की लिखाई को जब विशेषज्ञों द्वारा समझा गया तो जो तथ्य सामने आया वो काफी हैरान करने वाला था क्योंकि इस टुकड़े पर स्पष्ट रूप से लिखा है कि जीसस क्राइस्ट की एक पत्नी भी थीं. पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कागज के इस टुकड़े की लिखाई को जब ट्रांसलेट किया गया तो इसका अर्थ ‘जीसस सैड टू देम…माइ वाइफ’ अर्थात ‘जीसस ने उन्हें कहा….मेरी पत्नी…’ इस पंक्ति के साथ जीसस ने ‘मैरी’, बहुत हद तक संभव है मैरी मैगडेलन का भी जिक्र किया है. गॉस्पेल ऑफ जीसस वाइफ के तौर पर प्रचारित कागज के इस टुकड़े की खोज वर्ष 2012 में हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े केरन किंग ने की थी. जैसे-जैसे गॉस्पेल ऑफ जीसस वाइफ को लोकप्रियता मिलने लगी, वैसे-वैसे इसकी सच्चाई और प्रमाणिकता की भी खोज शुरू हो गई.


परंतु अफसोस, जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे ये बात सामने आ रही है कि जीसस की पत्नी की खबर से जुड़ा यह टुकड़ा नकली है. केरन किंग को यह टुकड़ा कहां से मिला और किसने उन्हें यह दिया, वह इस बात को शेयर नहीं करना चाहते और ना ही इस ‘गॉस्पेल ऑफ जीसस वाइफ’ के इस टुकड़े के असली मालिक का नाम बताना चाहते हैं. जिस समय इस टुकड़े की खोज की गई थी उस समय केरन किंग ने इसे दूसरी शताब्दी में ग्रीक लोगों द्वारा लिखे गए गॉस्पेल की कॉपी कहा था जिसे चौथी शताब्दी में प्राप्त किया गया था. अब जबकि कार्बनडेटिंग तकनीक के जरिए इस टुकड़े की उम्र का पता लगाया गया तो यह सामने आया कि यह आठवीं या नौवीं शताब्दी का है.


हार्वर्ड थियोलॉजिकल रिव्यू द्वारा लिखी गई रिपोर्ट में यह कहा गया कि गॉस्पेल ऑफ जीसस वाइफ को हैंस-उलरिश लाकांप द्वारा वर्ष 1999 में खरीदा गया था. स्पष्ट तौर पर कोई नहीं जानता कि ‘गॉस्पेल ऑफ जीसस वाइफ’ कहां से आया और कौन इसे केरन किंग को देकर गया. जीसस की पत्नी की बात जहां तक है प्राचीन काल में बहुत से लोग यह मानते थे कि जीसस और मैरी मैगडेलन ने विवाह किया था, परंतु यह विवाह कभी उजागर नहीं हुआ. हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के स्कॉलर्स इस टुकड़े की प्रमाणिकता की जांच नहीं कर पा रहे हैं. वह ना इसे सच मान पा रहे हैं और ना ही इसे झुठला पा रहे हैं. बहुत समय से जीसस की पत्नी से जुड़ी यह खबर चर्चा का विषय बनी हुई है और हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इस बात को लेकर अपनी पीठ भी थपथपा रहे थे. लेकिन अब जब ‘गॉस्पेल ऑफ जीसस वाइफ’ की सच्चाई सबके सामने आने लगी है तो हॉर्वर्ड स्कॉलर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.


जिसस क्राईस्ट यानी ईसा मसीह के बारे में कहा जाता है कि यहूदियों को ईसा की बढ़ती लोकप्रियता से तकलीफ होने लगी। उन्हें लगने लगा कि ईसा उनसे सत्ता न छीन लें। इसलिए साजिश के तहत इन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया। सूली पर चढ़ाए जाने के बाद यह माना गया कि ईसा की मौत हो गई है। लेकिन असलियत यह है कि ईसा सूली पर चढ़ाए जाने के बाद भी जीवित रह गए थे। यह कहना है रूसी स्कालर 'निकोलाई नोटोविच' का। इन्होंने अपनी पुस्तक 'द अननोन लाईफ ऑफ जीसस क्राइस्ट' में लिखा है कि सूली पर चढ़ाए जाने के जिसस मरे नहीं थे। सूली पर चढ़ाए जाने के तीन दिन बाद यह अपने परिवार और मां मैरी के साथ तिब्बत के रास्ते भारत आ गए। भारत में श्रीनगर के पुराने इलाके को इन्होंने अपना ठिकाना बनाया। 80 साल की उम्र में जिसस क्राइस्ट की मृत्यु हुई। माना जाता है कि क्राइस्ट का मकबरा श्री नगर के रोजबाल बिल्डिंग में आज भी है।


इतिहासकार सादिक ने अपनी ऐतिहासिक कृति 'इकमाल-उद्-दीन' में उल्लेख किया है कि जीसस भारत में कई बार आए थे। अपनी पहली यात्रा में इन्होंने तांत्रिक साधना एवं योग का अभ्यास किया। इसी के बल पर सूली पर लटकाये जाने के बावजूद जीसस जीवित रह गए। बाईबल में भी इस बात का उल्लेख है कि ईसा मसीह सूली पर लटकाए जाने के तीन दिन बाद अपने समर्थकों के बीच आए थे। लुईस जेकोलियत ने 1869 ई. में अपनी एक पुस्तक 'द बाईबिल इन इंडिया' में लिखा है कि जीसस क्रिस्ट और भगवान श्री कृष्ण एक थे। लुईस जेकोलियत फ्रांस के एक साहित्यकार और वकील थे। इन्होंने अपनी पुस्तक में कृष्ण और क्राईस्ट का तुलना प्रस्तुत की है। इन्होंने अपनी पुस्तक में यह भी कहा है कि क्राईस्ट शब्द कृष्ण का ही रूपांतरण है। क्राइस्ट के अनुयायी क्रिश्चियन कहलाये।


जीसस शब्द के विषय में लुईस ने कहा है कि क्राईस्ट को 'जीसस' नाम भी उनके अनुयायियों ने दिया है इसका संस्कृति में अर्थ होता है 'मूल तत्व'। भगवान श्री कृष्ण को गीता एवं धार्मिक ग्रंथों में इस रूप में ही व्यक्त किया गया है। जीसस क्राइस्ट के विषय में यह भी उल्लेख मिलता है कि इन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा भारत में बिताया। निकोलस नातोविच नामक एक रूसी युद्घ संवाददाता ने अपनी पुस्तक 'द अननोन लाईफ ऑफ जीसस क्राइस्ट' में लिखा है कि जीसस ने अपने जीवन का 18 वर्ष भारत में बिताया। जीसस प्राचीन व्यापारिक मार्ग सिल्क रूट से भारत आये थे। इन्होंने तिब्बत और कश्मीर के मोनेस्ट्री में काफी समय बिताया और बौद्घ एवं भारतीय धर्म ग्रंथों एवं आध्यात्मिक विषयों का अध्ययन किया।


अपनी भारत यात्रा के दौरान जीसस ने उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर की भी यात्रा की थी एवं यहां रहकर इन्होंने अध्ययन किया था। माना जाता है कि भारत में जब बौद्घ धर्म एवं ब्राह्मणों के बीच संघर्ष छिड़ा तब जीसस भारत छोड़कर वापस चले गये। भारत से वापसी के समय जीसस पर्सिया यानी वर्तमान ईरान गये। यहां इन्होंने जरथुस्ट्र के अनुयायियों को उपदेश दिया। जीसस के विषय में यह भी मान्यता है कि जीसस जीवन के अंतिम समय में पुनः भारत आये थे। सादिक ने अपनी ऐतिहासिक कृति 'इकमाल-उद्-दीन' में उल्लेख किया है कि जीसस ने अपनी पहली यात्रा में तांत्रिक साधना एवं योग का अभ्यास किया। इसी के बल पर सूली पर लटकाये जाने के बावजूद जीसस जीवित हो गये। इसके बाद ईसा फिर कभी यहूदी राज्य में नज़र नहीं आये। यह अपने योग बल से भारत आ गये और 'युज-आशफ' नाम से कश्मीर में रहे। यहीं पर ईसा ने देह का त्याग किया।


जीसस पर चाहे कितने विवाद हों किंतु मैं अपने मित्रों से अनुरोध करूंगा कि आप धर्म परिवर्तन का विरोध करें किंतु जीसस जैसे संत का विरोध नहीं। मैं उनको एक अवतार ही मानता हूं। आज के ईसाई चाहे कितने पापी और भृष्ट किंतु जीसस उतने ही सच्चे और निर्दोष। आज धर्म के नाम पर दुकानदारी गलत है और पाप है।


MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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