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Tuesday, August 13, 2019

कर्मणे ब्राह्मण और सांख्य चर्चा

कर्मणे ब्राह्मण और सांख्य चर्चा 

 सनातनपुत्र देवीदास विपुल "खोजी"


 विपुल सेन उर्फ विपुल लखनवी,
(एम . टेक. केमिकल इंजीनियर) वैज्ञानिक एवं कवि
पूर्व सम्पादक : विज्ञान त्रैमासिक हिन्दी जर्नल “वैज्ञनिक” ISSN 2456-4818
मो.  09969680093
  - मेल: vipkavi@gmail.com  वेब:  vipkavi.info वेब चैनलvipkavi
ब्लाग: freedhyan.blogspot.com,  फेस बुक:   vipul luckhnavi “bullet

अब अंदर का मजा लो। बाहर का बन्द कर दो।

यह जगत है  इसमें रह कर ही सब करना पड़ेगा। इसको छोड़ने की सोंचना कायरता है।

मुझे भी अभी 2 साल नौकरी करनी है।

कायर मत बनो। पुरुषार्थ जगत छोड़ने में नही।

दो रोटी के कारनै , साथ झमेला यार।

राम राम को तू भजे, कर दे बेड़ा पार।

न बुद्ध बनो न महावीर। बनना है तो कृष्ण बनो।

कार्य कोई भी छोटा बड़ा नही होता। सब कार्य बराबर होते है । हा बाजार भाव के कारण मूल्य अलग हो सकते है।

ऐसा आवश्यक नही।

जब किसी को किसी मन्त्र के जाप से कोई अनुभव या क्रिया होने लगती है तो वह प्रायः मात्र व्यक्ति विशेष की अनुभूति होती है। सबको नही भी हो सकती है। क्योंकि हर व्यक्ति के कर्म और प्रारब्ध अलग होते है।

दूसरे हर व्यक्ति को अनुभूतिया भी अलग हो सकती है। क्रिया के करोड़ो रूप हो सकते है।

जय गुरू देव जय महाकाली जय महाकाल


मैं जानता हूँ कुछ मित्रो को जिनको मात्र कुछ सालों में नवार्ण मन्त्र के जाप से कुण्डलनी जागृत हो गई। देव दर्शन हो गई। काली मन्त्र के जाप से 3 साल में काली मां प्रकट हो गई। किंतने 25 साल से गायत्री कर रहे है सिर्फ कुछ अनुभूतिया हुई।

इसका यह मतलब नही की कौन मजबूत कौन कमजोर। हर मन्त्र हर नाम जप करोड़ो द्वारा सिद्ध किये जा चुके है। जितना राम या कृष्ण शक्तिशाली उतना शक्तिशाली और मन्त्र नही भी हो सकता है।

मन्त्र और नाम जप के परिणाम व्यक्ति विषेश पर ही निर्भर हैं। किसी मन्त्र या नाम जप पर नही।

सब बराबर है बस करो तो उसका नाम या मन्त्र जप।

 लीन हो जाओ। करो सतत निरन्तर निर्बाध सदैव। हो जाओ समर्पित। कर लो प्रेम।

इसी में तुम्हरा कल्याण है। सब एक है अनन्त है। बस तुम मूर्ख हो जो अलग देखते हो।

जय महाकाली। जय गुरूदेव।

आत्मा किसी की भी वह। अविनाशी निर्विकार और दोषों के रहित होती है। वह शुद्ध ईश का ही रूप होती है।

अहंकार यानि मेरा वास्तविक स्वरूप आकार। वह क्या है जो गीता में बताया है। यह योग के द्वारा जब योग घटित होकर अनुभव देता है तब ज्ञात होता है।

अहंकार यानि घमंड जो वाहीक ज्ञान के कारण अज्ञानता के कारण होता है।

अंतर्मुखी होने के बाद जब हमे अपनी आत्मा में परमात्मा की एकात्मकता का अनुभव होता है। वेदांत उसे योग कहता है । यह क्षणिक होता है पर ज्ञान और अनुभव के पिटारे दे जाता है।

फिर धीरे धीरे हम निष्काम कर्म की ओर स्वतः अग्रसर होते है तो हमे कर्म योग का अनुभव होता है। जिसके लक्षण गीता में बताये जो समत्व, स्थिर बुद्धि और स्थित प्रज्ञ हो जाता है। स्थित प्रज्ञ वह जिसका मन बुद्धि अहंकार मुझमे ही लीन हो। यानी जो आत्मस्वरूप में लीन हो जाये। इसी को आगे बढाते हुए तुलसीदास ने कहा। जिसमे संतोष आ जाये। यानि जाही विधि राखे राम ताहि विधि रहिए। यहाँ निष्क्रिय नही बल्कि कर्म करो पर फल की चिंता छोड़ दो।

जब मैं ही ब्रह्म हूँ इसकी अनुभूति होती है। मेरी आत्मा ही परमात्मा है। इसका अनुभव होता है। तो घटित होता है ज्ञान योग।

यह सारी अवस्थाये अनुभव अनूभूति की है। किताबे बेकार।

पातञ्जलि ने यही कहा। जब हम कर्म करते है तब हमारे मन मे कोई भाव न उतपन्न होने से हमारी चित्त में कोई वृत्ति उतपन्न नही होती । वह ही योग है।

पहले आप mmstm करे। जो अनुभव हो वो बताये।

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जी प्रारम्भ योग कुछ क्षणों के लिए ही होता है। किंतु यह सब कुछ दे जाता है। पर अपने कर्मो के द्वारा यह हमारे में परिलक्षित होना चाहिए। यह होने के बाद ज्ञान मिलता है पर यदि मनुष्य सही मार्ग से भटक जाए तो वह ज्ञान सहित पतन की ओर भी अग्रसर हो सकता है।

अतः मनुष्य को कहां पान संगत और पंगत पर ध्यान देना चाहिए।

ज्ञान ग्रंथी खुलने पर ज्ञान को प्रचारित करने का तूफान आता है। क्योंकि आत्म गुरू जागृत हो जाता है।

वास्तव में यह परीक्षा होती है। योग के बाद शक्ति आ जाती है किसी को भी क्रिया करवाने की किसी की भी कुण्डलनी खोलने की। अतः मनुष्य बिना गुरू आदेश के या परम्परा के गुरू बनना चाहता है। जो धीरे धीरे शक्ति ह्वास होने से नीचे गिरता है।

बड़ी कठिन है राह पनघट की।

ध्यान प्रयास सतत करते रहने से मनुष्य बचा रहता है।

तब यह पुरावृति समय समय पर घटित होने लगती है। धीरे धीरे इसकी अवधि स्वतः बढ़ेगी। हम सिर्फ सत्मार्ग की ओर अपनी शक्ति बचाते हुए चले।

यदि गुरू बन गए तो पतन निश्चित।

जो ईश्वर से मांगता है वह सबसे बड़ा भिखारी। स्वामी विविकानन्द

मित्र योग के अनुभव की अवस्था कुछ पलों की ही होती है।

अहम ब्रह्मासमी। सोअह्म। शिविहम योग यह सब कुछ पलों के ही अनुभव होते है। परन्तु सब दे जाते है।

मेरी बात शिव और कृष्ण भी न काट सकते। यदि यह हमेशा है तो लोगो के भरम।

अब क्या बोलूं इसके आगे।

कृष्ण और युधिष्ठिर का किस्सा सर्वविदित है।

इस दशा की समयाविधि कुछ पलों से कुछ मिनट तक ही होती है।

हा नशा आनन्द लगातार रह सकता है। एक अवश्था के बाद जरा सा ध्यान किया चाय पीते पीते ही सही। सर टुन्न और नशा और आनन्द चालू।

नशा लगातार रह सकता है। पर यह योग की अवस्था नही।

समाधि स्वयं लग जाती है। अब यह कौन सी यह बताना मुश्किल।

प्रकाश इत्यादि मात्र क्रियाये और बेहद आरंभिक स्तर की अनुभूति।

यह सब कर्मो में दिखना चाहिए। किसी ने पुरुस्कार दिया। खुश दुनिया को बताते फिरे। यह योगी के लक्षण नही।

कुछ करने का मन नही होता। मतलब आलस्य वाला नही। मतलब किसी प्रकार की घटना से कोई प्रभाव नही। किसी ने गाली दी चलेगा। कोई अंतर नही। किसी ने सम्मान दिया कोई फर्क नही।

धन डूब गया। चलेगा। मिल गया चलेगा। किसी से मोह नही। कोई अपना नही सिर्फ कर्तव्य का बोध।

यह योगी के लक्षण है।

जिसे गीता ने समझाया है।

जब इस अवस्था मे अपने कर्म कुशलता से किया जाए तो पातंनजली की बात। हमारे चित्त में वृत्ति नही आएगी।

गुरू महाराज के अनुसार यदि कर्म भी क्रिया रूप में हो तो संस्कार संचित नही होते।

महाराज जी का यह वाक्य ही बड़े बड़े ज्ञानी समझ नही पायेगे।

अब अपने अनुभव से क्रिया और कर्म समझो। तो कुछ समझ पाओगे।

एक बात समझ लो इतने भार के साथ वर्षो बाद सिद्धार बेट्टी पहाड़ी पर सिर्फ और सिर्फ महाराज जी की वाणी पर अमल कर के ही चढ़ पाया था।

पहाड़ी पर चढ़ना एक क्रिया कर्म था। अतः कोई थकान भी नही आई।

यदि किसी कर्म को क्रिया रूप में लेलो तो वह कर्म सहज हो जाता है। और संस्कार संचित नही होते।

सँ लिप्तता के बिना कर्म कैसे होगा। पर फल क्रिया के कारण  पैदा नही होगा।

एक बात और यदि पापी भी प्रभु का नाम जप्त है तो तर जाता है। प्रभु स्मरण और भक्ति तुमको सब दे देती है गुरू से ज्ञान तक। ध्यान से समाधि तक। शून्य से अनन्त तक सारे ज्ञान सारे अनुभव। अतः यदि भला चाहते हो तो न चाहते हुए भी जो देव अच्छा लगे। उसका सतत निरन्तर निर्बाध मन्त्र जप और नाम जप। उसका ध्यान करते रहो करते रहो।


कुछ उदाहरण है वेदों से। जब यह सब कर्म से  ब्राह्मण बन गए। अर्थात ब्रह्म का वरण कर लिए।

(1) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे। परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की| ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है।

(2) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे। जुआरी और हीन चरित्र भी थे। परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये। ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया। (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)

(3)  सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।

(4) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र होगए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। (विष्णु पुराण ४.१.१४)


(5) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए। पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। (विष्णु पुराण ४.१.१३)

(6) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(7) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |

(8)  विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |

(9) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मणहुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)

(10) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्यके उदाहरण हैं |

(11) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |

(12) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपनेकर्मों से राक्षस बना |

(13) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |

(14) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |

(15) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |

(16) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए  और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया


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सांख्यदर्शन के कुछ स्मरणीय अंश

* सांख्यदर्शन के प्रवर्तक - देवहूति और कर्द्दम के पुत्र महर्षि कपिल ।

* सांख्य शब्द का अर्थ - समुपसर्गात् "ख्या" ( प्रकाशने) धातुः , 'अङ्ग' प्रत्यये 'टाप्' प्रत्यये च संख्याशब्दस्य निष्पत्ति:। ततः 'तस्येदम्' इत्यनेन ' अण्' प्रत्यये सांख्यम् इति पदस्य निष्पत्ति:।


* सांख्यदर्शन के प्रमुख ग्रन्थ - षष्टीतन्त्रम् , तत्त्वसमास , सांख्यप्रवचनसूत्र , सांख्यषडाध्यायी।


* कपिलमुनि के शिष्यों के नाम क्रमशः - आसुरी, पंचशिख, ईश्वरकृष्ण , भार्गव , उल्लूक , वाल्मीकि , हारीत , वार्षगण्य , वशिष्ठ , गर्ग।


* ईश्वरकृष्ण के द्वारा आर्या छन्द में सांख्यकारिका की गई।


* सांख्य दर्शन में पच्चीस तत्वों का विचार है।

वे तत्त्व है - पुरुष, प्रकृति, महत्( बुद्धि) , अहङ्कार, पञ्चतन्मात्राएँ ( रूप , रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द) , मन, पञ्चज्ञानेन्द्रिया( चक्षु , रसना, घ्राण, त्वक, श्रोत्र) पञ्चकर्मेन्द्रिया ( वाक् , पाणि , पाद , पायु, उपस्थ) पञ्चमहाभूत ( पृथ्वी , आप , तेज , वायु, आकाश )


* इन पच्चीस तत्त्वों को चार भागों में विभाजित किया गया है।

1 . केवलप्रकृति - (प्रकृति अथवा प्रधान)

2. प्रकृतिविकृति - ( महद् , अहंकार, पञ्चतन्मात्राएँ )

3. केवलविकृति - ( पञ्चकर्मेन्द्रिया, पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, मन, पञ्चमहाभूत )

4. न प्रकृति न विकृति - ( पुरुष)


सांख्यदर्शनानुसार दुःख तीन प्रकार के होते हैं।

1. आदिदैविक।

2. आदिभौतिक ।

3 . आध्यात्मिक । ( शारीरिक , मानसिक)


* सत्कार्यवाद - सत एव सज्जायते इति।

सत्कार्यवाद के पांच प्रमाण -

1. असदकरणात्।

2. उपादानग्रहणात्।

3. शक्तस्य शक्यकरणात्।

4. सर्वसम्भवाभावात्।

5. कारणभावात्।


* प्रकृति की सिद्धि के पाँच कारण।

1. कारणकार्यविभागात्।

2. अविभागाद्वैश्वरूस्य।

3. शक्तित: प्रवृत्तेश्च।

4. परिमाणात्।

5. समन्वयात्।


* सांख्यदर्शन तीन प्रमाणों को स्वीकृती देता है।

1 . प्रत्यक्ष।

2. अनुमान।

3. शब्द।


*अनुमान तीन प्रकार के होते है।

1. पूर्ववत्  2. शेषवत् 3. सामान्यतोदृष्ट।


* प्रत्ययसर्ग चार प्रकार के होते है।

1. विपर्यय।

2. अशक्ति।

3. तुष्टि।

4. सिद्धि।


* विपर्यय पाँच प्रकार के होते है।

1. तम।     2. मोह।     3. महामोह।   4. तामिस्र ।

5 . अन्धतामिस्र।


* अशक्ति 28 प्रकार के होते है -

आंध्य , बाधिर्य, अजिघ्रत्व, मूकत्व , जणत्व, कुंठित्व,

आनन्द लो कृष्ण अनुभूति का। जीवन रसमय रहेगा।

आह। आनन्द आनन्द। परमानन्द। जय महाकाली गुरुदेब। क्या नशा दिया। बस उड़ने लगे। अब आगे क्या। राम जाने।

यह नशा जो पीता है सिर्फ वोही बता सकता है। बाकी सिर्फ मुह पीटेंगे।

जय हो प्रभु। आनन्दम।

किसी मित्र ने पूछा था कि शिव और शक्ति का मानव रूप में आना सम्भव क्यो नही।

देखो मित्र कृष्ण विष्णु के रूप। विष्णु इस दृश्यमान जगत के मालिक। क्योकि उनकी पत्नी कौन शक्ति कौन लक्ष्मी। लक्ष्मी की आवश्यकता पड़ती है जन्म के बाद और मृत्यु के पूर्व तक बस। यानि विष्णु मालिक जन्म के बाद मृत्यु के पूर्व। तो इस रूप में कौन आ सकता है।

दूसरे मानव यानि आठ कला का पुतला। उसका मालिक विष्णु। इस कला में क्षमता नही कि शिव और शक्ति की कला जो आठ से अधिक उसको वहन कर सके। पर सिद्ध पुरुष 12 कला तक यानि वे शिव शक्ति से सायुज्य प्राप्त कर सकते है। पर पूरे शिव नही।

अतः श्री कृष्ण जो 16 कला के थे सिर्फ उन्हीं का रूप मानव की 8 कला तक की योनि में आ सकता है।

जय श्री कृष्ण।


एक बात और यदि आप साकार में किसी की भी पूजा करे। आपके बजरंग बली सहायक रहते है। पर कृष्ण भी साकार में स्वतः आकर आपको निराकार का अनुभव करा देते है।

ग्रुप के एक सदस्य की माँ माता जी के सायुज्य में है। पर उनको कृष्ण दर्शनाभूति हुई। वे परेशान। मेरे पास सन्देश आया। पर इसका अर्थ है अब उन्हें शीघ्र ही निराकार की अनुभूति कृष्ण करायेगे।

जय श्री कृष्ण।

कुछ मत मांगो कुछ मत बोलो। सब स्वतः मिल जाता है। माँगनेवाला तो भिखारी होता है। प्रभु से भीख नही प्रभु को मांगो। बल्कि मांगना तो प्रभु पर सन्देह करना होता है।

मांगत है संसार सब, निज अभिलाषा मान।

जो जन मांगे नही कछु, सब मिल जाता  जान।।


प्रवासी चेतना मासिक पत्रिका ने एक साक्षात्कार ले लिया और छाप दिया। पत्रिका प्रदान करने स्वयं सम्पादक जी और पत्रकार महोदया स्वयं आ गए।

आप दोनों को धन्यवाद।

इन्ही माधवी सिंह जी ने साक्षात्कार लिया है।

भगवती के पुत्र को प्रणाम।।


आज मेरा मन व्यथित हुआ। मतलब अच्छा नही लगा। ग्रुप के एक सदस्य को क्रिया हो रही है। पर उनके पास इतना धन नही कि वे रेलवे टिकट ले सके और दीक्षा के लिए जा सके। उनको सहायता की पेशकश मैने नही की। क्योकि उनको बुरा न लगे। अतः मैंने उनकी माँ जिनको माता जी का सायुज्य प्राप्त है। पर वे गुरू नही है। उन्ही को गुरू मानने को बोल दिया। ताकि इनकी शक्ति अपनी माता जी की शक्ति से जुड़ जाये और इनकी क्रिया नियंत्रित हो सके।

कारण इनकी माँ को कोई ऐसी क्रिया या आवेग नही होता है जो अनियंत्रित हो। मतलब वह माँ जगदम्बे की शक्ति को संभाल पा रही है।

उनकी माता बिना पढ़ी लिखी है। बचपन से माता का जाप करती आ रही है। अनिको अनुभव और दर्शनाभूति कर चुकी है। याबी उनको कृष्ण दिखते है। मतलब वे निराकार का भी अनुभव करनेवाली है मुझे ऐसा लगता है।

कभी कभी स्वतः ज्ञान प्राप्त बिना गुरू के भी भक्ति की पराकाष्ठा में पहुँच कर उस स्तर पर पहुँच जाते है जहाँ शक्ति स्वयं गुरु बन जाती है। ऐसा कम होता है पर होता है।

जैसे रमण महृषि, अरविंद घोष इत्यादि।

किताबी ज्ञान को मैं दीमकी ज्ञान ही मानता हूँ।

वेदों द्वारा सिर्फ मार्ग दर्शन हो सकता है। ज्ञान प्राप्त नही हो सकता सब मात्र शब्द है।

ज्ञान तो तब ही होता है जब हम अपने अंदर से होकर अपने को पढ़ने लगते है।

MMSTM समवैध्यावि ध्यान की वह आधुनिक विधि है। कोई चाहे नास्तिक हो आस्तिक हो, साकार, निराकार कुछ भी हो बस पागल और हठी न हो तो उसको ईश अनुभव होकर रहेगा बस समयावधि कुछ बढ सकती है। आपको प्रतिदिन लगभग 40 मिनट देने होंगे और आपको 1 दिन से लेकर 10 वर्ष का समय लग सकता है। 1 दिन उनके लिये जो सत्वगुणी और ईश भक्त हैं। 10 साल बगदादी जैसे हत्यारे के लिये। वैसे 6 महीने बहुत है किसी आम आदमी के लिये।"  सनातन पुत्र देवीदास विपुल खोजी
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इस ब्लाग पर प्रकाशित साम्रगी अधिकतर इंटरनेट के विभिन्न स्रोतों से साझा किये गये हैं। अथवा मेरे ग्रुप “आत्म अवलोकन और योग” से लिये गये हैं। जो सिर्फ़ सामाजिक बदलाव के चिन्तन हेतु ही हैं। कुलेखन साम्रगी लेखक के निजी अनुभव और विचार हैं। अतः किसी की व्यक्तिगत/धार्मिक भावना को आहत करना, विद्वेष फ़ैलाना हमारा उद्देश्य नहीं है। इसलिये किसी भी पाठक को कोई साम्रगी आपत्तिजनक लगे तो कृपया उसी लेख पर टिप्पणी करें। आपत्ति उचित होने पर साम्रगी सुधार/हटा दिया जायेगा।

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